{"_id":"b46433f4-6bd8-11e2-a797-d4ae52bc57c2","slug":"mortgage-of-foreign-capital","type":"story","status":"publish","title_hn":"विदेशी पूंजी के बंधक","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
विदेशी पूंजी के बंधक
सुनील
Updated Fri, 01 Feb 2013 12:32 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हमने ‘गार’ के भूत को दफना दिया है। अब पूंजी निवेशकों को डरने की जरूरत नहीं है। हमने खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी को इजाजत देने और ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी के फैसले लिए हैं, जिनसे हमारी रेटिंग घटने का खतरा नहीं रहा। इन कदमों से अब निवेशक भारत में फिर से दिलचस्पी ले रहे हैं। केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम का 22 जनवरी, को हांगकांग में दिया गया यह बयान कई मायनों में महत्वपूर्ण है और बहुत कुछ कहता है।
विज्ञापन
हांगकांग में सिटी बैंक और बीएनपी नामक दो बहुराष्ट्रीय बैंकों द्वारा ‘निवेश के लिए भारत सम्मेलन’ का आयोजन किया गया था, जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के 200 प्रतिनिधि शामिल हुए। इस मौके पर चिदंबरम के मुंह से यह उद्गार निकले।
विज्ञापन
अगले दिन वह सिंगापुर में इसी मिशन पर गए और उसके बाद यूरोप। इसी समय 23 से 27 जनवरी तक स्विट्जरलैंड के दावोस नगर में विश्व आर्थिक मंच की सालाना बैठक में वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा और शहरी विकास मंत्री कमलनाथ निवेशकों को लुभाने गए। उसके बाद विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने यूरोप के दो देशों की यात्रा की, तो उनके एजेंडे में भी भारत-यूरोप आर्थिक सहयोग प्रमुख रूप से शामिल था।
विज्ञापन
यह साफ है कि इसके पहले केंद्र सरकार ने जो कई बड़े-बड़े फैसले लिए, उनका मकसद विदेशी निवेशकों को खुश करना था। अंतरराष्ट्रीय पूंजीपति निवेश का फैसला करने के लिए अंतरराष्ट्रीय साख निर्धारण (रेटिंग) एजेंसियों की तरफ देखते हैं।
स्टैंडर्ड ऐंड पुअर, मूडीज, फिच जैसी एजेंसियां पूरी तरह नवउदारवादी-पूंजीवादी सोच पर चलती हैं और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों को बढ़ावा देती रहती हैं। जिस फार्मूले से वे रेटिंग तय करती हैं, वह ब्याज दरों, शेयर बाजार, भुगतान संतुलन के चालू खाते के घाटे, सरकारी खर्च, विदेशी निवेशकों को रियायतें आदि पर आधारित होता है। अर्थव्यवस्थाओं के बारे में उनके अनुमान कई बार गलत निकले हैं। लेकिन भारत सरकार के लिए वही रेटिंग, शेयर सूचकांक, राष्ट्रीय आय वृद्धि दर जैसे ही मानक सर्वोपरि हो गए हैं।
यह ‘गार’ का भूत क्या है? केंद्र सरकार की आमदनी और घाटे से चिंतित पिछले वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने पिछले वर्ष के बजट में ‘गार’ का प्रावधान किया था। यह अंग्रेजी के ‘जनरल एंटी अवॉयडेन्स रूल्स’ का संक्षेप है, जिसका मतलब है, कर-वंचन रोकने के सामान्य नियम।
