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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   manipur violence st status to meitei community 3rd May black day in history of Manipur

नजरिया: अक्षमता, नुकसान तथा अपमान के बीच मणिपुर में फिर आया काला दिन

Sun, 25 Jun 2023 06:52 AM IST
Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sun, 25 Jun 2023 06:52 AM IST
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सार
चूंकि राज्य सरकार ने मैती समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के लिए पिछले 10 साल से कोई सिफारिश नहीं भेजी थी, इसलिए अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह इस संबंध में केंद्र सरकार को चार सप्ताह में अपनी सिफारिश भेजे। यह कोई ऐसा मुद्दा नहीं था, जिस पर अदालत को निर्देश देने की जरूरत थी।
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manipur violence st status to meitei community 3rd May black day in history of Manipur
Manipur Violence - फोटो : Social Media

विस्तार

संविधान का अनुच्छेद 355 कहता है:


'केंद्र का यह कर्तव्य होगा कि वह हर राज्य को बाहरी आक्रमण और अंदरूनी अशांति से बचाते हुए यह सुनिश्चित करे कि राज्यों की सरकारें संविधान के प्रावधानों के मुताबिक चलें।' यह अनुच्छेद कई मायनों में महत्वपूर्ण है। संघ (केंद्र सरकार) का दायित्व प्रत्येक राज्य की सुरक्षा करना है, उसे नुकसान पहुंचाना या नष्ट करना नहीं। इस तरह अनुच्छेद 355 भारतीय राज्य की संघीय प्रकृति की पुष्टि करता है। केंद्र सरकार का दायित्व यह सुनिश्चित करना भी है कि हर राज्य संविधान के अनुरूप चले। यह अनुच्छेद केंद्र सरकार को इसकी याद दिलाता है कि जब कोई राज्य कुशासित हो या वहां बिल्कुल ही शासन न हो, तब वह दर्शक बनकर नहीं रह सकता। ये दो उसके विशिष्ट कर्तव्य हैं।

संघ एक सांविधानिक धारणा है। आखिरकार वे स्त्री और पुरुष ही होते हैं, जो  केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर भूमिका निभाते और कदम उठाते हैं। पुरुषों व स्त्रियों का यह समूह दरअसल मंत्रिमंडल है। और इस मंत्रिमंडल का केंद्रबिंदु या प्रमुख प्रधानमंत्री होता है।


दोहरा कर्तव्य
मणिपुर के मामले में तीन मई, 2023 से अब तक इन दोहरे कर्तव्यों का लगातार उल्लंघन होता आया है। अनुच्छेद 355 ने संघ को (यानी केंद्रीय मंत्रिमंडल और प्रधानमंत्री) जो जिम्मेदारियां सौंपी है, उसका पालन करने के बजाय संविधान का उल्लंघन किया गया है। विगत तीन मई से प्रधानमंत्री ने मणिपुर पर एक शब्द नहीं कहा है-यहां तक कि वहां शांति स्थापना की अपील भी उन्होंने नहीं की। न ही उन्होंने मणिपुर का दौरा करने के बारे में सोचा। जबकि इस दौरान वहां लगभग 120 लोग मारे जा चुके हैं।

अगर कुछ आलोचक इस रवैये को पागलपन समझते हैं, तो हमें इस पागलपन के कारणों की पड़ताल निश्चित रूप से करनी चाहिए। मुझे इस पागलपन के ये कारण लगते हैं:

  1. मणिपुर भाजपा शासित राज्य है, लिहाजा अगर केंद्र सरकार मणिपुर की सरकार को फटकार लगाती है या उसे बर्खास्त करती है, तो यह अपना ही दिया हुआ घाव होगा। ऐसे में, यह रवैया 'मेरा देश मेरी पार्टी से बड़ा है' के बिल्कुल अनुरूप है।
  2. श्रीमान नरेंद्र मोदी संभवत: मणिपुर के अलोकप्रिय मुख्यमंत्री बीरेन सिंह से खुद को अलग दिखाना चाहते हैं। यह 'डबल इंजन सरकार' की शेखी बघारने के बिल्कुल अनुकूल है।
  3. मणिपुर बहुत दूर है। मणिपुर में जो भी हो रहा है, उसका शेष भारत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। यह 'ऐक्ट ईस्ट' की गर्वोक्ति के अनुरूप है।
  4. मैती और कुकी समुदायों को लड़ने दें। मैती समुदाय द्वारा नियंत्रित राज्य सरकार और मैती समुदाय के वर्चस्व वाली भाजपा के बूते मैती समुदाय ही आखिरकार हावी होंगे। यह 'सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास' के नारे के अनुरूप ही है।

