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सियासी बवंडर में फंसा मालदीव

Tue, 06 Feb 2018 06:57 PM IST
महेंद्र वेद
महेंद्र वेद Updated Tue, 06 Feb 2018 06:57 PM IST
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Maldives trapped in political tornado
मालदीव

यह अनोखा मामला है कि मालदीव के एकमात्र लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद को सत्ता से बाहर होना पड़ा, लेकिन पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उन्हें और अन्य सांसदों को निर्वासन से लौटने की उम्मीद थी, लेकिन उनकी राह मुश्किल दिख रही है। इस फैसले के बाद नाशीद ने कहा,'हिंद महासागर को भारत का महासागर कहा जाना चाहिए।'


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पड़ोसी के रूप में मालदीव की अहमियत की भारत शायद ही अनदेखी कर सकता है। नाशीद की यह टिप्पणी तब आई है, जब चीन पूरे क्षेत्र को अपने आर्थिक और सामरिक अड्डे में बदलने की कोशिश कर रहा है। भारत के विपरीत चीन को न्यायपालिका, संसद और संस्थानों की कोई फिक्र नहीं है, क्योंकि ये सब चीजें एक लोकतांत्रिक समाज की राजनीति का हिस्सा होती हैं।

जैसा कि पाकिस्तान और पश्चिमी एशिया के इस्लामिक आतंकी गुट कुछ समय से 12 सौ से अधिक द्वीपों वाले इस देश पर, जिनमें से बहुत से निर्जन हैं, नजर गड़ाए बैठे हैं, वहां की मौजूदा स्थिति से चिंतित भारत ने लोकतंत्र और शांति के पक्ष में बात की है और संयुक्त राष्ट्र तथा अमेरिका सहित कई अन्य देशों की सरकार ने भी मालदीव से कोर्ट का आदेश मानने की अपील की है। लेकिन वहां के राष्ट्रपति यमीन अब्दुल्ला गयूम (जो स्वयं कोर्ट आदेश से सत्ता पर काबिज हुए) ने कोर्ट के आदेश को मानने से इंकार कर दिया है। उन्होंने संसद परिसर को बंद कर दिया है और देश में पंद्रह दिन के लिए इमरजेंसी घोषित कर दी है। उनका यह कदम सुरक्षा बलों को संदिग्धों को गिरफ्तार करने और हिरासत में लेने के व्यापक अधिकार देता है। पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला गयूम और प्रधान न्यायाधीश तथा सर्वोच्च अदालत के एक जज को भी गिरफ्तार कर लिया गया है। यामीन ने संसद को बंद कर दिया है, क्योंकि शीर्ष अदालत ने नौ अन्य सांसदों को भी दोषमुक्त किया है। अदालत ने बारह और सदस्यों की सदस्यता बहाल कर दी है और कहा कि उनके खिलाफ आरोप राजनीतिक दुर्भावना से मढ़े गए थे, जो न्यायिक जांच में सही नहीं ठहरते। इससे 85 सदस्यीय संसद में यामीन के बहुमत के लिए खतरा पैदा हो सकता है, जिसके परिणामस्वरूप विधायी निकाय राष्ट्रपति की विरोधी शक्ति के रूप में काम कर सकता है।

आश्चर्यजनक रूप से अपने विरोधियों का मुकाबला करने के लिए एक राजनीतिक चाल के रूप में यामीन ने शीघ्र ही संसदीय चुनाव, यहां तक कि राष्ट्रपति चुनाव कराने की तत्परता दिखाते हुए कहा है कि 'लोगों को यह फैसला करने दें कि कौन लोकप्रिय है।' वह सड़क पर हो रहे प्रदर्शनों के रूप में घरेलू दबाव या फिर विदेशी अपीलों को शायद ही मानने को तैयार हों। उनके अटॉर्नी जनरल मोहम्मद अनिल ने उनकी ओर से चेतावनी दी है कि राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग का कोई भी कदम राष्ट्रीय सुरक्षा संकट का कारण बनेगा, क्योंकि ऐसे में सैन्य अधिग्रहण की स्थिति पैदा हो सकती है। फिलहाल सेना और पुलिस यामीन के साथ हैं और चार लाख लोगों के इस द्वीप पर गश्त लगा रहे हैं।

