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मिजोरम: म्यांमार और बांग्लादेश के लोगों की तरफ मिजो लोगों ने बढ़ाए मदद के हाथ; सरकारें भी इनसे सीख सकती हैं
Sun, 07 Apr 2024 05:36 AM IST
यशोधन शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: यशोधन शर्मा
Updated Sun, 07 Apr 2024 05:36 AM IST
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मिजोरम के स्थानीय निवासी
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सोशल मीडिया
विस्तार
पिछले महीने मैंने कई उत्साहवर्धक दिन मिजोरम में बिताए। मुझे राज्य के राजनीतिक इतिहास के बारे में थोड़ी जानकारी थी। अपने जीवन में मैं कई मिजो लोगों से मिला भी, लेकिन इससे पहले कभी राज्य का दौरा नहीं किया था। सबसे पहले मैंने गुवाहाटी के लिए उड़ान भरी, जहां मैं अपने कुछ पुराने दोस्तों से मिला। ब्रह्मपुत्र नदी के दर्शन का आनंद लिया, विश्वविद्यालय के शिक्षकों एवं छात्रों से गांधी के बारे में बातें भी कीं।हवाई जहाज की तुलना में ग्रामीण इलाकों को देखने के लिए यात्री ट्रेन एक बेहतर विकल्प है, लेकिन कार शायद अब भी बेहतर तरीका है। लेगपुई हवाई अड्डे से राज्य की राजधानी आइजॉल तक की यात्रा में डेढ़ घंटे का समय लगा, जो परिदृश्य को समझने के लिए पर्याप्त था। पहाड़ियों के आकार ने मुझे उप-हिमालयी जिलों की याद दिला दी, जो तब उत्तर प्रदेश में थे, अब उत्तराखंड में हैं, जहां मैं पैदा हुआ और पला-बढ़ा।
संकरी व घुमावदार सड़कें और तेज बहती जलधाराएं वैसी ही थीं। वनस्पति कुछ अलग थीं, प्रचुर मात्रा में बांस और पर्णपाती पेड़, लेकिन उत्तराखंड के विपरीत कोई शंकुधारी प्रजाति नहीं थी। और मानव आबादी भी बहुत कम लग रही थी। आइजॉल शहर में हर पहाड़ी के हर स्तर पर घर एक-दूसरे से सटे थे, जो नैनीताल और मसूरी की याद दिला रहे थे। सड़कों पर घूमना, खरीदारी करना, कैफे में बातचीत करना, ये सभी राज्य में महिलाओं की उन्नति की गवाही देते हैं।
भारत के सभी राज्यों में महिला साक्षरता दर मिजोरम में दूसरी सबसे अधिक है। करीब 60 फीसदी मिजो महिलाएं घर से बाहर काम करती हैं, यह अखिल भारतीय दर (30 फीसदी से कम) से दोगुने से भी ज्यादा है। और देश के किसी भी हिस्से की तुलना में मिजो महिलाओं के बेहतर वेतन पाने या ज्यादा जिम्मेदारी वाला काम करने की संभावनाएं अधिक हैं। जुलाई, 2022 में प्रकाशित पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, ‘मिजोरम में विधायकों, वरिष्ठ अधिकारियों और प्रबंधकों के रूप में काम करने वाले महिला-पुरुषों का अनुपात सबसे अधिक 70.9 फीसदी है, उसके बाद सिक्किम (48.2 फीसदी) और मणिपुर (45.1 फीसदी) का स्थान है।’
मिजो लोगों की सामाजिक प्रगति कई मायनों में हैरान करती है। यह उनके भौगोलिक अलगाव के विपरीत है और ऐसा तब है, जब कई वर्षों तक विद्रोहियों और राज्य के बीच हिंसक संघर्ष जारी रहा। जिस आइजॉल में मैं अब घूम रहा था और लोगों से बात कर रहा था, वह हलचल भरा और सबकी निगाह में बिल्कुल शांत शहर था, जिसे एक बार भारतीय वायु सेना द्वारा संचालित पहली भारतीय बस्ती होने का गौरव प्राप्त हुआ था।
