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मुफ्ती की बातों का मतलब

Tue, 03 Mar 2015 07:27 PM IST
अजय बोस
अजय बोस Updated Tue, 03 Mar 2015 07:27 PM IST
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meaning of Mufti's statement

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) एवं पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के बीच हुए ऐतिहासिक, लेकिन असहज गठबंधन के परवान चढ़ने से पहले ही खत्म होने का खतरा पैदा हो गया है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों को आभास था कि परस्पर विरोधी विचारधारा वाले सहयोगियों की इस गठबंधन सरकार के लिए राह आसान नहीं होगी। लेकिन किसी को ऐसी आशंका नहीं थी कि नई सरकार के शपथ ग्रहण के चौबीस घंटे के भीतर ही समस्याएं शुरू हो जाएंगी।

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जाहिर है, मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद इतने अनुभवी राजनेता हैं कि सार्वजनिक रूप से वह और उनकी पार्टी के नेता गलती से ऐसा भड़काऊ बयान नहीं दे सकते। इसमें संदेह नहीं कि शांतिपूर्ण विधानसभा चुनाव के लिए पाकिस्तान और अलगाववादियों की तारीफ से लेकर भाजपा के भड़कने के बावजूद अफजल गुरु के अवशेष को कश्मीर लौटाने की मांग एक सोची-समझी रणनीति है। शुरू में ही विवादित मुद्दों पर खुलेआम इस तरह का रुख अपनाकर पीडीपी नेता भाजपा को एक स्पष्ट संदेश देने की उम्मीद कर रहे हैं कि छह वर्षों के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी की खातिर उन्होंने खुद को बेच नहीं दिया है।
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सच तो यह है कि नेशनल कांफ्रेंस, जो कश्मीर घाटी और जम्मू के इलाकों में हमेशा एक स्वायत्त राजनीतिक पार्टी रही है, के विपरीत पीडीपी पहले कांग्रेस से अलग हुआ एक गुट थी, जो बाद में विभिन्न तरह के अलगाववादी एवं उग्रवादी गुटों, जिनमें से कुछ को पाकिस्तान का समर्थन हासिल था, की सहमति और बढ़ावे के कारण स्थानीय राजनीति में आंशिक तौर पर अपनी जगह बना पाई।
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ऐतिहासिक रूप से अलगाववादी, उग्रवादी और इस्लामाबाद में एक के बाद एक आने वाली सरकारें पीडीपी के मुकाबले नेशनल कांफ्रेंस के प्रति ज्यादा आलोचनात्मक रही हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि मुफ्ती सईद ने इन समर्थकों के साथ-साथ घाटी के लोगों को आश्वस्त किया है कि न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर समझौता करके सरकार बनाने के बावजूद उन्हें भाजपा की कठपुतली के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

ऐसा नहीं है कि मुख्यमंत्री को इस बात का एहसास नहीं है कि उन्होंने भाजपा को बुरी तरह से शर्मिंदा किया है। लेकिन पुराने चतुर राजनेता तीन कारकों पर निर्भर हैं और मानते हैं कि यह भाजपा को उनकी सरकार से समर्थन वापस लेने से रोकेगा। इसमें सबसे पहला है, जम्मू के भाजपा विधायकों की सरकार में शामिल होने की जबर्दस्त इच्छा। यही वजह है कि संघ परिवार और मोदी सरकार के भीतर भारी बेचैनी के बावजूद सत्तारूढ़ गठबंधन का जन्म हुआ। वर्षों से सत्ता के भूखे जम्मू के भाजपा नेता सरकार में शामिल होने के लिए अधीर हैं और वे अपने निजी हितों के लिए विचारधारात्मक दबाव की भी अनदेखी कर सकते हैं।

