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अभी मीलों हमें जाना है

Tue, 17 Sep 2013 07:26 PM IST
शंकर अय्यर
शंकर अय्यर Updated Tue, 17 Sep 2013 07:26 PM IST
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नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा था कि हमारे पास कई अच्छे जनरल हैं, पर हमें एक भाग्यशाली जनरल चाहिए। वित्त मंत्री पी. चिदंबरम को रघुराम राजन के रूप में एक भाग्यशाली जनरल मिल गया है। घोर निराशा, आशा में तब्दील होती दिख रही है, लुढ़क रहा रुपया भी संभल रहा है और बाजार ने भी जबर्दस्त छलांग लगाई है। मगर राजनीतिक अर्थशास्त्र के लिहाज से अच्छी खबर के साथ आशंका होती है कि कहीं हमारे नीति नियंता आत्ममंथन करना न छोड़ दें।

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इसमें कोई शक नहीं है कि नीतियों को लेकर राजन में व्यापकता और स्पष्टता है और उन्हें प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री का विश्वास प्राप्त है। पर अर्थव्यवस्था को संकट से उबारने के लिए शीर्ष नेतृत्व और ठोस प्रयासों की जरूरत है। रुपया जरूर पहले से जरा सुधरा है, मगर भारत निर्माण वाले विज्ञापन की तर्ज पर कहें, तो अभी मीलों हमें जाना है।
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अर्थव्यवस्था में डॉलर की आपूर्ति बढ़ाने के लिए राजन ने कुछ शानदार कदम उठाए हैं। पर अब भी राजकोषीय घाटे और चालू खाता घाटे का लक्ष्य बहुत दूर है। निर्यात बढ़ रहा है, लेकिन उसका तुरंत लाभ नहीं मिलेगा। मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून के दौरान सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर केवल 4.4 फीसदी रही है। अच्छे मानसून से फसलों की पैदावार बढ़ेगी, लेकिन जुलाई से सितंबर के अनुमान बहुत अच्छे नहीं हैं। और इस बात की भी गारंटी नहीं है कि मध्य-पूर्व का संकट हमेशा के लिए टल जाएगा।
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दरअसल, बेहाल भारतीय अर्थव्यवस्था की जिम्मेदार हमारी राजनीति है। आप बहुत दिन तक कठोर फैसलों से नहीं भाग सकते। मगर राजनीतिक वर्ग ने अभी खाद्य सुरक्षा विधेयक पारित किया है, जिससे घाटा और महंगाई, दोनों बढ़ेंगे।

अर्थव्यवस्था में यह संकट पिछले कुछ हफ्तों की गतिविधियों का नतीजा नहीं, बल्कि पिछले दशक के दौरान ढांचागत सुधारों के प्रति हमारी निष्क्रियता का परिणाम है। मसलन, ईंधन सब्सिडी को ही लें। रुपये की कमजोरी और कच्चे तेल की कीमतों में इजाफे के कारण पेट्रो सब्सिडी बिल 1,80,000 करोड़ रुपये तक पहुंच जाने की उम्मीद है, जबकि 2013-14 के बजट में इसके लिए सिर्फ 65,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। डीजल सब्सिडी का फायदा किसानों को नहीं, आधारभूत संरचना के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों और एसयूवी मालिकों को मिल रहा है। एलपीजी सब्सिडी का लाभ भी आम आदमी को नहीं, बल्कि ‘खास’ आदमी को है।

स्वीकार्य राजनीतिक समझ तो यही कहती है कि बड़े परिवर्तन के लिए नई सरकार का इंतजार किया जाना चाहिए, पर अर्थव्यवस्था राजनीतिक रूप से शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा नहीं कर सकती। हमें विकास और विश्वास बहाली के लिए लंबी और कम, दोनों तरह की अवधियों वाली योजनाओं की जरूरत है। मसलन-

