यादों का जादू: यादें ही हमें हमारे होने का एहसास कराती हैं, इन्हें हम कभी नहीं भुला पाते
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विस्तार
आपने कभी सोच कर देखा है कि आखिर वह कौन-सी सबसे पुरानी याद है, जो अब तक आपके जेहन में बसी है। अगर अब तक आपने इस बारे में नहीं सोचा, तो आंखें बंद कीजिए और अपने अतीत में झांकने की कोशिश कीजिए। एक साल पहले, दो साल पहले, दस साल पहले या फिर तीस साल पहले या उससे भी पहले, अपनी सबसे पुरानी याद तक पहुंचने की कोशिश कीजिए। जब आप अपने शुरुआती जीवन की उस अंतिम स्मृति तक पहुंच जाएं, तो वहीं ठहरने की कोशिश करें। यह वाकई तरोताजा करने वाला अनुभव होगा।
दरअसल, ये यादें ही हमें हमारे होने का एहसास कराती हैं। स्कूल में बना पहला दोस्त, कॉलेज का अंतिम दिन, माता-पिता के साथ बिताए वे अंतिम पल, नौकरी का पहला दिन या फिर जिंदगी में मिली कोई ठोकर, कई ऐसी घटनाएं होती हैं, जिन्हें हम कभी भुला नहीं पाते। समय-समय पर इन घटनाओं की पूरी रील दिमाग में चंद सेकंडों में ही घूम जाती है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस के प्रोफेसर और व्हाई वी रिमेंबर के लेखक चरण रंगनाथ कहते हैं कि हमारी यादें ही होती हैं, जिनके आधार पर हम वर्तमान और भविष्य को निर्धारित करते हैं। हमारे मस्तिष्क में असंख्य यादें संजोने की क्षमता है, लेकिन कौन-सी याद कितने समय तक टिकी रहती, यह निर्भर करता है घटनाक्रम में हमारी संलिप्तता पर। जब कोई व्यक्ति अपने किसी नजदीकी रिश्तेदार का नाम या फोन नंबर भूल जाता है या फिर घर में चाबी कहां रखी है, यह भूलने लगता है, तो उसे लगता है कि उसकी याददाश्त कमजोर हो रही है। हालांकि यह हमेशा सही नहीं होता। हालांकि यह सच है कि उम्र बढ़ने के साथ धीरे-धीरे याददाश्त पर भी असर पड़ने लगता है। लेकिन क्या आपको पता है कि आप अपनी याददाश्त को जवां भी रख सकते हैं? याददाश्त को मजबूत बनाए रखने के दो तरीके हैं-पहला तरीका ‘ट्रांसक्रेनियल अल्टरनेटिंग करंट स्टिमुलेशन’ (टीएसीएस) यानी स्मृति ह्रास की संभावित चिकित्सा से इलाज करवाकर। दूसरा तरीका है-मस्तिष्क को सचेत रखकर।
टीएसीएस पद्धति
नेचर न्यूरोसाइंस पत्रिका में हाल में प्रकाशित निष्कर्षों में वैज्ञानिकों ने बताया कि स्मृति दिमाग में व्यापक रूप से फैले हुए नेटवर्क का उपयोग करती है और यह धीमी-आवृत्ति वाली थिरकती लयों के माध्यम से उन अंतःक्रियाओं का समन्वय करती है, जिन्हें थीटा तरंगें कहा जाता है। माना जाता है कि यह तकनीक दूर के सर्किटों को एक-दूसरे से जोड़कर स्पष्ट संचार को सक्षम बनाती है। टीएसीएस पद्धति सबसे ज्यादा आकर्षक शायद इसलिए मानी जाती है, क्योंकि याददाश्त मजबूत करने के अन्य उपायों, जिनमें मस्तिष्क सर्जरी की आवश्यकता होती है, के विपरीत इसमें किसी तरह का प्रत्यारोपण नहीं होता है। इसमें बहुत कम संवेदना वाली उत्तेजना को दिमाग से होकर गुजारा जाता है। हालांकि अभी यह पद्धति शुरुआती चरण में ही है, और जोखिम व फायदों का आकलन अभी पूरी तरह से नहीं किया जा सका है। पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के मस्तिष्क वैज्ञानिक माइकल का कहना है कि यदि यह तकनीक उम्र से संबंधित स्मृति ह्रास और संभवतः डिमेंशिया के उपचार के लिए एक गेम चेंजर हो सकती है।