मुफ्ती सईद यह भी जानते हैं कि संघ परिवार के कम से कम दो कद्दावर नेता सरकार बचाने की कोशिश करेंगे। इनमें पहले हैं भाजपा के अध्यक्ष और प्रधानमंत्री मोदी के दाहिने हाथ अमित शाह, जिन्होंने गठबंधन के लिए काफी समय और संसाधन खर्च किया है। गठबंधन के अशोभनीय और अचानक पतन से उनके राजनीतिक कौशल पर धब्बा लगेगा और यह कुछ ऐसा है, जिसे शाह विशेष रूप से दिल्ली के चुनाव में भाजपा की जबर्दस्त हार के बाद बर्दाश्त नहीं कर सकते।

दूसरे संघ नेता, जो पीडीपी की हरकतों को कमतर बताने के लिए बेचैन होंगे, वे हैं आरएसएस के महासचिव राम माधव, जिन्होंने स्पष्ट विरोधाभासों के बावजूद भाजपा-पीडीपी गठबंधन के लिए मजबूती से जोर डाला। उन्हें संघ परिवार के शीर्ष नेतृत्व को सहमत करने के लिए काफी हद तक जिम्मेदार माना जाता है, जैसे कि अमित शाह ने अपने बॉस नरेंद्र मोदी को समझाया कि विचारधारा के स्तर पर असंगत भागीदारी न केवल संभव है, बल्कि जरूरी भी है। अगर गंभीर संकटों के कारण सरकार को चोट पहुंचती है, तो भाजपा अध्यक्ष की तरह ही संघ परिवार के यह चतुर नेता, जो बहुत ज्यादा महत्वाकांक्षी समझ जाते हैं, को भी व्यक्तिगत हानि उठानी पड़ेगी।

फिर भी मुफ्ती सईद द्वारा खेले जा रहे राजनीतिक खेल के जोखिम को कम नहीं किया जा सकता। घाटी के अपने समर्थकों को इस बात के प्रति आश्वस्त करने की कोशिश में कि वे भाजपा के हाथों बिक नहीं गए हैं, वह अनजाने में जम्मू के लोगों के बीच मौजूदा फासले को भी बढ़ाने के लिए ध्रुवीकरण कर सकते हैं, जिनकी अपने विधायकों के विपरीत सत्ता में कोई हिस्सेदारी नहीं है। असल में इस बात को लेकर जम्मू में भाजपा के प्रति पहले से ही असंतोष है कि कश्मीर का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति को छह वर्षों के लिए मुख्यमंत्री पद सौंपने पर वह सहमत हो गई। लगता है नए मुख्यमंत्री अलगाववादियों, आतंकियों और यहां तक कि पाकिस्तान का कर्ज उतारने पर जोर देकर जम्मू के लोगों को कम महत्व दे रहे हैं, जो उनके और पीडीपी के राजनीतिक एजेंडे के प्रति गहरे संदेह में हैं।

इसके अलावा जम्मू-कश्मीर में पीडीपी-भाजपा सरकार के गठन के तुरंत बाद उपजे इस विवाद का व्यापक राष्ट्रीय प्रभाव भी माना जा रहा है। हुर्रियत, आतंकियों, पाकिस्तान और अफजल गुरु के प्रति देश भर के ज्यादातर लोगों और सबसे ज्यादा भाजपा एवं आरएसएस समर्थक कट्टर राष्ट्रवादी हिंदुओं में आक्रोश है। जम्मू-कश्मीर में भले ही पहली बार भाजपा सत्ता में हिस्सेदारी कर रही है, लेकिन महज इतने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महत्वपूर्ण वोट बैंक को नाराज करने की राजनीतिक कीमत बहुत ज्यादा है।


अगर ऐतिहासिक रूप से देश के सबसे ज्यादा अशांत राज्य में नई राजनीतिक जमीन तोड़ने के लिए मिले ऐतिहासिक अवसर से स्थितियां बेहतर होने के बजाय बदतर हों, तो यह वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण होगा।

वरिष्ठ पत्रकार और बहनजी- ए पॉलिटिकल बायोग्राफी ऑफ मायावती के लेखक

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