राष्ट्रीय स्वर्ण बैंक- भारत 800 टन सोने का उपभोक्ता है। हमारे आयात में यह दूसरा सबसे बड़ा उत्पाद है। पिछले 12 महीनों के दौरान 21 अरब डॉलर के बार और सिक्कों का आयात किया गया। अब राष्ट्रीय स्वर्ण बैंक स्थापित करना चाहिए, जो लोगों और मंदिरों से बार और सिक्के जमा करे और बदले में महंगाई सूचकांक के आधार पर नकदी या सोना वापस करे। इससे सोने की घरेलू आपूर्ति बढ़ेगी, आयात कम होगा और डॉलर की बचत होगी।

मंत्रालयों के खर्चों पर अंकुश- भारत अपने कुल खर्च का 80 फीसदी ईंधन आयात पर करता है, जिसका कुल खर्च 180 अरब डॉलर से ज्यादा है। मंत्रियों के भारी-भरकम काफिलों पर रोक लगनी चाहिए। खाद्यान्न की कमी वाले वक्त में लाल बहादुर शास्त्री सप्ताह में एक दिन का उपवास रखते थे। तो फिर मंत्रियों को सप्ताह में एक दिन सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल क्यों नहीं करना चाहिए?

सार्वजनिक परिवहन में निवेश- भारत को लंबी मेट्रो रेल परियोजनाओं विशेषकर टायर-टू शहरों में अवश्य निवेश करना चाहिए। इससे महंगे ईंधन का कुशलतापूर्वक इस्तेमाल हो सकेगा। सार्वजनिक परिवहन में निवेश से रोजगार और विकास को बढ़ावा मिलेगा।

अमूल दो की जरूरत- अब हमें एक और अमूल की जरूरत है, जिससे कृषि उत्पादों के खरीद, भंडारण और विपणन को बढ़ावा मिल सके। सहकारी क्षेत्र का दायरा काफी व्यापक है और वह इसे अंजाम देने में सक्षम है। बस जरूरत राजनीतिक इच्छाशक्ति और वर्गीज कुरियन जैसे शख्स की है।

जीएसटी और डीटीसी- अपर्याप्त कर प्रणाली के कारण हमारा विकास प्रभावित हो रहा है। जीएसटी और डीटीसी को लागू करना चाहिए।

निजीकरण और विनिवेश- सरकार की आय जीडीपी का नौ फीसदी है, जबकि खर्च 15 फीसदी है। इस अंतर को भरने के लिए कर्ज (1,600 करोड़ रुपये रोजाना) का सहारा लिया जाता है, जिससे महंगाई बढ़ती है। आय को बढ़ाने के लिए सरकार को परिसंपत्तियों को बेचना चाहिए। गैर-संवेदनशील क्षेत्रों को निजी क्षेत्र के हवाले कर देना चाहिए। बैंक, तेल, बीमा जैसे क्षेत्र में भी विनिवेश होना चाहिए।

निवेश प्रोत्साहन- विकास के लिए निवेश की जरूरत होती है। जिस अर्थव्यवस्था में पांच लाख करोड़ रुपये की परियोजनाएं रुकी पड़ी हों, उसका विकास कैसे संभव है? समय सीमा के भीतर मंत्रालयों के फैसले होने चाहिए।

परमिशन राज खत्म हो- विश्व बैंक की रैंकिंग में कारोबार करने के मामले में भारत का स्थान काफी नीचे है। यहां कई जगह अनुमति लेनी पड़ती है, जिसमें काफी वक्त लगता है। यहां भ्रष्टाचार भी बहुत ज्यादा है। लिहाजा अनुमति को युक्तिसंगत और मंजूरी से संबंधित कामकाज को ऑनलाइन कर दिया जाए।


भारत एक तरह से आर्थिक आपातकाल की स्थिति में है। अगर राजनीतिक दल यह समझते हैं कि वे नतीजों की परवाह किए बगैर लोकलुभावनी योजनाओं को लागू करते रहेंगे, तो वे भ्रम में हैं। सीधी बात है, यदि विकास नहीं होगा, तो गरीबी बढ़ेगी।

(शंकर अय्यर अर्थशास्त्र की राजनीति के विशेषज्ञ और एक्सीडेंटल इंडिया के लेखक हैं)

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