फलसफा: इनके न उनके...सबके गांधी, आज भी प्रासंगिक हैं महात्मा
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विस्तार
दो गोलियां लगीं, और महात्मा गांधी गिर पड़े। लेकिन गिरते हुए भी वह उन दो शब्दों से कुछ संदेश देना चाह रहे थे, उस गर्म बारूद को, पिस्तौल से चिपकी उन अंगुलियों को, और उस विचार को, जो यह मान बैठा था कि गांधी इनके नहीं, बल्कि उनके हैं। लेकिन महात्मा गांधी के फेफड़ों से उठते वे दो शब्द न सिर्फ अहिंसात्मक थे, बल्कि सबके थे। श्रीमद्भगवद्गीता से प्रभावित वह नायक चर्चिल को बताना चाहता था कि शक्ति उस बोध में निवास करती है, जहां अपने वजूद के होने का एहसास होता है, उस सूत को कातकर, पीर पराई को साधकर, सभी के दुख को अपनाकर, सविनय अवज्ञा से असहयोग कर, सत्य को ही भगवान मानकर और उस उपवास को धर्मनिरपेक्ष साधन और साध्य बनाकर, जो स्वतंत्र होने के भाव को भय ग्रस्त दिमाग से आजाद कर अनुशासित मन से जोड़ देता है। महात्मा गांधी के मन में बसा देश, कोई इनका और उनका नहीं, बल्कि सभी का था। एक नायक के रूप में गांधी भी सभी के थे।
शायद गांधी अगर उस दिन बच जाते, तो गोडसे को भी माफ कर देते। अपने प्रिय जवाहर को भी उन्होंने याद दिलाया था कि यह आजादी कांग्रेस को नहीं, बल्कि अपने देश भारत को मिली है। वह चाहते थे कि सारे गिले-शिकवे भुलाकर जवाहर अपनी कैबिनेट में डॉ. भीमराव आंबेडकर, आरके शनमुखम और श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भी उचित सम्मान दें। वह बचपन में अपने जिमनास्टिक शिक्षक मिस्टर जिमी को बताना चाहते थे कि उन्हें जिमनास्टिक से ज्यादा, पैदल चलना पसंद है। शायद वह अपने शिक्षक को यह भी महसूस कराना चाहते थे कि जीवन चलना ही तो होता है, उस दांडी यात्रा की तरह, सभी के साथ, सभी के लिए मीलों दूर तक, बिल्कुल उस एक वादे के लिए, जो रॉबर्ट फ्रॉस्ट के शब्दों में ‘माइल्स टू गो बिफोर आई स्लीप,’ सदृश था। वह बचपन से ही सत्य की उन संभावनाओं से मेलजोल बढ़ा रहे थे, जो उन्हें कुछ बेहतर बनाने पर तुली थीं। वह अपने पिता से वादा कर चुके थे कि स्कूल से छुट्टी मिलते ही वह पैदल उनके पास बिना विलंब पहुंचेंगे। फिर भी यह बात वह अपने शिक्षक को बता नहीं पाए और उस दिन शाम के चार बजे जब वह घर से दोबारा उस अभ्यास कक्षा के लिए निकले, तो बादलों ने उन्हें धोखा दिया और उनके पहुंचने तक बच्चे जा चुके थे। मिस्टर जिमी को लगा कि वह झूठ बोल रहे हैं। लेकिन महात्मा गांधी तो सत्य को भगवान मान बैठे थे। दो अक्तूबर को जन्मे गांधी उस बाल अवस्था में खूब रोए, क्योंकि वह सत्य और असत्य के द्वैत से मुक्त उस सत्य रूपी भगवान को अद्वैत की ओर ले बढ़ चुके थे। उनका यह मोहनदास से महात्मा का सफर इतना आध्यात्मिक था कि जब पूरा देश आजादी के जश्न में डूबा हुआ था, तो गांधी कभी बंगाल, कभी बिहार, कभी दिल्ली की गलियों में उस मनुष्य को ढूंढ रहे थे, जो आजादी के पहले तो हमवतन था, लेकिन आजादी के बाद वह गांधी के उपवास को, उस आवाज को, मंदिर की घंटियों और अजान में बहुत पीछे छोड़ चुका था। उनसे जब 14 अगस्त को यह पूछा गया कि आजादी का उत्सव कैसा होगा, तो गांधी ने दुख से फूटते हुए कहा ‘क्या आप विनाश के बीच उत्सव मनाना चाहते हैं?’ यंग इंडिया में गांधी लिखते हैं, ‘स्वराज शब्द एक पवित्र शब्द है, जिसका अर्थ है स्व-शासन और आत्म-संयम, न कि सभी संयमों से ‘स्वतंत्रता’। अगर स्वराज हमें और सभ्य नहीं बना पाता तो ऐसे स्वराज का क्या मतलब?’
