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बाजार के संकेत: फेडरल रिजर्व की नीतियों का असर

Tue, 21 Sep 2021 01:49 AM IST
Satish Singh सतीश सिंह
Updated Tue, 21 Sep 2021 01:49 AM IST
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सार
महामारी का वैसे तो अनेक क्षेत्रों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, लेकिन सूक्ष्म, लघु और मंझोले उद्यम (एमएसएमई) सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। इस क्षेत्र का देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 30 प्रतिशत का योगदान है और यह सबसे अधिक रोजगार मुहैया कराने वाले क्षेत्रों में शामिल है।
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Market signals: the impact of the Federal Reserve s policies
अमेरिकी फेडरल रिजर्व - फोटो : Social Media

विस्तार

पिछले दिनों जब फेडरल रिजर्व बैंक के अध्यक्ष जेरोम पॉवेल ने यह कहा कि फेडरल रिजर्व जल्दबाजी में ब्याज दरों में बढ़ोतरी नहीं करेगा, तो भारत समेत दुनिया के तमाम देशों के बाजारों में तेजी देखी गई, जो इस बात का संकेत है कि फेडरल रिजर्व का फैसला दुनिया भर के देशों की मौद्रिक नीतियों को प्रभावित करता है। हालांकि, यह कहना अनुचित होगा कि फेडरल रिजर्व की नीतियों से दुनिया भर के देशों की मौद्रिक नीतियां पूरी तरह से प्रभावित होती हैं। 



सच कहा जाए तो विभिन्न देशों की मौद्रिक नीतियां उस देश की आर्थिक एवं राजनीतिक कारकों से ज्यादा प्रभावित होती हैं। फिलहाल फेडरल रिजर्व के प्रभाव से इतर दुनिया के देश कमजोर अर्थव्यवस्था और विकास की सुस्त रफ्तार के कारण भी नीतिगत दरों में कटौती करने से परहेज कर रहे हैं। कोरोना महामारी के कारण पिछले साल से ही भारतीय रिजर्व बैंक मौद्रिक समीक्षा में अपने नरम रुख को कायम रखे हुए है, जिस वजह से बाजार में अतिरिक्त तरलता की स्थिति बनी हुई है। 


हालांकि, रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास देश के आर्थिक परिदृश्य के सामान्य होने तक बाजार में कुछ अतिरिक्त तरलता के प्रवाह को बनाए रखना चाहते हैं, ताकि आपात स्थिति में कारोबारियों की जरूरतों को पूरा किया जा सके। भारत में कोरोना वायरस के डेल्टा प्लस वर्जन के संक्रमण का डर बना हुआ है और तीसरी लहर की आशंका को अभी खारिज नहीं किया गया है। 

महामारी का वैसे तो अनेक क्षेत्रों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, लेकिन सूक्ष्म, लघु और मंझोले उद्यम (एमएसएमई) सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। इस क्षेत्र का देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 30 प्रतिशत का योगदान है और यह सबसे अधिक रोजगार मुहैया कराने वाले क्षेत्रों में शामिल है। सरकार की आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना से एमएसएमई क्षेत्र को काफी राहत मिली है, पर अब भी इस क्षेत्र को राहत देने की आवश्यकता है। 

बड़े उद्योगों एवं अन्य क्षेत्रों को भी मदद मुहैया कराने की जरूरत है। लिहाजा, दबावग्रस्त एमएसएमई एवं बड़े ऋण खातों को पुनर्गठित करने का काम बैंकों द्वारा किया जा रहा है। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में सरकारी बैंकों के प्रमुखों से आगामी त्योहारी महीनों में ऋण वितरण में तेजी लाने के लिए कहा है। लेकिन एमएसएमई सहित अन्य क्षेत्रों में अब भी ऋण का उठाव बहुत ही कम है। 

मौजूदा आर्थिक परिदृश्य में आर्थिक गतिविधियों में तभी तेजी आएगी, जब एमएसएमई, बड़े उद्योगों और अन्य उद्यमों में कामकाज सुचारु ढंग से शुरू होगा। संकटग्रस्त उद्योगों और कारोबारियों को तभी राहत मिलेगी, जब सरकार और बैंक अन्य राहतों को मुहैया कराने के साथ-साथ ऋण ब्याज दरों में कटौती करें या कम से कम उसे यथावत रखें। अगस्त महीने में थोक महंगाई 11.39 प्रतिशत रही, जो जुलाई महीने में 11.16 प्रतिशत थी। 

जबकि खुदरा महंगाई दर 5.30 प्रतिशत रही, जो जुलाई महीने में 5.59 प्रतिशत थी। खुदरा महंगाई विगत चार महीनों में सबसे कम है, लेकिन इसमें मामूली कमी आई है। अगर महंगाई आगामी महीनों में नियंत्रण में नहीं आती है, तो केंद्रीय बैंक रेपो दर को कम करने की जगह उसे बढ़ाने पर विचार कर सकता है, जिससे कंपनियों और कारोबारियों के साथ-साथ आम आदमी को भी ऋण खातों पर बढ़ी हुई ब्याज राशि का भुगतान करना पड़ेगा। 

वर्ष 2021 की जून तिमाही में जीडीपी 20.1 प्रतिशत की दर से बढ़ी है, जिसका कारण आधार प्रभाव है। फिर भी, तिमाही आधार पर जीडीपी में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है, जो इस बात का संकेत है कि अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट रही है। लेकिन इस वृद्धि दर को कायम रखने के लिए आगामी मौद्रिक समीक्षाओं में नीतिगत दरों में बढ़ोतरी करने से केंद्रीय बैंक को गुरेज करना होगा। हालांकि, बढ़ती महंगाई को देखते हुए ऐसा करना केंद्रीय बैंक के लिए आसान नहीं होगा। 

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