यह 1966 के वसंत में हुआ था, जब एक सशस्त्र समूह मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) ने भारतीय राज्य के खिलाफ विद्रोह शुरू किया था। एमएनएफ का नेतृत्व लालडेंगा कर रहे थे, जो कुछ वर्ष पहले मिजो हिल्स में पड़े अकाल से बुरी तरह प्रभावित थे, जब व्यापक भुखमरी के प्रति नई दिल्ली की सरकार ने अपर्याप्त प्रतिक्रिया जताई थी। यह सोचकर कि मिजो लोगों का भारत में कोई सम्मानजनक भविष्य नहीं है, लालडेंगा ने पूर्वी पाकिस्तान के सैन्य शासन से संपर्क किया, जिसने उन्हें हथियार और आर्थिक सहायता देने का वादा किया।
फरवरी, 1966 में एमएनएफ ने सरकारी कार्यालयों पर आक्रमण किया और संचार प्रणाली को बाधित कर दिया। उन्होंने घोषणा की कि मिजो लोगों ने अपना एक ‘स्वतंत्र’ गणराज्य बना लिया है। फिर भारतीय राज्य ने सेना की बड़ी टुकड़ियां भेजीं और वायु सेना को भी भेजा गया। फिर भी विद्रोहियों ने जमकर संघर्ष किया और संघर्ष खत्म होने तथा समझौता होने में दो दशक लग गए। बाद में लालडेंगा भारतीय राज्य मिजोरम के मुख्यमंत्री बने।
समझौता होने के बाद मिजो लोगों ने बहुत जल्दी और पूरी तरह से अपने जीवन का पुनर्निर्माण किया, यह उनकी बुद्धिमत्ता और उनके साहस का प्रमाण है। पीड़ा लोगों को प्रतिशोधी बना सकती है, खुद सहे कष्टों के कारण वे दूसरों से बदला लेने पर उतारू हो सकते हैं। लेकिन जहां तक मिजो लोगों की बात है, उनके अपने इतिहास ने उन्हें दूसरे लोगों की पीड़ा के प्रति अधिक दयालु बना दिया है। उन्होंने जिस तरह से म्यांमार और बांग्लादेश के पीड़ितों का स्वागत किया है, जरा उस पर विचार कीजिए, जिनमें से कई उनकी तरह ईसाई हैं, तो कुछ बौद्ध भी। अभी हाल ही में, मिजो लोगों ने मणिपुर के जातीय संघर्ष से भागे कुकियों का बोझ अच्छी तरह से उठाया है, और उन्होंने उन जिम्मेदारियों को उठाया है, वास्तव में केंद्र सरकार की हैं।
शानदार पत्रिका ‘ग्रासरूट्स ऑप्शंस’ में हाल ही में प्रकाशित निबंध में मिजो जीवन की सामुदायिक भावना का श्रेय झूम या स्वीडन खेती की विरासत को दिया गया है, जो ऐतिहासिक रूप से उन्हें आजीविका का मुख्य साधन प्रदान करता है। पारिवारिक इकाइयों में सहयोग को शामिल करते हुए झूम की खेती ने एक-दूसरे के साथ और प्रकृति के साथ एक सामाजिक रिश्ता बनाया। ये सभी साझा मूल्य और विचार अंततः सामाजिक आचरण संहिता में बदल गए।
मिजो लोगों का सामुदायिक लोकाचार इस क्षेत्र में ईसाई धर्म के आगमन से पहले का है। चर्च ने मिलकर काम करने की इस भावना को सुदृढ़ किया है। हालांकि, कुछ मामलों में अनावश्यक शुद्धतावाद भी दिखा है। बिशपों के क्रोध के डर से लगातार राज्य सरकारों ने निषेध लागू किया है, जिसके कारण शराब का अवैध व्यापार और नकली शराब की खपत बढ़ गई है। वैध रूप से बनाई और उपभोग की जाने वाली शराब पर कर लगाकर मिजोरम की खस्ताहाल सड़कों को सुधारने में काफी मदद मिल सकती है।
दुखद है कि पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की तरह मिजोरम को भी बहुत कम महत्व दिया गया है। इस क्षेत्र के साथ नई दिल्ली की सरकारों ने बड़े पैमाने पर उपेक्षा का व्यवहार किया है, क्योंकि यहां लोकसभा की बहुत कम सीटें हैं। फिर भी तथाकथित ‘मुख्य भूमि’ के लोगों को मिजो लोगों से बहुत कुछ सीखना है-उनकी सामुदायिक भावना से, हार और निराशा से उबरने की उनकी क्षमता से, जातिगत पूर्वाग्रहों की कमी से और उनकी महिलाओं की अपेक्षाकृत उच्च स्थिति से, जीवन और संगीत के प्रति उनके प्यार से।