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फीनिक्स में गांधी की यादें: सांसद इला ने दिखाया वह संग्रहालय, जिसमें आगंतुकों को खींचने की थी अद्भुत शक्ति

Sun, 17 Nov 2024 06:00 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 17 Nov 2024 06:00 AM IST
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सार
दक्षिण अफ्रीका में सांसद बनने वाली इला गांधी मुझे फीनिक्स फार्म के बचे हुए तीन एकड़ के उस भू-भाग को दिखाने ले गईं, जिसमें गांधी जी का एक साधारण संग्रहालय था, लेकिन उसमें आगंतुकों को अपनी ओर खींचने की शक्ति थी।
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Mohandas Karamchand Gandhi had built Phoenix Farm by purchasing land in South Africa
महात्मा गांधी की प्रतिमा - फोटो : ANI

विस्तार

मोहनदास करमचंद गांधी ने नवंबर 1904 में दक्षिण अफ्रीका के डरबन बंदरगाह से चौदह मील दूर जमीन खरीदी थी। इससे पहले गांधी जी ने अपना जीवन पोरबंदर और राजकोट जैसे छोटे शहरों से लेकर डरबन, जोहान्सबर्ग, लंदन और बॉम्बे जैसे बड़े शहरों में बिताया था। अब तक वे सोचने, लिखने और पैरवी करने जैसे मानसिक कार्यों तक सीमित थे। मित्र हेनरी पोलाक से मिली जॉन रस्किन की किताब 'अनटू दिस लास्ट' से प्रेरित होकर उन्होंने जमीन से जुड़ने और शारीरिक श्रम करने का निर्णय लिया। उन्होंने 'इंडियन ओपिनियन' नाम से एक बहुभाषी अखबार भी निकाला, जो दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले प्रवासी भारतीयों की आवाज उठाता था।



गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में जो जमीन खरीदी, उसे नजदीकी रेलवे स्टेशन के नाम पर 'फीनिक्स फार्म' नाम  दिया गया। इसकी स्थापना की 120वीं वर्षगांठ पर दक्षिण अफ्रीकी विद्वान उमा धुपेलिया-मेस्थरी ने इसके जन्म से लेकर वर्तमान तक का इतिहास प्रकाशित किया है।  


किताब की शुरुआत में एक अंग्रेज विरोधी शख्स अल्बर्ट वेस्ट पर खास बात की गई है। उन्होंने 'इंडियन ओपिनियन' को चलाने और फीनिक्स बस्ती को एक वास्तविक, जीवंत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1914 में गांधी जी के चले जाने के बाद पश्चिम को फीनिक्स को बचाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ा। 1917 में गांधी ने अपने दूसरे बेटे मणिलाल को बस्ती को पुनर्जीवित करने में मदद करने के लिए दक्षिण अफ्रीका भेजा।

दिसंबर 1919 में मणिलाल ने अपने पिता को लिखा- "मैं इस समय भारत आने में सहज महसूस नहीं कर रहा हूं। ...मैं यहां मानसिक शांति के साथ काम कर सकता हूं। इसलिए मैं यहीं रहना चाहूंगा और काम के साथ-साथ पढ़ाई भी करूंगा। लेकिन अगर आप चाहते हैं कि मैं भारत आऊं तो मैं ऐसा करने को तैयार हूं।"

1927 में मणिलाल ने महाराष्ट्र के अकोला की रहने वाली सुशीला मशरुवाला से शादी की। सुशीला ने फार्म और अखबार के प्रबंधन और संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पुस्तक में उमा धुपेलिया-मेस्थरी लिखती हैं, “सुशीला ने ‘पत्नी, मां और प्रेस कार्यकर्ता के रूप में अपनी भूमिकाओं’ के बीच बड़ी ही कुशलता के साथ संतुलन स्थापित किया।” यहां यह बात गौर करने वाली है कि धुपेलिया-मेस्थरी स्वयं मणिलाल और सुशीला की पोती हैं, इसके बावजूद उन्होंने पुस्तक में कहीं भी पारिवारिक धर्मपरायणता को जगह नहीं दी, बल्कि एक पेशेवर इतिहासकार की तरह चीजों को सामने रखा है।

गांधी जी की ही तरह उनके बेटे के नेतृत्व में 'इंडियन ओपिनियन' ने दक्षिण अफ्रीकी मामलों पर बनने वाली खबरों को भारत में होने वाले प्रमुख विकास के समाचारों के साथ जोड़ा। जुलाई 1938 में मणिलाल ने अपने मित्र बाबर छाबड़ा को पत्र लिखकर बताया कि घाटे को पूरा करने के अलावा ‘इंडियन ओपिनियन’ और ‘फीनिक्स’ को बचाने के लिए दो सौ दक्षिण अफ्रीकी भारतीयों से 25 पाउंड का योगदान करने का आग्रह किया था। फीनिक्स को मणिलाल ने 'दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी का एकमात्र स्मारक' बताया था। उन्होंने कहा कि "अगर मदद नहीं मिलती है तो यह समझ लेना चाहिए कि ‘इंडियन ओपिनियन’ की कोई जरूरत नहीं है और फिर मुझे इसे बंद कर वापस भारत लौट जाना होगा।"      