आयकर कानून के तहत बनाए जा रहे इन नियमों का मकसद देशी-विदेशी कंपनियों द्वारा करों की चोरी या कर से बचने की कोशिशों पर लगाम लगाना था। इसी बीच नीदरलैंड की वोडाफोन कंपनी ने भारत में टेलीफोन व्यवसाय के अधिग्रहण का देश के बाहर सौदा करके टैक्स से बचने की कोशिश की थी। उसको रोकने के लिए प्रणब मुखर्जी ने ऐसे सौदों को भी कर-जाल के दायरे में लाने और उसे पिछली अवधि से लागू करने की घोषणा की थी। वोडाफोन पर करीब 11,218 करोड़ रुपये के टैक्स का दावा बनता था।
लेकिन प्रणब मुखर्जी की मंशा के जाहिर होते ही विदेशी कंपनियों में खलबली मच गई। उन्होंने भारत से पूंजी वापस ले जाने की धमकियां देनी शुरू कर दी। मगर, प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति बनते ही यह रोड़ा हट गया। उस समय वित्त मंत्रालय का प्रभार लेते हुए मनमोहन सिंह ने आश्वासन दिया कि ‘गार’ की समीक्षा की जाएगी।
फिर मंत्रालय में चिदंबरम को लाया गया, जिनकी कंपनी-भक्ति में कोई संदेह नहीं था। रंगराजन, कौशिक बसु, रघुराम राजन जैसे आर्थिक सलाहकार भी एक स्वर में अनुदानों को कम करने के साथ-साथ निवेशकों की आशंकाएं दूर करने का राग अलापने लगे। ऐसे ही एक अर्थशास्त्री पार्थसारथी सोम की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई। उसने फटाफट अपनी रपट पेश कर दी। 14 जनवरी को सरकार ने घोषणा कर दी कि गार नियमों को तीन साल के लिए स्थगित किया जाता है।
गार स्थगन की घोषणा के साथ ही विदेशी पूंजीपतियों में खुशी की लहर दौड़ गई और दो दिन में ही सेंसेक्स 20,000 के ऊपर पहुंच गया, जो दो वर्ष का सबसे ऊंचा स्तर था। इसी समय केंद्र सरकार ने डीजल की कीमतें क्रमिक रूप से बढ़ाने, बड़े उपभोक्ताओं को बाजार दर पर डीजल देने, धीरे-धीरे डीजल कीमतों को पूरी तरह नियंत्रणमुक्त करने और डीजल पर अनुदान समाप्त करने का फैसला कर लिया।
इससे भारतीय जनता पर चाहे बोझ पड़ा हो और महंगाई का नया दौर शुरू होने की संभावना बनी हो, लेकिन रिलायंस तथा एस्सार कंपनियों को काफी फायदा पहुंचने वाला है। इन कंपनियों के पास तेलशोधन की क्षमता है, लेकिन डीजल-पेट्रोल सस्ता होने के कारण वे अपने पेट्रोल पंप नहीं चला पा रही थीं। खुदरा व्यापार के दरवाजे भी प्रबल विरोध के बावजूद वालमार्ट जैसी विशाल कंपनियों के लिए खोले गए हैं। पिछले कुछ वर्षों में दरअसल सरकार के ज्यादातर फैसले कंपनियों को खुश करने और फायदा पहुंचाने के लिए ही किए गए हैं।
यह एक विचित्र बात है कि जो सरकार बजट घाटे का रोना रोती रहती है और खर्च कम करने के लिए आम जनता को मिलने वाले अनुदानों व मदद को कम करने पर तुली हुई है, वही सरकार दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों से करों को वसूलने और कर-चोरी रोकने के उपायों को आसानी से छोड़ देती है।
मॉरीशस मार्ग जैसी कर-चोरी को उसने पूरी तरह इजाजत दे रखी है। कंपनियों को दी जाने वाली कर-रियायतें तथा अनुदान हर बजट में विशाल मात्रा में बढ़ते जा रहे हैं। कारण यही है कि सरकार में बैठे लोग किसी भी कीमत पर विदेशी पूंजी को रिझाने, लुभाने, खुश करने और बुलाने के लिए बेचैन है। विदेशी पूंजी की यह गुलामी अभूतपूर्व है। आधुनिक भारत के इतिहास का यह एक शर्मनाक अध्याय है।