जो हजारों चिट्ठियां महात्मा गांधी को प्रतिदिन आती थीं, वे मानो उन प्रवासी पक्षियों की तरह थीं, जो अपने घोंसले को बखूबी पहचानती थीं। इन लिफाफों पर ‘टू, महात्मा गांधी, इंडिया’ लिखा होता था और वे सारे खत गांधी का जवाब लेकर ही लौटते थे। मेटाफोर्स वी लिव बाई में जॉर्ज लेकॉफ और मार्क जॉनसन लिखते हैं, ‘हम कुछ प्रमुख रूपकों के अनुसार जीते हैं, जो मुख्यतः मौखिक संस्कृति का हिस्सा हैं, खासकर ऐसे वक्त जब हम लिखित संस्कृति का हिस्सा होते हैं।’ महात्मा गांधी की छवि सभी धर्म, जाति और समूहों को समेटे हुए थी। उस भारत की मौखिक संस्कृति तो उनकी कायल थी ही, लिखित संस्कृति भी उनसे छवि निर्माण सीख रही थी, खासकर ऐसी छवि, जो शिक्षित और अशिक्षित दोनों समूहों के लिए स्मृतियों को बुनने की संभावना रखती थी।
कुछ चर्चा उस एंग्लो इंडियन लेखक मुल्क राज आनंद की, जो अपने उपन्यास अनटचेबल को लिखने की योजना बना रहे थे। उन्होंने गांधी के आश्रम में जाकर समझा कि गांधी की आवाज को ध्वनि, उनके उस कर्म से मिलती है, जो उनके विचार और मन की लय से संचालित होती है। अगर वह शौचालय की भी सफाई करते हैं, तो अपने वजूद को कमतर नहीं मानते और यह भी नहीं मानते कि महात्मा गांधी बनने का मतलब वह थोड़ा-सा गोल चश्मा, वह टोपी, वह लाठी और वह दो अक्तूबर की राजघाट की सुबह होती है। या उस अहिंसा की नासमझ परिभाषा, जो एक गाल पर थप्पड़ से शुरू होकर दूसरे गाल की हड्डियों पर समाप्त हो जाती है। भले ही यह पीढ़ी गूगल मैप पर गांधी को पिन-अनपिन करती दो अक्तूबर को राजघाट की तरफ बढ़ भी जाए, लेकिन क्या वह प्राइमेट से मनुष्य बन महात्मा गांधी को उन तीनों बंदरों से कुछ आगे देख पाएगी, सुन पाएगी, समझ पाएगी, जैसा उस पेड़ की सबसे ऊंची डाल पर झूलता अनटचेबल का नायक बक्खा सुन और समझ रहा था। बक्खा कहता है, ‘मैं आश्वस्त हूं कि गांधी एक बहुत अच्छे व्यक्ति हैं। वह मानते हैं कि समाज सभी का है।’ राजा राव के उपन्यास कांथापुरा में तो गांधी की दांडी यात्रा गांवों की शोभा यात्रा बन चुकी थी और गांधी भजन और कीर्तन में आ चुके थे। डीजी तेंदुलकर 1921 में महात्मा की यात्रा के बारे में इस प्रकार लिखते हैं, ‘कमाल के दृश्य देखे गए। बिहार के एक गांव में जब गांधी और उनका दल ट्रेन में था, तो एक बूढ़ी औरत गांधी को ढूंढने आई। उसने कहा, ‘महाराज, अब मैं एक सौ चार साल की हो गई हूं, और मेरी दृष्टि धुंधली हो गई है। मैंने विभिन्न पवित्र स्थानों के दर्शन किए हैं। आप भी अवतार के रूप में प्रकट हुए हैं।’ इस सरल आस्था ने भारत के लाखों लोगों को बखूबी प्रभावित किया और हर जगह उनका स्वागत ‘महात्मा गांधी की जय’ के नारे के साथ किया। चाहे वह बारीसाल की वैश्याएं हों या कलकत्ता के मारवाड़ी व्यापारी, उड़िया कुली हों या खादी की चादरें भेंट करने के लिए उत्सुक संथाल।’
फिर हम क्यों महात्मा गांधी को सुनने और समझने से चूक गए? और उनको इनके और उनके में बांट दिया? प्रेमचंद तो नहीं चूके और न ही उनकी कहानियों और उपन्यासों के पात्र। और न ही जैनेंद्र कुमार, मैथिलीशरण गुप्त या रामधारी सिंह दिनकर। वे गांधी, जो ब्रिटिश हुकूमत को यह बता चुके थे कि उपवास करके भी देश को जोड़ा जा सकता है और पश्चिम से निकलने वाले अहंकार को समुद्र से एक चुटकी नमक लेकर वहीं डुबोया भी जा सकता है। नहीं तो आपने कभी सुना कि एक औपनिवेशिक मुल्क के व्यक्ति को एक ही टेबल पर बराबरी के साथ बात करने का न्योता (गांधी-इरविन) दिया गया हो, खाना और चाय पेश की गई हो। यह दीगर बात है कि गांधी वहां खाना नहीं खाते, बल्कि अपना खुद का लाया नींबू पानी बनाते, उसी चुटकी से नमक भी मिला लेते हैं, बिना विचलित हुए, जैसे दांडी यात्रा में नमक कानून को तोड़ा था।
फिर जब सारा देश 15 अगस्त, 1947 को आजादी का जश्न उस गांधी टोपी पहने और ‘महात्मा गांधी की जय’ के साथ मना रहा था, तो गांधी हिंदू-मुस्लिम की अज्ञानता से उपजी उस बर्बरता से बुरी तरह व्यथित थे। वह आजादी की रात चौबीस घंटे के उपवास पर बैठ चुके थे। फिर उस दिन जब प्रार्थना सभा के लिए पहुंचे, तो वह बारूद लिए गोलियां उनके अंदर के उस अभेद्य इन्सान को अहिंसा, सत्य और सद्भाव से अलग करने के लिए आ चुकी थीं। गांधी गिर पड़े, लेकिन तभी ‘निर्बल के बल राम’ आए और उस अहिंसा के योद्धा को युगों-युगों तक देश और समय से प्रश्न पूछते, वह दो शब्द दे गए, जो महात्मा गांधी अपनी अंतिम सांस के साथ वैष्णव जन और पीर पराई को समेटते हुए पूछ बैठे, ‘हे राम।’