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सूबे में काफी संभावनाएं हैं!
पत्रलेखा चटर्जी
Updated Mon, 18 Mar 2013 05:01 PM IST
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यह अमूमन कम होता है, जब उत्तर प्रदेश, जिसे भारतीय राजनीति का दिल कहते हैं, सुर्खियों में नहीं रहता। लेकिन कई बार उसकी यह प्रसिद्धि ‘बंदूक और गुंडों’ की छवि को ही मजबूत करती है। संभावना है कि करीब 20 करोड़ आबादी वाला यह राज्य, जो ब्राजील जैसे देश से थोड़ा ही बड़ा है, आने वाले कुछ दशकों में युवाओं की सबसे बड़ी आबादी इसी राज्य में होगी।
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ऐसे में देश में सबसे अधिक युवा श्रमशक्ति उत्तर प्रदेश से ही मिलने की उम्मीद है। इससे निर्विवाद रूप से राज्य को भारी लाभ हो सकता है। लेकिन दुखद है कि उत्तर प्रदेश में ही दुनिया की अत्यधिक गरीब आबादी का आठ फीसदी हिस्सा भी बसता है।
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राज्य में स्वास्थ्य और शिक्षा की हालत निराशाजनक तो है ही, यहां कई जिले काफी पिछड़े हुए हैं। मसलन, श्रावस्ती को ही लीजिए, जिसकी गिनती देश के उन जिलों में होती है, जहां महिला साक्षरता दर काफी कम है और नवजात मृत्यु दर काफी अधिक। ऐसे में प्रभावी तरीके से अगर हालात नहीं सुधारे गए, तो यह राज्य जनसांख्यिकीय लाभ उठाने में सफल नहीं होगा।
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दिलचस्प बात यह भी है कि चुनौतियों से जूझ रहे उत्तर प्रदेश का यह निरा आकर्षण भी है, जो बड़े बदलाव के पथ प्रदर्शकों के लिए इसे सम्मोहक बनाता है। शायद इसीलिए विश्व बैंक के अध्यक्ष और कोरियाई मूल के अमेरिकी चिकित्सक जिम योंग किम ने अपने हालिया तीन दिनों की भारत यात्रा में सर्वोच्च महत्व उत्तर प्रदेश को ही दिया।
हालांकि भारत समेत दुनिया के अन्य विकासशील देशों के आलोचकों के लिए विश्व बैंक अन्य संस्थाओं की तरह ही अंतरराष्ट्रीय नौकरशाहों का एक शीर्ष संगठन है, जो गरीबी कम करने के अपने लक्ष्य को पूरा नहीं करता। कई लोग इसकी कुछ नीतियों के विपरीत प्रभावों के बारे में भी लिख चुके हैं। जबकि कई लोगों का तर्क है कि यह संस्था खुद-ब-खुद बदलने की कोशिश कर रही है और वह विकास में मुख्य भूमिका निभा सकती है।
जिन लोगों के लिए यह संस्था काम करने का दावा करती है, अगर उनकी आवाज वास्तव में सुनी जाती है, तो विकास के क्षेत्र में यह एक महत्वपूर्ण संस्था साबित हो सकती है। अपनी यात्रा के दौरान डॉक्टर किम ने अपने उदाहरणों के जरिये उत्तर प्रदेश, भारत और विश्व बैंक के लिए एक मजबूत समझ-बूझ वाला मामला तैयार किया। वह बताते हैं कि कॉलेज से स्नातक करने के बाद उनकी पहली यात्राओं में एक वाशिंगटन डीसी भी था, जहां उन्होंने विश्व बैंक समूह के खिलाफ प्रदर्शन में हिस्सा लिया था।
उस समय दुनिया भर में कई लोगों के बीच मुख्य चिंता का कारण यह था कि विश्व बैंक आर्थिक वृद्धि पर बहुत ज्यादा ध्यान केंद्रित कर रहा है और वह समावेशी विकास पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे रहा है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए जरूरी है।
दिल्ली में उन्होंने मीडिया से कहा, ‘अब मैं विश्व बैंक का अध्यक्ष हूं।’ उनका संदेश साफ था कि विश्व बैंक ने एक संस्थान के रूप में अपनी पहचान बनायी है, जिसने बड़े पैमाने पर विभिन्न क्षेत्रों से जुडे़ भरोसेमंद आंकड़े जुटाए हैं। जमीनी हकीकत बयां करने वाले इन आंकड़ों पर अब अमल करने की जरूरत है। आज अगर विश्व बैंक स्वास्थ्य प्रणालियों, शिक्षा, लैंगिक समानता और संबंधित क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान दे रहा है तो इसका एक बड़ा कारण है।
दरअसल आज ऐसे प्रमाण मौजूद हैं, जिनसे पता चलता है कि मानव पूंजी में यह निवेश आर्थिक वृद्धि का वाहक बन सकता है। गरीबी खत्म करना कोई नया विचार नहीं है। देश में ऐसा कोई राजनेता नहीं है, जिसने गरीबी हटाने की जरूरत पर भाषण न दिया हो, पर गरीबी बरकरार है। इसलिए यह बहस भी बरकरार है कि गरीबी कैसे खत्म हो। देश में एक बड़े तबके का तर्क है कि इसके लिए आर्थिक विकास में इजाफा किया जाना जरूरी है। इसके बिना लोगों को नौकरियां नहीं मिलेंगी और काम न मिलने की स्थिति में लोग गरीब रहेंगे।
दरअसल, उत्तर प्रदेश में सड़कों के गड्ढों से लेकर बिजली की कमी और आधारभूत संरचना से जुड़ी खामियों के साथ आर्थिक विकास की राह में आने वाली अन्य अड़चनों को दूर करने की जरूरत है। लेकिन साथ ही साथ ज्यादा स्वस्थ और शिक्षित आबादी के निर्माण की जरूरत है, जो उभरती अर्थव्यवस्था की संभावनाओं का फायदा उठा सके।
उत्तर प्रदेश क्या इस दिशा में आगे बढ़ सकेगा। मेरा मानना है कि ऐसा हो सकता है। जैसे, ज्यादा वक्त नहीं हुआ, जब पोलियो के ज्यादा खतरे वाले जिले इसी सूबे में थे। पर पिछले दो वर्षों के दौरान उत्तर प्रदेश और भारत में पोलियो का एक भी मामला सामने नहीं आया है। मतलब यह कि सूबे में संभावनाएं हैं और इस प्रदेश के युवा विकास की कहानी का आधार बन सकते हैं।