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गांधी जयंती: आज भी प्रासंगिक हैं गांधी, आचरण और प्रतीक आज भी सुझा सकते हैं संकट का समाधान
Mon, 02 Oct 2023 06:59 AM IST
शिव शरण शुक्ला
शंकर कुमार सान्याल
शंकर कुमार सान्याल
Published by: शिव शरण शुक्ला
Updated Mon, 02 Oct 2023 06:59 AM IST
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महात्मा गांधी
- फोटो :
सोशल मीडिया
विस्तार
महात्मा गांधी ने आजीवन उस अस्पृश्य माने जाने वाले वर्ग के लिए संघर्ष किया, जिसने भारत के पूरे लिखित इतिहास के दौरान पीड़ाएं झेलीं। अंग्रेजों ने उन्हें वंचित वर्ग माना, पर गांधी जी को वह नाम पसंद नहीं आया, जिससे इस वर्ग के लोगों को पुकारा जाता था और उन्होंने उन्हें ईश्वर का मनुष्य यानी ‘हरिजन’ नाम दिया। आज इस वर्ग को जिस दलित नाम से पुकारा जाता है, वह डॉ. भीमराव आंबेडकर की देन है, जो खुद दलित थे। गांधी जी का मानना था कि यह अस्पृश्य शब्द जाति आधारित असमानता और मनुष्य द्वारा मनुष्य के अपमान की एक घृणित अभिव्यक्ति था।
चार मई, 1921 को उन्होंने यंग इंडिया में लिखा था, ‘मैं फिर से जन्म लेना नहीं चाहता। लेकिन, यदि मुझे पुनर्जन्म लेना पड़े, तो मैं एक अछूत के रूप में जन्म लेना चाहूंगा, ताकि, मैं उनके दुखों, पीड़ाओं तथा उनके अपमानों को साझा कर सकूं और खुद को व उन्हें उस दयनीय स्थिति से मुक्त कराने की कोशिश कर सकूं।’ उन्होंने यह भी कहा था, ‘वे जीवित रह सकें और पूरे आत्मसम्मान के साथ जी सकें, इसके लिए मैं मरना पसंद करूंगा। मेरा नजरिया ऐसा है कि मैं खुद दलित हूं।’
कमजोर वर्ग के प्रति उनकी सहानुभूति के उदाहरण उनकी किशोरावस्था से ही दिखाई पड़ने लगे थे। उका एक सफाईकर्मी का लड़का था, जो उनके घर की सफाई करता था। घर के बुजुर्गों ने किशोर गांधी और दूसरे बच्चों को सफाईकर्मी को छूने से यह कहते हुए मना किया था कि इससे वे अपवित्र हो जाएंगे। गांधी जी ने लिखा, ‘मैंने अपनी मां से कहा कि उका के साथ रिश्ते को पाप मानने में वह पूरी तरह से गलत थीं। यदि भगवान जल, थल, सर्वत्र व्याप्त है, तो केवल उका में वह कैसे नहीं हो सकते?’ वर्ष 1915 में भी एक ऐसा ही वाकया हुआ था, जब गांधी जी कोचरब आश्रम में एक हरिजन बालक को लेकर आए। उन्होंने उसका सिर मूंड दिया और उसके शरीर की सफाई की। इससे कुपित होकर आश्रम को धन मुहैया कराने वालों ने धन देना बंद कर दिया। पर, गांधी जी इससे अविचलित रहे। उन्होंने अनुसूचित जाति के एक व्यक्ति की बेटी लक्ष्मी को गोद लिया और उसे अपनी बेटी की तरह पाला। गांधी जी चाहते थे कि कमजोर वर्गों को हिंदू ही माना जाए। जब केरल के कुछ हिस्सों में हरिजनों के प्रवेश पर रोक लगाई गई, तो उन्होंने इसे वापस लेने के लिए सत्याग्रह का आह्वान किया। इतना ही नहीं, उन्होंने खुद उन मंदिरों में जाने से इन्कार कर दिया, जहां हरिजनों का प्रवेश वर्जित था।