सितंबर 1942 में मणिलाल ने ब्रिटिश राज द्वारा भारत छोड़ो आंदोलन के दमन पर एक विशेष अंक निकालने की योजना बनानी शुरू की। उन्होंने छाबड़ा से एक ऐसा कलाकार ढूंढने के लिए कहा, जो इसका ठीक से इसका आवरण चित्र बना सके। इसकी संक्षिप्त जानकारी उन्होंने इस प्रकार दी- चित्र की पृष्ठभूमि में भारत का नक्शा होना चाहिए और भारत माता जंजीरों में जकड़ी होनी चाहिए। दूसरी तरफ ब्रिटेन का नक्शा होना चाहिए, जिससे आग की उठती लपटें भारत को जला रही हों और उस पर साम्राज्यवाद लिखा होना चाहिए। आसमान से दिवंगत देशभक्तों- बाल गंगाधर तिलक, दादाभाई नौरोजी, रवींद्रनाथ टैगोर, अब्बास तैयबजी, महादेव देसाई और जेल में बंद अन्य पर फूलों की बारिश होनी चाहिए।

1948 में दक्षिण अफ्रीका में राष्ट्रीय पार्टी सत्ता में आई और उसने नस्लीय भेदभाव की नीति को बढ़ावा दिया, जिसे 'रंगभेद' के नाम से जाना जाता है। अगस्त 1951 में मणिलाल गांधी ने प्रधानमंत्री डीएफ मालन को पत्र लिखकर कहा, "आज गैर-यूरोपीय लोगों को प्रभावित करने वाली सरकार का हर कदम उनके लिए नफरत का प्रतीक मालूम पड़ता है।" उन्होंने मालन से यह भी कहा कि "रंगभेद की नीति न केवल मनुष्यों को पूर्ण आर्थिक और राजनीतिक अभिव्यक्ति के अधिकार से, बल्कि उन्हें ईश्वर की संतान के रूप में उनके व्यक्तित्व और आध्यात्मिक अस्तित्व के पूर्ण विकास के अधिकार से भी वंचित करती है।" प्रधानमंत्री मालन, जो स्वयं ईसाई चर्च के मंत्री थे, से मणिलाल ने कहा कि "ईश्वरीय शिक्षाओं के अनुसार, वे अपनी सरकार की राजनीति की फिर से जांच करें।" दो साल बाद मणिलाल को अवज्ञा आंदोलन में गिरफ्तार किया गया और उन्हें एक महीने से अधिक समय जेल में बिताना पड़ा।

1956 में मणिलाल की मृत्यु हो गई। सुशीला ने ‘इंडियन ओपिनियन’ के बंद होने के साल 1961 तक इसका संपादन जारी रखा। इस दौरान उनकी बेटी इला और दामाद मेवा उनके साथ फीनिक्स में रहे और रंगभेद विरोधी संघर्ष में काफी सक्रिय रहे, जिस कारण उन्हें पुलिस द्वारा लगातार परेशान किया जाता रहा। मणिलाल और सुशीला द्वारा लिखे गए पत्रों में दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मामलों के प्रमुख राजनीतिज्ञों- वीएस श्रीनिवास शास्त्री और उभरते युवा कम्युनिस्ट डॉ. यूसुफ दादू का जिक्र मिलता है। एक अन्य महत्वपूर्ण उपन्यासकार एलन पैटन थे, जिन्होंने अपने मित्र मणिलाल की मृत्यु के बाद फीनिक्स को चलाने में सुशीला की काफी सहायता की।

1985 में पुलिस के हाथों एक अश्वेत कार्यकर्ता की मौत के बाद फीनिक्स के आसपास के क्षेत्र में हिंसा भड़क उठी। लोग डर कर भागने लगे। एक खबर में यह भी बताया गया कि गांधी जी के घर की खिड़कियों के शीशे तोड़ दिए गए थे और उनकी यादगार तस्वीरें बाहर टूटी-फूटी अवस्था में पड़ी थीं। कभी संपन्न रही बस्ती वीरान हो गई थी, दमनकारियों ने उस पर कब्जा जमा लिया था। फीनिक्स के उजड़ जाने के बाद सुशीला टूट गईं और 1988 में उनका देहांत हो गया। 21 साल बाद उनकी बेटी इला गांधी दक्षिण अफ्रीका की पहली बहुनस्लीय संसद में सांसद बनीं। वह मुझे फीनिक्स फार्म की सौ एकड़ जमीन में बची हुई तीन एकड़ की छोटी-सी संपत्ति को दिखाने ले गई। इसमें गांधी जी का एक साधारण और छोटा संग्रहालय था, जिसमें आगंतुकों को अपनी ओर खींचने की शक्ति थी।

फीनिक्स गांधी जी द्वारा स्थापित पांच बस्तियों में से पहली थी। इसके बाद उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में टॉलस्टॉय फार्म और भारत में कोचरब, साबरमती और सेवाग्राम आश्रम स्थापित किए। यह फीनिक्स ही था, जिसने अंतरधार्मिक, अंतरनस्लीय, अंतरजातीय जीवन में एक प्रयोग का आधार तैयार किया, जहां शारीरिक श्रम भी उतना ही महत्वपूर्ण था, जितना कि मानसिक श्रम। फीनिक्स वह जगह भी थी, जहां गांधी जी ने अपना पहला अखबार 'इंडियन ओपिनियन' प्रकाशित किया था, जो आगे चलकर भारत में पत्रकारिता का अग्रदूत बना। फीनिक्स के बिना गांधी पूर्ण नहीं होते। उमा धुपेलिया-मेस्थरी अपनी किताब के माध्यम से फीनिक्स के समृद्ध इतिहास को फिर से जीवित कर रही हैं।

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