मीलों चलना अभी बाकी है
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देखा जाए, तो नेपाल में शांति प्रक्रिया की शुरुआत नवंबर, 2005 में दिल्ली में हुई थी। बात आगे बढ़ने पर वर्ष 2006 में समग्र शांति समझौता हुआ, और फिर 2007 में अंतरिम संविधान बना। अप्रैल, 2008 के चुनाव के बाद जब वहां पहली संविधान सभा का गठन हुआ, तो उसने नेपाल को संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने की बात कही थी, जिसका विरोध 601 सदस्यों में से महज चार ने किया था। तब से वहां के स्थानीय लोगों को यही उम्मीद थी कि नेपाल का संविधान सभी आयामों को समेटे होगा। मगर अब जो संविधान लागू किया गया है, वह मील का पत्थर होने के बावजूद कुछ कामों को अधूरा छोड़ गया है।
असल में, वर्ष 2006 और 2007 में वहां जन आंदोलन के जो दो दौर आए, उसमें लोगों की यही आकांक्षा थी कि संविधान में जनजातियों, मधेसियों, दलित और महिला वर्ग को भी पर्याप्त जगह दी जाएगी। मगर नए संविधान में इस दिशा में कमी रही गई। दुखद है कि इस संविधान की घोषणा ऐसे वक्त हुई है, जब अधिकांश तराई क्षेत्रों में (जहां नेपाल के कुल 75 जिलों में से 20 जिले हैं) में कर्फ्यू लगा है। यानी काठमांडू में तो फुलझड़ियां चमक रही हैं, मगर मधेस में अंधकार छाया है। वहां अभी पूरी तरह ब्लैक आउट है। स्थिति यह है कि दैनिक श्रमिक भी, जो हर दिन कमाने के बाद ही शाम को निवाला पाते हैं, आंदोलन कर रहे हैं। यानी एक विचित्र माहौल में वहां संविधान लागू किया गया है, जो नेपाल के भविष्य के लिए ठीक नहीं है।
भारत की चिंता यह है कि अगर नेपाल में अराजकता फैलेगी या वहां राजनीतिक अस्थिरता बढ़ेगी, तो उसका असर हम पर भी पड़ेगा। हम सिर्फ इसलिए प्रभावित नहीं होंगे कि नेपाल से कुछ हजार लोग हिंदुस्तान, खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश में आ जाएंगे। अलबत्ता हमारे क्षेत्रों में वे आसानी से समाते रहे हैं, क्योंकि साठ लाख नेपाली तो अब भी भारतीय क्षेत्र में बिना किसी भेदभाव से रहते हैं। हमारी मुश्किल यह है कि अन्य पड़ोसी देशों के विपरीत नेपाल और भारत के परस्पर संबंध आम लोगों के आपसी संबंधों पर आधारित हैं, जिस कारण नेपाल के साथ हमारा रोटी-बेटी का रिश्ता है। ऐसे में अगर वहां हालात बिगड़ते हैं, तो हम प्रभावित होंगे ही।
यह कहा जाता है कि नेपाल में भारत हस्तक्षेप कर रहा है। मगर मेरा मानना है कि हमारी गलती संभवतः यह रही कि नेपाल में संविधान बनाने की प्रक्रिया में भारत ने हिस्सेदारी करने की अनिच्छा दिखाई। भारत ने सिर्फ एक अच्छे दोस्त की तरह नेपाल का संविधान बहुमत से नहीं, सर्वसम्मति से बनाने को कहा। यह इस वजह से भी जरूरी है, क्योंकि हमारे आसपास के जितने भी लोकतांत्रिक देशों (चीन को छोड़कर) में संविधान बने हैं, सभी जगह संविधान सभा के हर सदस्यों की सहमति संविधान के प्रावधानों पर रही। फिर चाहे बात बांग्लादेश (1972 में संविधान का निर्माण) की हो, या पाकिस्तान (1973) की। यहां तक कि भूटान (2008) में भी ऐसा ही हुआ। मगर नेपाल का संविधान हमारे निकटवर्ती देशों में पहला संविधान है, जिसमें बहुमत के आधार पर फैसला हुआ, और सर्वसम्मति पीछे छूट गई। इतना ही नहीं, जिन आकांक्षाओं को लेकर लोगों ने आंदोलन किया, उन्हें भी संविधान में जगह नहीं दी गई। लिहाजा भारत ज्यादा चिंतित है, जो स्वाभाविक है।
