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मीडिया, पुलिस और जनमत

Sun, 30 Aug 2015 07:49 PM IST
नीलांजन मुखोपाध्याय
नीलांजन मुखोपाध्याय Updated Sun, 30 Aug 2015 07:49 PM IST
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Media, police and public

हम भारतीय संपन्न लोगों से संबंधित हत्या के मामले की रिपोर्टिंग करने और उसे पढ़ने में काफी दिलचस्पी लेते हैं। ऐसे मामलों में मीडिया हमेशा जांच पूरी होने से पहले ही अपना फैसला सुना देता है। पहली बार वर्ष 1959 में मीडिया ने नानावटी हत्या मामले में निर्णायक काम किया था, जब ज्यूरी ने मीडिया से बेहद प्रभावित होते हुए जोशीले नौसेना अधिकारी कमांडर कावस मानेकशॉ नानावटी को दोषी नहीं ठहराया था। वह अपने एक व्यवसायी मित्र प्रेम आहूजा की हत्या के आरोपी थे, क्योंकि नानावटी की ब्रिटिश मूल की पत्नी सिल्विया के साथ आहूजा का अवैध रिश्ता था। हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट ने ज्यूरी के उस फैसले को पलट दिया। नतीजतन नानावटी दोषी पाए गए और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। इसके बावजूद मीडिया के दबाव और समाज के अभिजात वर्ग की लॉबिंग के कारण सरकार ने अप्रत्याशित फैसला लिया और कमांडर नानावटी को राष्ट्रपति की ओर से माफी दे दी गई। साफ है कि उस मामले में मीडिया ने पहले ही फैसला सुना दिया था, जिस कारण समाज यह तर्क देने में सक्षम हुआ कि दो दोस्तों के बीच हुए वाद-विवाद की तीव्रता के कारण आहूजा का निधन हुआ, और नानावटी वास्तव में पीड़ित था, क्योंकि उसके उस प्लेबॉय कार डीलर दोस्त ने उसकी पत्नी को ही बहकाया था।

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हाल के वर्षों में आरुषि तलवार हत्याकांड सुर्खियों में रहा और उसके माता-पिता को उसकी हत्या का दोषी पाया गया। इस तथ्य के बावजूद, कि अभियोजन पक्ष उन्हें दोषी साबित करने वाले ठोस सुबूत उपलब्ध कराने में नाकाम रहा, तलवार दंपति अभी जेल में हैं। यह देखना बाकी है कि हाई कोर्ट तलवार दंपति को बरी करता है या उनकी सजा की पुष्टि करता है। नानावटी मामले की तरह, आरुषि मामले में भी पर्याप्त स्रोत के बिना पारिवारिक निजी बातों के बारे में मीडिया में काफी कुछ कहा गया।
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इन दो पुराने मामलों की तरह अब इंद्राणी मुखर्जी के कई पुरुषों के साथ निजी संबंधों के बारे में बेहद सनसनीखेज बातें अज्ञात स्रोतों के आधार पर लिखी एवं कही जा रही हैं। इनमें से ज्यादातर सूचनाएं दुर्भाग्य से या तो पुलिस की चुनिंदा लीक्स की वजह से छन-छनकर सामने आ रही हैं या वैसे लोगों की तरफ से, जिनकी विश्वसनीयता पहले से ज्ञात नहीं है। कायदे से पुलिस को मामले का पूरी तरह से खुलासा तभी करना चाहिए, जब अपने दावे को सही ठहराने के लिए उसके पास पर्याप्त सुबूत हों। इसके बावजूद उसका यह गैरजिम्मेदाराना व्यवहार न तो पहली बार है और न ही आखिरी बार। पुलिस को यह याद रखना होगा कि मृतक की प्रतिष्ठा का भी सम्मान करना चाहिए।
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इंद्राणी मुखर्जी का मामला सामने आने के बाद मैं एक टीवी कार्यक्रम में शामिल था। चर्चा के विषय को नाटकीय ढंग से तैयार किया गया था- कैसी मां, जिसने अपनी बेटी की हत्या की? इससे पहले कि मैं इस पर आपत्ति जताता, एक अन्य विशेषज्ञ ने, जो शुक्र है कि महिला ही थीं, आपत्ति जताते हुए कहा कि यह सवाल ऐसा है, मानो जांच से पहले ही इंद्राणी को हत्या का दोषी मान लिया गया हो।