अगर इनमें से एक या एक से अधिक कारण सही हैं, तो इससे स्पष्ट है कि मणिपुर के मामले में केंद्र सरकार की नीति स्वार्थपरता और निर्दयता का निंदनीय मिश्रण है।

फिर आया काला दिन
तीन मई मणिपुर के इतिहास में एक काला दिन है। तीस साल पहले तीन मई, 1993 को मैती हिंदुओं और मैती मुस्लिमों (पांगलों) के बीच भारी हिंसा हुई थी, जिसमें सौ से अधिक लोग मारे गए थे। तीन मई, 2023 को मणिपुर में इतिहास दोहराया गया। उस दिन मैती और कुकी समुदायों के बीच भीषण हिंसा भड़की है। इस हिंसा का कारण मणिपुर हाई कोर्ट द्वारा दिया गया एक आदेश बना।

मैती समुदाय दरअसल लंबे समय से मणिपुर में अपने लिए अनुसूचित दर्जे की मांग कर रहा था। जिस राज्य में मैती, कुकी और नगा ही तीन मुख्य समुदाय हैं, वहां की उत्तरोत्तर सरकारों ने जान-बूझकर ही इसे लागू नहीं किया। बेशक मैती समुदाय को जनजाति का दर्जा न देने के कारण उन सरकारों पर जानबूझकर इस पर अमल न करने के आरोप लगे, लेकिन इस पर जल्दी फैसला न लेने के ठोस कारण थे। आजादी से पहले मैती समुदाय मणिपुर की एक जनजाति के तौर पर सूचीबद्ध था, लेकिन यह संविधान के (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में शामिल नहीं था। अभी ज्यादातर मैती सामान्य वर्ग में आते हैं, और इनमें से लगभग 17 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी में हैं।

मणिपुर के तीन बड़े समुदायों के बीच राजनीतिक संतुलन बेहद नाजुक है। राज्य की कुल 60 विधानसभा सीटों में से 40 पर मैती समुदाय का, जबकि 10 पर कुकी और शेष 10 पर नगा समुदाय का वर्चस्व है। कुकी और नगा अनुसूचित जनजाति में सूचीबद्ध 36 जनजातियों में से हैं। अगर मैती समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दे दिया जाए, तो राज्य के चुनावी नक्शे पर उसका कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन तब आदिवासी क्षेत्र के रूप में अधिसूचित इलाके में उन्हें जमीन और सरकारी नौकरी मुहैया कराने की बाध्यता होगी।

अविवेकी निर्देश
जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि हिंसा का कारण मणिपुर के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री मुरलीधरन का एक निर्देश बना। चूंकि राज्य सरकार ने मैती समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के लिए पिछले 10 साल से कोई सिफारिश नहीं भेजी थी, इसलिए अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह इस संबंध में केंद्र सरकार को चार सप्ताह में अपनी सिफारिश भेजे। इस मामले में दोनों ही पक्षों के बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है, लेकिन निश्चित रूप से यह कोई ऐसा मुद्दा नहीं था, जिस पर अदालत को निर्देश देने की जरूरत थी। अदालत यह मामला राज्य विधानसभा और अनुसूचित जनजाति आयोग के सामने उठा सकती थी।

राज्य के 30 भाजपा विधायकों के प्रतिनिधिमंडल को प्रधानमंत्री से मिलने की इजाजत नहीं मिली। मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री श्री इबोबी सिंह के नेतृत्व में 10 विपक्षी पार्टियां प्रधानमंत्री से मुलाकात का इंतजार ही करती रह गईं। आदरणीय प्रधानमंत्री ने मणिपुर को जलने के लिए छोड़ दिया। मणिपुर की बीरेन सिंह सरकार की पहचान अक्षम तथा उपेक्षित रवैये व पक्षपाती आचरण का परिचय देने की रही है, अब इसमें राज्य का अपमान भी जुड़ गया है।

मणिपुर में एक इंजन (राज्य सरकार) में ईंधन खत्म हो गया है; जबकि दूसरे इंजन (केंद्र सरकार) ने गाड़ी से खुद को अलग करने का फैसला किया और वह लोको शेड में छिपा है। डबल इंजन के कारण मणिपुर आज खौलती कड़ाही है। चीखो, प्यारे प्यारे देश।

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