हालांकि मालदीव के संविधान में राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग का प्रावधान है, लेकिन वहां के अटॉर्नी जनरल ने कहा कि राष्ट्रपति को संसद में वोट के जरिये ही हटाया जा सकता है (जो अभी अनिश्चितकाल के लिए बंद है) और पुलिस व सुरक्षा बल 'अवैध लोगों' के महाभियोग आदेश का पालन नहीं करेंगे। फिलहाल श्रीलंका में निर्वासन में रह रहे नाशीद ने कहा है कि अदालत के फैसले पर कार्रवाई से यामीन के इन्कार का साफ मतलब है कि वह तख्तापलट के लिए सहमति दे रहे हैं। यामीन के आलोचक बाहर बैरकों में शामिल हो रहे हैं, यहां तक जिन दो सांसदों को कोर्ट ने दोषमुक्त कर दिया था, उन्हें घर लौटते वक्त गिरफ्तार कर लिया गया।

न्यायपालिका बनाम कार्यपालिका के बीच संघर्ष का संकट गहरा है। पिछले हफ्ते एक सरकारी बयान में प्रॉसिक्यूटर जनरल ने फैसलों के क्रियान्वयन में कई कानूनी चुनौतियों पर सुप्रीम कोर्ट का आकलन किया था। स्पष्ट रूप से इसी का जवाब देते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि फैसलों को लागू कराने और राजनीतिक कैदियों को रिहा करने में कोई बाधा नहीं है और इसके बारे में प्रॉसिक्यूटर जनरल को बता दिया गया है। विपक्षी मालदीवीय लोकतांत्रिक पार्टी के प्रवक्ता हामिद अब्दुल गफूर ने पहले ही आशंका जताई थी कि पुलिस प्रधान न्यायाधीश समेत दो शीर्ष जजों को गिरफ्तार करना चाहती है। उन्होंने कहा कि सरकार न्यायपालिका की शक्तियों को हड़पने की कोशिश कर रही है। तेजी से बढ़ते घटनाक्रम एक गंभीर स्थिति का इशारा करते हैं। जब तक वहां कोई नाटकीय घटनाक्रम न हो, नाशीद और यामीन के अन्य विरोधियों को अंतरराष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करने की कोशिश लगातार जारी रखनी होगी।
 
अपने लक्जरी टूरिस्ट रिसॉर्ट के लिए मशहूर मालदीव दस वर्ष पहले तीन दशकों की तानाशाही से निकलकर बहुदलीय लोकतंत्र बन गया था। लेकिन मालदीव ने जो लोकतांत्रिक लाभ कमाया था, उसे यामीन के निर्वाचन के बाद गंवा दिया। सत्ता संभालते ही यामीन ने नाशीद समेत अपने सभी विरोधियों को जेल में डाल दिया। यामीन के सत्ता संभालने के बाद हुए घटनाक्रमों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने बार-बार चिंता जताई है। सवाल उठता है कि मालदीव के घटनाक्रम को भारत कैसे देखे और उससे कैसे निपटे। एक समय, जब राजीव गांधी के शासन में मालदीव के तत्कालीन राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम की सत्ता पुनर्बहाल करने के लिए भारत ने अपने सैनिक भेजे थे। यह तब हुआ था, जब श्रीलंका के तमिल आतंकियों ने शासन पर कब्जे की धमकी दी थी। लेकिन मौजूदा स्थिति बिल्कुल भिन्न है। आज मालदीव पर्यटकों के बजाय आतंकवादियों का स्वर्ग बन गया है और वह हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के आक्रामक विस्तार के लिए संभावनाएं पेश करता है। भारत को सावधानीपूर्वक, पर लोकतंत्र की बहाली और अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाने के लिए मजबूती से कदम उठाने की जरूरत है।

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