बहुत बदल गया है काशी का अस्सी
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बनारस में गंगा के किनारे एक घाट है-अस्सी घाट। पिछले तीन दशकों से मैं जब भी बनारस जाता हूं, प्रायः शाम को अस्सी जाता हूं। बनारस का बड़ा एवं सर्वाधिक लोकप्रिय घाट दशाश्वमेध जाने में मेरी कभी रुचि नहीं रही। वहां का भीड़-भाड़ एवं पर्यटकीय जमावड़े से मैं सदा बचता रहा। अस्सी घाट पर ज्यादातर भीड़ नहीं होती थी, शांति रहती थी। पिछले कुछ वर्षों से वहां शाम को गंगा आरती भी होने लगी है। नतीजतन अस्सी घाट आने वालों की संख्या में कुछ बढ़ोतरी हुई। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने अपना स्वच्छता अभियान प्रारंभ किया। आठ नवंबर, 2014 को जब वह अपने संसदीय चुनाव क्षेत्र बनारस आए, तो अस्सी घाट भी गए। बाढ़ में बहकर आ जमी मिट्टी की सफाई उन्होंने बनारस के प्रशासन एवं सेवाभावी संगठनों की मदद से करवाई। तब अस्सी घाट राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया के लिए आकर्षण का केंद्र बना। नरेंद्र मोदी ने दो महीने में अस्सी घाट की पूर्ण सफाई का वायदा भी किया। वह दोबारा 24 दिसंबर को वहां पर हुई साफ-सफाई देखने गए, तो अस्सी घाट फिर खबरों में आया।
ऐसा नहीं है कि अस्सी घाट नरेंद्र मोदी के आने से ही चर्चा में आया हो। उससे पूर्व बनारस के साहित्यकारों, शायरों की रचनाओं में अस्सी चर्चा का विषय बनता रहा है। काशीनाथ सिंह का बहुचर्चित उपन्यास काशी का अस्सी अस्सी घाट पर केंद्रित है। नरेंद्र मोदी के बनारस जाने के पूर्व ही इस उपन्यास पर केंद्रित फिल्म भी बननी शुरू हो गई थी। तात्पर्य यह कि अस्सी घाट का आकर्षण राजसत्ता का प्रतीक बनने के कारण नहीं रहा है, बल्कि यह सदियों से अपने आप में अपना अर्थ समाए बनारस के जीवन का हिस्सा रहा है। दशाश्वमेघ के पर्यटकीय अर्थ से बिल्कुल भिन्न अस्सी घाट शांति एवं गंगा से आत्म संवाद के अर्थ इसकी धूल-मिट्टी में समाए हुए बनारस के मूल अर्थ को अपने में शामिल किए जीवंत था।
नरेंद्र मोदी के अस्सी आने से इसका भी पर्यटकीय अर्थ बनने लगा है, जो इसके मूल चरित्र से कहीं विरोधाभास भी पैदा करता है। अस्सी पर अंग्रेजी पुस्तकों की मशहूर दुकान ‘हारमोनी’ के राकेश इस परिवर्तन को समझते हुए कहते हैं, ‘पहले अस्सी घाट हम सबको अच्छा लगता था। आज इसका टूरिस्ट स्पॉट के रूप में विकसित होना हमें प्रिय नहीं है।' यह बात एक पुस्तक दुकान के मालिक कह रहे हैं, जिन्हें पर्यटकों के आने से किताबों की बिक्री बढ़ने की उम्मीद हो सकती थी। वह कहते हैं, पहले यहां लोग शांति की खोज में आते थे, अब मजा लेने, पर्यटकीय आनंद की चाहत में प्रायः शहर का मध्यवर्ग शाम को आकर बैठ जाता है। यहां भीड़ तो बढ़ी है, पर अस्सी अपना चरित्र खोता जा रहा है। अस्सी के जीवन से जुड़े लोगों का मानना है कि स्वच्छता अभियान के इतने शोर के बावजूद यहां से सिर्फ सीढ़ियों पर आ गई मिट्टी का जमाव