अच्छी बात शायद यह है कि अब भी वहां बिगड़ी हुई बात बन सकती है। संविधान में संशोधन के जरिये सभी विवादित मुद्दों का हल निकाला जा सकता है। मसलन, सातों प्रांतों के सीमांकन में सावधानी रखकर सीमा विवाद सुलझाया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि तराई क्षेत्र नेपाल का एक-चौथाई हिस्सा है, जहां मधेसियों की संख्या (हिंदी, मैथिली, मगही, भोजपुरी बोलने वाले लोग) नेपाल की कुल जनसंख्या का एक-तिहाई है। जिन सात प्रदेशों में नेपाल को बांटा गया है, उनमें से एक प्रदेश आठ मधेसी जिलों को मिलाकर बनाया गया है, जबकि शेष 12 जिलों को अलग-अलग पहाड़ी प्रांतों में बांट दिया गया है। अच्छा होगा कि नेपाल के पूर्वी हिस्सों में झापा को छोड़कर सुनसरी और मोरंग जिलों के पहाड़ी हिस्सों को पहाड़ी प्रदेशों में मिला दिया जाए, और विराटनगर शहर और सुनसरी-मोरंग के मधेसी इलाकों को मधेसी प्रांत में मिला दिया जाए। इसी तरह, पश्चिम नेपाल में पहाड़ी जिलों को अन्य पहाड़ी प्रांतों में मिलाकर एक अन्य मधेसी प्रदेश की रूपरेखा तैयार की जा सकती है, जिसमें कैलाली जिले में से चार क्षेत्रों को, जहां थारू लोग बहुतायत में हैं, जोड़ना जरूरी है। इससे मधेसियों को नए प्रांत में राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलने का भरोसा बढ़ेगा।
इसी तरह, जनजाति, दलित, मधेसी, और महिला वर्ग को देश की उच्च इकाइयों में समानुपातिक प्रतिनिधित्व देने का जो फैसला अंतरिम संविधान में हुआ था, और जिसे नए संविधान में कमजोर कर दिया गया है, उस पर भी पर्याप्त गौर करना होगा। वहां मुद्दा उस परिसीमन का भी है, जिसके तहत प्रत्यक्ष निर्वाचन की 165 सीटों में सिर्फ 65 सीटें ही तराई क्षेत्र को दी गई हैं, जबकि बहुतायत में आबादी वहीं बसती है। चूंकि अंतरिम संविधान में सीमांकन संबंधी प्रावधान जनसंख्या के आधार पर किए जाने की बात कही गई थी, इसलिए तराई क्षेत्रों को कम से कम 83 सीटें देकर यह मुद्दा सुलझाया जा सकता है।
ऐसा नहीं है कि यह काम बहुत मुश्किल है। नेपाल ने पिछले दस वर्षों में जिन कठिनाइयों को पार किया है, उसके सामने ये बौनी हैं। राजतंत्र से लोकतंत्र बनना, माओवादियों को मुख्यधारा में शामिल करना, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को नेपाली सेना में मिलाना और गृहयुद्ध से निपटते हुए बेहतर प्रशासन स्थापित करना आसान काम नहीं था। अब जरूरत है, तो नेपाली कांग्रेस, एमाले और माओवादियों को अपने उन वायदों को पूरा करने की, जो उन्होंने अंतरिम संविधान में किया था। जिन परिस्थितियों से यह देश उबरा है, उम्मीद यही करेंगे कि जल्दी ही वह इन समस्याओं से भी पार पा लेगा। अन्यथा वहां समावेशी लोकतंत्र स्थापित नहीं हो पाएगा।
(हेमेन्द्र मिश्र से बातचीत पर आधारित)