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पाकिस्तानी हुकूमत के कई चेहरे
चिंतामणि महापात्र
Updated Fri, 09 Aug 2013 09:01 PM IST
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भारत की यात्रा के तकरीबन एक महीने बाद अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी पिछले दिनों पाकिस्तान पहुंचे थे। बीते दो वर्षों में पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्ते इतने बदतर हो चुके हैं कि केरी ने अपनी इस यात्रा को लेकर काफी सतर्कता बरती। असल में ओसामा बिन लादेन के अमेरिकी नेवी सील कमांडो द्वारा पाकिस्तान में मारे जाने के बाद से दोनों देशों के बीच विश्वास न्यूनतम स्तर पर पहुंच चुका है। इसका असर सीआईए और आईएसआई के रिश्तों में भी दिखता है।
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आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक अभियान छेड़ने के बाद से पाकिस्तान में 26 अरब डॉलर खर्च करने के बावजूद अमेरिकी प्रशासन को उस देश से नीतिगत रूप से कम ही समर्थन मिला है। दरअसल पाकिस्तान सरकार के अमेरिका को किए जा रहे सहयोग के विरोध से ही पाकिस्तानी तालिबान का जन्म हुआ है। लगातार ड्रोन हमलों से पाकिस्तान में अमेरिका-विरोधी भावनाएं मजबूत हुई हैं। पाकिस्तानी तालिबान द्वारा सेना, खुफिया एजेंसी और सरकारी संस्थाओं पर जारी हमलों तथा संदिग्ध आतंकवादियों को लक्षित कर किए जा रहे सीआईए के ड्रोन हमलों के कारण पाकिस्तान सरकार के पास इनका विरोध करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता भी नहीं बचा। वाशिंगटन जहां पाकिस्तान की संप्रभुता के उल्लंघन के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शन को नजरंदाज करता रहा है, वहीं पाकिस्तान ने अफगानिस्तान, अमेरिकी और नाटो फौज के लिए रणनीतिक मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। जबसे भारत-अमेरिका के रिश्तों ने एक मुकाम हासिल किया है, अमेरिका-पाकिस्तान के रिश्तों में गिरावट आई है। इससे भी पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान में हताशा बढ़ी है।
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आर्थिक बदहाली, सामाजिक अस्थिरता, जब-तब हो रहे आतंकवादी हमलों और अमेरिका से तल्ख होते रिश्तों की पृष्ठभूमि में नवाज शरीफ ने पाकिस्तान की कमान संभाली है। जॉन केरी की यात्रा का मकसद द्विपक्षीय संबंधों की खटास दूर करना और आतंकवाद विरोधी अभियान में सहयोग बढ़ाना था। इसके पीछे दो कारण हैं, पहला यह कि अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज की वापसी की समय-सीमा नजदीक आ रही है और उसके लिए पाकिस्तान का सहयोग जरूरी है। दूसरा यह कि नवाज शरीफ के कमान संभालने के बाद दोनों देशों के संबंधों को लेकर नई उम्मीद जगी है। जॉन केरी अपनी पूर्ववर्ती हिलेरी क्लिंटन की तुलना में कहीं अधिक उदार हैं। ओसामा के मारे जाने के कई महीने बाद ही हिलेरी क्लिंटन ने पाकिस्तान की यात्रा की थी और तल्खी से पेश आई थीं। दूसरी ओर केरी की पहल से ही पाकिस्तान को मदद दिए जाने संबंधी कानून आगे बढ़ा, जिसके तहत उसे पांच वर्षों के दौरान 7.5 अरब डॉलर की मदद मंजूर की गई। इसमें से उसे बीतेे तीन वर्षों के दौरान तीन अरब डॉलर की मदद मिल भी चुकी है। अपनी यात्रा के दौरान केरी ने पाकिस्तान को ऊर्जा के क्षेत्र में 20 करोड़ डॉलर की मदद का ऐलान किया। यही नहीं, उन्होंने जल्द ही ड्रोन हमले रोकने का भी आश्वासन दिया। हालांकि उनके वहां से रवाना होने के फौरन बाद ही अमेरिकी विदेशी मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि ड्रोन हमलों को लेकर अमेरिका की नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। इस बयान से अमेरिका-पाकिस्तान के रिश्तों की असलियत सामने आ गई। याद कीजिए, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी ड्रोन हमलों में कमी की बात की थी, पर इन्हें पूरी तरह खत्म करने का आश्वासन नहीं दिया था। पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्तों की सच्चाई यह है कि दोनों देशों के बीच रणनीतिक वार्ता की बहाली की गति बहुत धीमी है, वहीं केरी की विगत जून में हुई भारत यात्रा के दौरान छठे दौर की रणनीतिक वार्ता संपन्न हुई।
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साफ है कि घनघोर ऊर्जा संकट, बदहाल आर्थिक व्यवस्था और उससे भी बदतर कानून व्यवस्था की स्थिति नवाज शरीफ के लिए बड़ी चुनौती है। वास्तव में पाकिस्तान के लिए आत्म मंथन करने का यही सही समय है। पाकिस्तान और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जरूरी है कि वह भारत के साथ रिश्तों को सामान्य बनाने के लिए गंभीरता से विचार करे। हालांकि नवाज शरीफ की सरकार के लिए इस दिशा में आगे बढ़ना आसान नहीं है, क्योंकि वहां नागरिक सरकार, सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई जैसे सत्ता के विभिन्न केंद्रों के बीच हितों का टकराव है। लगता है कि नवाज शरीफ सरकार तो हमारे साथ रिश्ते सुधारना चाहती है, लेकिन पाकिस्तानी सेना लगातार भारत को दुश्मन राष्ट्र की तरह ही देखती है। वहीं आईएसआई के आतंकी संगठनों के साथ गहरे रिश्ते हैं। वास्तव में यह पाकिस्तान के विभिन्न सत्ता केंद्रों पर ही निर्भर है कि वे अपने अंतर्विरोधों को दूर कर भारत से संबंधों के बारे में एक स्वर में बात करेंगे। ऐसा नहीं होने से पाकिस्तान की नीतियों को लेकर कोई राय नहीं बनाई जा सकती। हाल ही में पुंछ में नियंत्रण रेखा के नजदीक जिस तरह से पाकिस्तानी सेना ने भारतीय जवानों पर हमला किया और जिसमें पांच जवान शहीद भी हुए, उसके बाद लगता नहीं कि दोनों देशों के रिश्ते जल्द सामान्य हो पाएंगे। बल्कि अफगानिस्तान से अमेरिकी और नाटो फौज की वापसी के बाद पाकिस्तान के लिए स्थिति कहीं अधिक विकट हो सकती है। कुल मिलाकर यह पाकिस्तान को ही तय करना है कि वह अपने लिए कैसा भविष्य चाहता है।