ही हटा है, और कुछ नहीं हुआ है। कागज, पॉलीथिन आदि फेंकने के लिए पर्याप्त संख्या में डस्टबिन भी यहां रखे नहीं दिखते। स्वच्छता के ‘सिंगापुर मॉडल’ की सफलता, जो नरेंद्र मोदी को प्रिय है, हर जगह सुंदर-आकर्षक डस्टबिन रखे होने के होने के कारण बनी है। यहां स्वच्छता अभियान का लक्ष्य तो है, किंतु उसे सफल बनाने के लिए आधारभूत ढांचे की चिंता भी हमें होनी चाहिए। आप अगर अस्सी जाएंगे, तो इधर-उधर फेंके कागज, पत्तल, दोने दिखाई पड़ेंगे। पर्यटकीय संस्कृति धन लाती है, तो गंदगी भी लाती है। अस्सी के साथ हालांकि कुछ रोचक हुआ है- यहां के व्यापारियों का कारोबार पिछले छह-आठ महीनों में ज्यादा नहीं बढ़ा है, न ही गंदगी में ज्यादा कमी आई है। इतना अभियान चलाने, इतना मीडिया करवेज करवाने एवं इतने एंबेसडर बनाने के बाद भी अस्सी पर क्या बदला है? और जो बदला है, वह बनारस एवं अस्सी के मूल अर्थ के कितने आसपास है, यह समझने की भी जरूरत है। अस्सी में एक बड़ा बदलाव आया है, जिसे मैं यहां रेखांकित करना चाहता हूं। अस्सी घाट की संपूर्ण अस्मिता में दो लोग बहुत महत्वपूर्ण रहे हैं-राजू चायवाला एवं शंभु भूजावाला। पिछले अनेक वर्षों से इन्हें मैं अस्सी घाट के अर्थ में महत्वपूर्ण पाता रहा हूं। काशी का अस्सी में भी वहां के चाय की गुमटी और गुमटी के आसपास चाय पर चर्चा का जीवंत वर्णन है। शहर के लोग वहां सुबह से ही आने लगते थे, वहीं नहाते, चाय पीते, देश दुनिया की बातें करते। शाम को चाय पीते, भूजा खाते घाट पर बैठ शांत गंगा को निहारते। यानी काशी के अस्सी पर अनेक गरीब-गुरबा चाय एवं भूजा बेचकर अपना जीवन बिताते थे।
पिछले दिनों चले स्वच्छता अभियान से सफाई तो ज्यादा नहीं बढ़ी, किन्तु ये गरीब जो चाय एवं भूजा बेचकर जीते थे, उन्हें अस्सी से बाहर कर दिया गया। फिर भी बार-बार पेट के लिए पुलिस की गालियां एवं डंडा सहते हुए भी कुछ घंटे के लिए अस्सी के केंद्र से दूर कहीं हाशिये पर ये अपनी दुकान लगा लेते हैं। पहले वे काशी के अस्सी के मूल नागरिक थे, अब वे वहां रिफ्यूजी के रूप में बदल गए हैं। हां, एक परिवर्तन यहां और हुआ है-प्रधानमंत्री का क्षेत्र एवं एजेंडे में महत्वपूर्ण होने के कारण केंद्र सरकार की सांस्कृतिक संस्थाएं अपने बजट का एक अंश खर्च कर ग्रीष्मकालीन एवं शीतकालीन कार्यशालाएं यहां के पीपल वृक्ष के नीचे कराने लगी है। इससे एक लाभ हुआ है कि अस्सी घाट अनवरत मीडिया आकर्षण का केंद्र बना रहता है। किंतु वहां से बुद्धत्व (शांति), राजू चाय वाले एवं शंभु भूजा वाले के निष्कासन पर हम चिंतित हैं। काशी के अस्सी के बदले स्वरूप से एक प्रश्न उठता है-क्या विकास ऐसा नहीं हो सकता, जो किसी को विकास के दायरे से बाहर न करे? सबको समाहित करने वाला विकास ही राज्यसत्ता का लक्ष्य होना चाहिए। जब देश के प्रायः हर नदी घाट को, चाहे वह साबरमती हो या गंगा, पर्यटन की दृष्टि से देखा जा रहा है, तब यह सवाल उठना लाजिमी है।