भारतीय समाज में बहुविवाहित महिलाओं और पुरुषों की मिथकीय कथाएं आम हैं। तो क्यों इंद्राणी मुखर्जी के ज्ञात तीन या अधिक पति होने के तथ्य को नैतिकता की दृष्टि से गलत मानना चाहिए? पुलिस ब्रीफिंग, टीवी बहस और मीडिया में बार-बार जिस तरह से इस पर जोर दिया गया, उससे लगता है कि जो भी स्त्री एक से अधिक बार विवाह करती है, वह संभावित कातिल है। और यदि, उसने दो बार से ज्यादा शादी की है, तो उसके कातिल बनने की आशंका हर विवाह के साथ बढ़ती जाती है। किस तरह का विकृत तर्क है यह? आखिर अपने से काफी कम उम्र की लड़की के साथ शादी करने के पीटर मुखर्जी के फैसले पर सवाल क्यों नहीं उठाया गया? यह सवाल उठाते हुए मैं यह नहीं कर रहा कि पुरुषों को केवल हमउम्र महिलाओं से ही शादी करनी चाहिए, लेकिन अगर किसी महिला के विवाह के फैसले को कठघरे में खड़ा किया जा सकता है, तो फिर पुरुषों को क्यों नहीं?

इसी तरह यह सूचना, कि शीना संभवतः इंद्राणी के सौतेले पिता की बेटी थी, भारतीय परिवारों में लड़कियों के यौन शोषण का एक भयानक संकेत है, और यह भी कि समाज का यह स्याह रहस्य कैसे अब भी बना हुआ है। इसे भी कामुक गपशप का विषय बनाया गया और इस तरह से पेश किया गया, जिससे लगता है कि इंद्राणी 'स्वच्छंद' थी। इसका सामान्य निष्कर्ष है कि चूंकि वह स्वच्छंद थी, इसलिए वह कातिल है।

इंद्राणी मुखर्जी अदालत में शीना बोरा की हत्यारिन साबित होती है, तब भी वह सहानुभूति की कमोबेश हकदार होगी, क्योंकि इस तथ्य की अनदेखी कैसे कर सकते हैं कि उसके साथ एक ऐसे व्यक्ति ने बलात्कार किया, जो आधिकारिक रूप से उसका संरक्षक था? बेशक युवावस्था में हुआ 'उत्पीड़न' किसी भी तर्क से बाद में 'अपराध' से छूट का कारण नहीं हो सकता, पर बिना उम्र, स्वास्थ्य व आर्थिक स्थिति का लिहाज किए उसके सौतेले पिता के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने की पहल जरूर होनी चाहिए।


समाज के कुछ हिस्सों में इस मामले के खुलासे में काफी दक्षता दिखाने के लिए पुलिस की प्रशंसा की गई है। फिर भी सवाल पूछा गया कि राहुल मुखर्जी के काफी प्रयासों के बावजूद वर्ष 2012 में पुलिस ने शीना बोरा का पता लगाने की कोशिश क्यों नहीं की? पुलिस ने इंद्राणी मुखर्जी, उसके पति या शीना को जानने वाले लोगों से पूछताछ क्यों नहीं की थी? आखिर परिवार के अलावा भी उसके दोस्त एवं परिचित थे। ऐसा क्यों हुआ कि उसकी लाश की पहचान के लिए पुलिस ने मामूली प्रयास किया और उसे रूटीन स्तर पर निपटाया? तथ्य यह है कि पुलिस ने तत्परता इसलिए दिखाई, क्योंकि इस अपराध में अभिजात वर्ग के लोग शामिल हैं और यह जानते हुए कि इसे मीडिया में शीर्ष वरीयता मिलेगी। जब पुलिस की तत्परता सिर्फ टीवी चैनलों की जरूरतों और लोगों की नजरों में आने के लिए हो, तो इसे बहुत अच्छी स्थिति नहीं मान सकते।

-वरिष्ठ पत्रकार, और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक

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