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राजपक्षे बंधु की मजबूती का मतलब, बता रहे हैं के. एस. तोमर
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महिंदा राजपक्षे
- फोटो : Facebook
श्रीलंका के संसदीय चुनाव में प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के नेतृत्व में श्रीलंका पीपुल्स पार्टी (एसएलपीपी) की शानदार जीत भारत के लिए खतरे की घंटी होनी चाहिए, क्योंकि भारत और चीन के बीच से निपटते हुए श्रीलंका का झुकाव चीन की तरफ होता है।
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गौरतलब है कि 225 सीटों वाली संसद में महिंदा राजपक्षे की पार्टी ने 145 और सहयोगी दलों के साथ कुल 150 सीटें जीती हैं, जो कि दो तिहाई बहुमत है। तथ्य यह भी है कि फरवरी, 2020 में भारत दौरे पर आए श्रीलंकाई प्रधानमंत्री महिंदा ने कहा था कि भारत के साथ हमारे संबंध हैं, जबकि अन्य राष्ट्र मित्र हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करना भारत का अंदरूनी मामला है और श्रीलंका उसमें कोई दखल नहीं देगा।
विदेश नीति के विश्लेषकों के अनुसार राजपक्षे परिवार का उत्थान भारत के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे (जो उनके भाई हैं) के उस बयान का समर्थन किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि उनकी सरकार पूर्ववर्ती सरकार और नई दिल्ली के बीच हुए लाखों डॉलर के बंदरगाह समझौते की समीक्षा करेगी।
भारत और जापान संयुक्त रूप से समझौते के तहत नए ईस्ट कंटेनर टर्मिनल का विकास करने वाले थे। राजपक्षे बंधुओं ने अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के क्वॉड द्वारा, जो चीन के बढ़ते भू-राजनीतिक प्रभाव का मुकाबला करना चाहते हैं, दी जा रही वित्तीय पेशकश भी ठुकरा दी।
भारत ने श्रीलंका की तुलना में तेजी से शिपिंग और बंदरगाहों के कारोबार को उदार बनाया है। हालांकि, नव निर्मित भारतीय बंदरगाह श्रीलंका के प्रतिस्पर्धी होंगे। द्विपक्षीय संबंधों का मूल्यांकन करने के लिए भारतीय वित्तीय सहायता की तुलना करना महत्वपूर्ण होगा।
मौजूदा बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पड़ोसी देशों के बीच 8,415 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बनाई है, जिसमें नेपाल के लिए 1,050 , भूटान के लिए 2,802 , मॉरीशस के लिए 1,100, मालदीव के लिए 567, जबकि श्रीलंका के लिए केवल 250 करोड़ रुपये हैं। यदि इन देशों की आबादी के हिसाब से तुलना करें, तो विषमता स्पष्ट नजर आती है। दूसरी तरफ, पिछले दशक में श्रीलंका के लिए भारत का योगदान भूटान के लिए वार्षिक प्रतिबद्धता से भी कम है। यानी भेदभाव स्पष्ट है।
भूटान, मालदीव एवं नेपाल की तरह श्रीलंका भी भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। अन्यथा, भारत के लोग हम्बनटोटा बंदरगाह पर चीनी पदचिह्न को लेकर क्यों विफरते? विशेषज्ञों का मानना है कि महिंदा राजपक्षे द्वारा दिल्ली में ऋण स्थगन की मांग के पांच महीने बाद दोनों देशों के अधिकारियों ने मुलाकात की।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा पांच महीने बाद और राजपक्षे की जीत के बारह दिनों के भीतर 45 करोड़ डॉलर देने के फैसले को हिचकचाहट के रूप में ही देखा जा सकता है। इसके विपरीत चीन ने श्रीलंका के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करने के तुरंत बाद मध्य मार्च में उसे रियायती शर्तों के साथ 50 करोड़ डॉलर दिया था, जब कोविड-19 के कारण श्रीलंका के सामने वित्तीय संकट खड़ा हुआ।
चीन ने उसकी आर्थिक मदद में देरी नहीं की। श्रीलंका-चीन-भारत की धुरी जटिल है। पड़ोसी देशों का चीन की तरफ बढ़ता झुकाव भारत के लिए चिंताजनक है। लेकिन चीनी सहायता की तुलना भारत के सहायता पैकेज से करने से फर्क समझ में आता है।
श्रीलंका के संदर्भ में स्पष्ट बहुमत का मतलब है कि राजपक्षे बंधु संविधान में संशोधन करने, राष्ट्रपति के कार्यकाल की सीमा खत्म करने की ओर अग्रसर होंगे। इसका यह भी मतलब है कि वे पुलिस बल और न्यायपालिका पर भी नियंत्रण करेंगे।
आलोचकों को डर है कि 2009 में दशकों पुराने तमिल अलगाववादी विद्रोहियों को कुचलने के लिए कुख्यात राजपक्षे बंधु नई पीढ़ी तक अपनी वंशवादी सत्ता का विस्तार करेंगे। हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि प्रधानमंत्री की कीमत पर राष्ट्रपति की ताकत को बढ़ाने की कोशिश से दोनों भाइयों के बीच प्रतिद्वंद्विता बढ़ सकती है।
विपक्षी दल सरकार पर भ्रष्टाचार, सेंसरशिप और धमकाने का आरोप लगाते हैं। भारतीय शुभचिंतकों को लगता है कि मजबूत राजपक्षे की जोड़ी का मतलब संतुलन और भारत के अनुकूल श्रीलंका है। राजपक्षे के चुनाव जीतने के बाद सबसे पहले प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें बधाई देते हुए कहा कि दोनों देश द्विपक्षीय सहयोग के सभी क्षेत्रों को आगे बढ़ाने और अपने विशेष संबंधों को हमेशा नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए मिलकर काम करेंगे।
राजपक्षे ने भी प्रधानमंत्री मोदी को धन्यवाद देते हुए ट्वीट कर कहा कि मैं दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे सहयोग को और बढ़ाने के लिए आपके साथ मिलकर काम करना चाहता हूं। श्रीलंका और भारत मित्र और रिश्तेदार हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि श्रीलंका की अर्थव्यवस्था की बदहाली भारत को एक अवसर प्रदान करती है। श्रीलंकाई सरकार को भारी ऋण और पुनर्पूंजीकरण के संकट का सामना करना पड़ रहा है, जिसे कोविड-19 महामारी ने बढ़ा दिया है। यह अनुमान लगाया जाता है कि श्रीलंका के ऋण चुकाने की दर अगले पांच वर्षों तक लगभग चार अरब डॉलर प्रति वर्ष होगी। विश्व बैंक के मुताबिक, श्रीलंका की अर्थव्यवस्था के इस वर्ष 3.2 फीसदी सिकुड़ने की आशंका है। श्रीलंका पर भारत का लगभग 96 करोड़ डॉलर बकाया है।
फिर भारत को एक और मौका संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में मिलेगा, जहां श्रीलंका के गृहयुद्ध के अंतिम महीनों में वहां के सुरक्षा बलों द्वारा कथित युद्ध अपराध की जवाबदेही के लिए पश्चिमी देशों द्वारा दबाव बनाए रखने की उम्मीद है। भारत का दक्षिणी क्षेत्र भावनात्मक रूप से श्रीलंकाई तमिलों से जुड़ा हुआ है। 22 लाख से ज्यादा श्रीलंकाई तमिल बोलते हैं। उसका उत्तरी और पूर्वी इलाका भारत से करीब से जुड़ा है। इसलिए श्रीलंकाई चुनाव के नतीजे भारत के लिए एक अवसर है।