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मायावती रोक सकती हैं मोदी को!
अजय बोस
Updated Wed, 09 Apr 2014 05:32 PM IST
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इस लोकसभा चुनाव में मायावती और उनकी बहुजन समाज पार्टी ही नरेंद्र मोदी के भारत का प्रधानमंत्री बनने की राह का एकमात्र रोड़ा साबित हो सकती हैं। उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से आधी से ज्यादा बसपा जीत लेती है, तो भाजपा का आंकड़ा 200 सीटों के इर्द-गिर्द सिमट जाने की आशंका है।
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भाजपा के रणनीतिकार भी मानते हैं कि नई दिल्ली का सिंहासन कब्जाने की उनकी योजना पर पाने फेरने की क्षमता केवल मायावती में ही है। बसपा के अलावा किसी में ऐसी कुव्वत नहीं कि वह सामाजिक समूहों का मजबूत ताना-बाना बुनकर, ऊंची जातियों के मोदी समर्थक उस दुर्जेय गठजोड़ को सीधी टक्कर दे सके, जिसे पिछड़े समुदायों के ऊपर उठ रहे तबके का भी समर्थन हासिल है।
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उत्तर प्रदेश में भाजपा की चुनावी कमान संभाले एक नेता बताते हैं, 'नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए पूरे राज्य में जो अभूतपूर्व लहर चल रही है, बहनजी अकेले उसे बेअसर करने की ताकत रखती हैं। उन्हें कम आंककर हम मूर्खता करेंगे।'
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उत्तर प्रदेश में अच्छा प्रदर्शन करना नरेंद्र मोदी के लिए जितना अहम है, उतना ही मायावती के लिए भी। उनको एहसास है कि 2012 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी के प्रदर्शन में आई गिरावट को रोकना बेहद जरूरी है।
पिछले साल हुए विधानसभा चुनावों में बसपा को पूरे उत्तर भारत में जिन अपमानजनक नतीजों का सामना करना पड़ा, उसने विगत दो दशकों से लगातार व्यापक हो रहे उसके जनाधार पर अंकुश लगा दिया है। मायावती जानती हैं कि आने वाले समय में अगर वह खुद को विजेता की तरह पेश नहीं करतीं, तो महत्वपूर्ण जाटव वोट भी उनसे छिटक जाएगा।
2009 के लोकसभा और 2012 के विधानसभा चुनावों से अलग मायावती के लिए गैर-जाटव दलितों और अति पिछड़ी जाति समूहों का समर्थन पाना इस बार बड़ी चुनौती होगा। कई गैर-जाटव दलित उपजातियां बसपा के पांच साल के कार्यकाल से खुश नहीं थीं। क्योंकि मुख्यमंत्री रहते हुए मायावती ने जाटवों का तो खुलकर समर्थन किया, पर दूसरी दलित उपजातियों के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया।
कुछ ऐसी ही शिकायत अति पिछड़ी जातियों के उस निर्धन और सामाजिक तौर पर वंचित तबके की भी थी, जिसने बेहतर सामाजिक लाभ की संभावना देख बसपा के पक्ष में एकमुश्त मतदान किया था। प्रमुख दलित सिविल सोसाइटी समूह 'डायनेमिक ऐक्शन ग्रुप' के संस्थापक समन्वयक और सक्रिय दलित कार्यकर्ता रामकुमार कहते हैं, '2012 में मिली हार के बाद दलितों और अति पिछड़े जाति समूहों के बीच अपने समर्थन की वापसी के लिए बसपा की कोशिशें जारी हैं।
उत्तर प्रदेश में दो वर्ष पहले कायम हुए सपा राज में उच्च और मध्य वर्ग की जातियों ने इन समूहों पर जैसा जुल्म ढाया है, उससे बसपा को इनका समर्थन हासिल करने में आसानी होगी। बसपा सरकार की गलतियों को भुला चुका यह वर्ग बहनजी को दिल खोलकर वोट देगा।'
पिछले वर्ष आर के चौधरी की बसपा में वापसी अपने दलित आधार को मजबूत करने की मायावती की योजना का ताजा कदम थी। चौधरी न केवल बसपा के संस्थापक सदस्य हैं, बल्कि उत्तर प्रदेश में जाटवों के बाद दूसरे सबसे बड़े दलित समूह पासी समुदाय के नेता भी हैं।
कांशीराम के नजदीकी रहे आर के चौधरी को पार्टी से निकाले हुए एक दशक से ज्यादा हो गया था। उस समय मायावती ने चौधरी समेत उन तमाम वरिष्ठ नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाया था, जो उनकी सत्ता के लिए चुनौती बन सकते थे।
उत्तर प्रदेश में मायावती के प्रति मुस्लिम तबके का समर्थन बढ़ सकता है, जिस कारण वह ब्राह्मणों की अनदेखी का जोखिम भी उठा सकती हैं। राज्य में मुस्लिमों की संख्या ब्राह्मणों के दोगुने से भी ज्यादा है। इसलिए बसपा उस मुस्लिम तबके में अपनी पैठ बढ़ा रही है, जिसका बड़ा हिस्सा या तो सपा से जुड़ा रहा है या कांग्रेस से। पर खासकर मुजफ्फरनगर दंगे की वजह से मुसलमानों का अखिलेश सरकार से मोहभंग हुआ है।
इसी तरह उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मानते हैं कि उनके बीच कांग्रेस का जनाधार पूरी तरह खत्म हो चुका है। पहले उच्च वर्ग के जो मुस्लिम बसपा से दूरी बनाए रखते थे, अब वे भी भाजपा के खिलाफ इसे ही एकमात्र कारगर विकल्प मान रहे हैं।
उत्तर प्रदेश के मतदाताओं का तकरीबन आधा हिस्सा दलितों, नीची जातियों और मुस्लिम वर्ग से मिलकर तैयार होता है। इन वर्गों के बीच मायावती के लिए बढ़ता समर्थन साफ तौर पर सामने नहीं दिखता। यह पूरा समूह बेहद शांति के साथ अपनी मतदान प्रवृत्तियों को छिपाए रखने में भरोसा करता है। न तो इसकी आवाज जनमत सर्वेक्षणों में प्रकट होती है, और न ही टेलीविजन पर दिखाई जा रही मोदी बनाम राहुल बनाम केजरीवाल की बहसों में।
बसपा सुप्रीमो जानती हैं कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के पक्ष में जो ध्रुवीकरण हो रहा है, उसकी प्रतिक्रिया में निचली जातियों और समुदायों का जवाबी ध्रुवीकरण उन्हें फायदा पहुंच सकता है। शायद इसी आत्मविश्वास से उन्होंने कांग्रेस के गठजोड़ के प्रस्ताव को नकार दिया था।
अगर मायावती मौके को भुनाने में कामयाब रहती हैं, तो उनके खाते में आने वाली संसदीय सीटों की तादाद बढ़ सकती है, जिसकी बदौलत त्रिशंकु चुनावी नतीजों की दशा में वह न केवल अपना खेल जमा सकती हैं, बल्कि मोदी के विजय रथ को भी रोक सकती हैं। अपने राजनीतिक जीवन में शर्तिया पराजय को जीत में बदलने का जज्बा वह कई बार दिखा चुकी हैं। ऐसे में, यह जीत उनके लिए सबसे यादगार उपलब्धि होगी।