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एक साथ चुनाव कराने का मतलब
देवेन्द्र सिंह असवाल
Updated Sun, 04 Mar 2018 07:24 PM IST
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वर्तमान बजट सत्र के उद्घाटन भाषण में संसद के दोनों सदनों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने चिंता व्यक्त की कि बार-बार चुनाव होने से मानव संसाधन पर बोझ पड़ता ही है। साथ ही, आचार संहिता लागू होने से ‘देश की विकास प्रक्रिया भी बाधित होती है।’ अत: उन्होंने सुझाव रखा कि लोकसभा और विधानसभा का चुनाव एक साथ कराने के विषय पर ‘चर्चा और संवाद बढ़ाना अच्छा है तथा सभी राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाई जानी चाहिए।’ राष्ट्रपति के इस वक्तव्य ने, जो कि मंत्रिपरिषद द्वारा तैयार किया जाता है, तीव्र राजनीतिक बहस छेड़ दी है।
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लोकसभा और विधानसभाओं का चुनाव एक साथ कराने का सुझाव कोई नया नहीं है। न्यायमूर्ति जीवन रेड्डी ने चुनाव सुधार संबंधी विधि आयोग के प्रतिवेदन में 1999 में इसकी अनुशंसा की थी। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी ने 2009 में इसका प्रतिपादन किया था। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और संसद के कार्मिक विभाग संबंधी समिति ने भी इसका समर्थन किया। यह उल्लेखनीय है कि पहली लोकसभा से लेकर चौथी लोकसभा तक (1952, 1957, 1962 और 1967) लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ ही होते रहे। यह संस्थापित परंपरा 1969 में टूटी, जब लोकसभा समय से पहले भंग कर दी गई।
तर्क दिया जाता है कि लोकसभा और विधानसभा का चुनाव एक साथ होने से सरकार के खर्च में कमी आएगी और राजस्व की बचत होगी। अनुमान के अनुसार, 16वीं लोकसभा के चुनाव पर कोई 3,800 करोड़ रुपये खर्च हुए। यदि विधानसभा चुनावों पर होने वाले खर्चों को जोड़ा जाए, तो यह राशि बहुत बड़ी रकम हो जाएगी। एक साथ चुनाव होने से राजनीतिक दलों के चुनाव पर होने वाले खर्च में भारी कमी आएगी, जिसके अपने लाभ हैं। वैसे में, राजनीतिक दलों को चुनाव के लिए कॉरपोरेट जगत से चंदा लेने की जरूरत कम हो जाएगी, फलस्वरूप उसी अनुपात में कॉरपोरेट का सरकार पर प्रभाव कम या नगण्य होगा। यह किसी से छिपा नहीं है कि कॉरपोरेट जगत सरकार बनने के बाद अपने चंदे, परोक्ष या प्रत्यक्ष, के प्रभाव से सरकार की नीतियों को प्रभावित ही नहीं, नियंत्रित भी करता है। इससे असमानता उत्पन्न होती है और विधि का राज क्षीण होता है। इससे सुरक्षा बलों के चुनाव संबंधी आवागमन और तैनाती पर होने वाले खर्च भी कम हो जाएंगे। साथ ही विकास की प्रक्रिया स्थायी बनी रहेगी, जो कि अभी अक्सर चुनाव की वजह से आदर्श आचार संहिता लगने के कारण अवरुद्ध हो जाती है ।
परंतु प्रश्न यह उठता है कि एक साथ चुनाव कराने में क्या कोई सांविधानिक अवरोध है। संविधान के अनुसार, लोकसभा और विधानसभा का कार्यकाल पांच साल होता है, यदि उसे समय से पूर्व भंग न किया जाए। लोकसभा और विधानसभा पहली बैठक से पांच वर्ष की अवधि के समाप्त होते ही भंग हो जाती है, यदि उससे पूर्व राष्ट्रपति या राज्यपाल ने उन्हें भंग न किया। यदि एक साथ लोकसभा और विधानसभा का चुनाव इस वर्ष के अंत में या अगले वर्ष कराना है, तो उन राज्यों की विधानसभाओं को भी भंग करना होगा, जहां अन्यथा चुनाव 2019, 2020, 2021 या 2022 में होना है। सवाल यह भी है कि उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब और हिमाचल प्रदेश जैसे जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव एक साल या थोड़े समय पहले ही हुए हैं, वहां की सत्तारूढ़ पार्टियां विधानसभाओं को भंग करने के लिए तैयार होंगी या नहीं। जिन राजनीतिक दलों की राज्यों में अभी सरकारें बनी हैं, वे निस्संदेह राजनीतिक और व्यावहरिक कारणों से नहीं चाहेंगी कि उनकी विधानसभा समय से इतने पहले भंग हो और दोबारा चुनाव हो। क्योंकि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वही सरकार पुन: जनता द्वारा चुनकर आएगी। फिर यदि यह मान लिया जाए कि राजनीतिक दलों में वर्तमान में एक साथ चुनाव के लिए सहमति बन गई, तो इस बात की क्या गारंटी है कि भविष्य में राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद 356 का उपयोग करते हुए किसी विधानसभा को समय से पूर्व भंग नहीं करेंगे। अत: एक साथ चुनाव करने के लिए संविधान में संशोधन करना होगा, ताकि कोई भी विधानसभा समय से पहले भंग न हो। विधानसभाओं, खासकर छोटी विधानसभाओं में अक्सर मुख्यमंत्री के विरोध में अविश्वास प्रस्ताव लाए जाते हैं, जिनका एक ही उद्देश्य सरकार को गिराना या उसे अस्थिर करना होता है। इस प्रस्ताव में इस बात की व्यवस्था नहीं होती कि अविश्वास प्रस्ताव जीतने पर प्रतिपक्ष स्थिर सरकार देने की स्थिति में होगा कि नहीं। भैरो सिंह शेखावत ने सुझाव दिया था कि यदि कोई विपक्षी दल सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाता है, तो उसमें यह भी होना चाहिए कि यदि सरकार गिरी, तो उसका विकल्प क्या होगा। परंतु यह सुझाव मात्र सुझाव ही रह गया।
एक साथ चुनाव का यह सुझाव कई पहलुओं से महत्वपूर्ण है, जैसे, सरकार के चुनाव खर्च में कमी होगी, देश में राजनीतिक स्थिरता, राजनीतिक दलों के खर्चों में कमी और राजनीतिक पारदर्शिता आएगी। परंतु प्रश्न यह भी है कि क्या भारतीय राजनीति 'एक राष्ट्र, एक बाजार और एक कर' की अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए, 'एक नेता, एक राजनीतिक पार्टी' के वर्चस्व तक सिमट कर रह जाएगी। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक गणतंत्र है। यह अनेकता में एकता का देश है। भारतीय संविधान में सत्ता का विकेंद्रीकरण है। भारत एकात्मक नहीं, बल्कि संघात्मक गणराज्य है। विचारणीय प्रश्न यह है कि एक साथ चुनाव कराने से भारत की क्षेत्रीय और राजनीतिक आशाएं और अपेक्षाएं सुदृढ़ होंगी या कुंठित। क्या हम अमेरिकी शैली के प्रेसिडेंशियल गणतंत्र की ओर अग्रसर होंगे और क्या हमारा जनतांत्रिक बहुलतावाद, जो हमारे गणतंत्र का मेरुदंड है, संरक्षित रह पाएगा?
लेखक संविधान और संसदीय मामलों के विशेषज्ञ हैं।