बुजुर्ग और याददाश्त
नए अध्ययन के लिए बोस्टन विश्वविद्यालय के न्यूरोसाइंटिस्ट रॉबर्ट एमजी रेनहार्ट और जॉन ए गुयेन ने वयस्कों और 60-70 वर्ष के लोगों के दो समूहों को प्रयोगशाला में आमंत्रित किया। न्यूरोनल फायरिंग की प्रक्रिया विद्युत आवेगों और न्यूरोट्रांसमीटर के माध्यम से न्यूरॉन्स के बीच संचार के रूप में होती है। वैज्ञानिकों ने प्रत्येक व्यक्ति के मस्तिष्क में ‘संयोजन’ को सुधारने के लिए टीएसीएस तकनीक का उपयोग किया। खोपड़ी में निर्मित इलेक्ट्रोडों द्वारा 25 मिनट तक कोमल उत्तेजना प्रदान करने के बाद, बुजुर्ग व्यक्तियों ने स्मृति परीक्षणों में वयस्कों के समान ही अच्छा प्रदर्शन किया। अध्ययन में पाया गया कि टीएसीएस ट्यूनिंग से युवाओं की तुलना में बुजुर्गों को अधिक फायदा हुआ, जो बताता है कि यह उपकरण स्मृति को बढ़ाने में ज्यादा लाभदायक है।
याददाश्त प्रयासहीन नहीं होती
याददाश्त को दीर्घकाल तक बनाए रखने का दूसरा तरीका सहज, सरल और प्राकृतिक है। इसमें किसी चिकित्सा की जरूरत नहीं, बस अपना फोकस बढ़ाना है। प्रो. रंगनाथ के अनुसार, लोगों में भ्रम है कि याददाश्त प्रयासहीन होनी चाहिए। दूसरा भ्रम यह है कि याददाश्त को अतीत का संग्रह माना जाता है, जो एक फिल्म की तरह हमारे दिमाग में दोहराने में सक्षम है। यदि याददाश्त प्रयासहीन होती, तो फिर हमारे जीवन में घटने वाली हर बात याद क्यों नहीं रहती। वह कहते हैं कि कई बार दो सेकंड की हुई बात बीस बरस बाद भी याद आती है। अगर हम अपने जीवन के कुछ पलों को यादगार बनाकर रखना चाहते हैं, तो उन पलों में उतनी ही सजगता दिखानी होगी। उदाहरण के लिए, यदि आप बच्चों के साथ हैं, पार्क में हैं, तो अपना ध्यान उन बातों पर केंद्रित करें, जो अच्छी हैं, मनोनुकूल हैं, न कि कष्टप्रद। आप वहां की ध्वनियों, सुगंधों और दृश्यों पर फोकस करेंगे, तो बाद में आप उनको याद कर पाएंगे। कई बार हम ऐसे काम करते हैं, जिनसे हमारा ध्यान भटकता है, फोन अलर्ट मोड पर रहता है या बार-बार मेल चेक करने की आदत है। इन सबसे हम कई सुनहरी यादों को संजोने से वंचित रह जाते हैं। यदि आपने अपना कोई समय बच्चों के लिए निर्धारित किया है, तो उस दौरान फोन में न तो मेल चेक करें, न ही अलर्ट मोड पर डालें। निश्चित रूप से तकनीक हमारी यादों को संरक्षित कर सकती है, लेकिन उस तरह नहीं, जैसा हमारा दिमाग रखता है। आप किसी यात्रा पर गए हैं और धड़ाधड़ फोटो खींचते चले जा रहे हैं, परंतु आपका ध्यान कहीं और लगा हुआ है, तो आप उन पलों का आनंद नहीं ले सकेंगे। दूसरी ओर, जब आप तस्वीरों को पूरा मन लगाकर खींचते हैं, तो वहां का पूरा वातावरण आपकी स्मृति में समा जाता है। प्रो. रंगनाथ बताते हैं कि चालीस वर्ष पहले वह एक संगीत कार्यक्रम में गए थे, उसकी यादें अब भी ताजा हैं, क्योंकि उसमें उनकी संलिप्तता थी। वह कहते हैं कि यादें अच्छी या बुरी किसी भी तरह की हो सकती हैं। लोग सोचते हैं कि बुरी यादों को पूरी तरह अपनी स्मृति से मिटा दिया जाए, तो ऐसा संभव नहीं है।