महात्मा गांधी ने 20 सितंबर, 1932 को अंग्रेजी हुकूमत के कम्युनल अवॉर्ड को बदलने के लिए भी यरवदा जेल से आमरण अनशन शुरू किया, जिसे डॉ. आंबेडकर का समर्थन मिला हुआ था। गांधी जी के मुताबिक, अलग निर्वाचन क्षेत्र होना समस्या का हल नहीं है। डॉ. आंबेडकर के साथ इस विषय पर उनकी कई चर्चाएं हुईं और आखिरकार आंबेडकर ने अलग निर्वाचन क्षेत्र की अपनी मांग छोड़ दी। गांधी जी के सामाजिक आंदोलन अंतरराष्ट्रीय मामलों में भी महत्वपूर्ण साबित हुए। पहले विश्वयुद्ध और उसके बाद के नरसंहार से वह बेहद व्यथित हुए और उनका झुकाव शांति और अहिंसा की तरफ बढ़ता गया। पहले और दूसरे विश्वयुद्ध के बीच उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए प्रयास करने के साथ विभिन्न युद्धरत देशों को शांत करने की भी कई कोशिशें कीं। युद्ध दरअसल जर्मनी और इंग्लैंड के बीच हो रहा था, इसलिए, वह किसका पक्ष लें, इसे लेकर असमंजस में थे। हालांकि उन्होंने सुभाष चंद्र बोस की तरह देश को आजाद कराने के लिए दुश्मनों का इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि अंग्रेजी कपड़ों को जलाते हुए विभिन्न सत्याग्रह आंदोलनों की शुरुआत कर औपनिवेशिक सत्ता को चोट पहुंचाने की कोशिश की। 1942 में जब दूसरा विश्वयुद्ध अपने चरम पर था, तब उन्होंने ‘भारत छोड़ो’आंदोलन का आह्वान किया।
वह इस युद्ध को दो साम्राज्यवादी ताकतों के बीच की लड़ाई मानते थे, क्योंकि दोनों ही पक्ष विदेशी जमीन पर कब्जा कर अपनी राष्ट्रीय सीमाओं के विस्तार पर आमादा थे, जो गांधी जी को बिल्कुल स्वीकार्य न था। गांधी जी ने अपने विरोध प्रदर्शनों में पूरे देश को शामिल करते हुए विदेशी कपड़ों को जलाने जैसे ऐसे कदम उठाए, जो अंग्रेजी सरकार को आर्थिक नुकसान पहुंचाते थे। उनके आंदोलनों से देश की सेना के एक हिस्से को भी अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ जाने की प्रेरणा मिली। हालांकि आज हिंसा को फिर से ऊपर उठते देखना वाकई बेहद निराशाजनक है। यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध छिड़ा हुआ है, जिसमें लाखों लोग मारे जा चुके हैं। अफगानिस्तान में तालिबानी शासन ने वहां की शांति को नष्ट कर दी है। पूरा अरब प्रायद्वीप दो वैश्विक शक्तियों-अमेरिका और रूस-के आंतरिक युद्ध में उलझा हुआ है। आईएस नामक एक अशुभ बुरी ताकत अपने कब्जे वाले लोगों को क्रूरता से दबा रही है। संयुक्त राष्ट्र की प्रत्यक्ष भागीदारी में अमेरिका और रूस के संयुक्त प्रयासों से फिलहाल युद्धविराम जैसे हालात हैं, पर, यह किसी भी समय फिर से भड़क सकता है, क्योंकि सीरिया आईएसआईएस को अपनी जमीन से उखाड़ फेंकने को आमादा है। यह पूरा क्षेत्र एक अंतहीन युद्ध की ओर बढ़ रहा है, जिसमें लाखों लोग पहले ही मारे जा चुके हैं।
आज अगर गांधी जी जीवित होते, तो शायद अपने तरीकों से इन सबमें हस्तक्षेप करते। दुनिया की चेतना को आकर्षित करने के लिए वह शायद आमरण अनशन करते। या अंतरराष्ट्रीय मानस को झकझोरने के लिए वह शायद दांडी जैसी कोई यात्रा करते, जैसी उन्होंने सौराष्ट्र के तट की ओर बढ़ते हुए की थी, और, समुद्र के पानी से नमक बनाकर औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाने की कोशिश की थी।
आज दुनिया गांधी जी के प्रति कृतज्ञ महसूस करती है और शांति व अहिंसा को लेकर उनके विचारों व आदर्शों को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है। इस मामले में उनकी भूमिका को स्वीकार करते हुए संयुक्त राष्ट्र ने भी उनके जन्मदिन को विश्व अहिंसा दिवस घोषित किया है। जिस अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उन्होंने लगातार संघर्ष किया और अपने अहिंसक तरीकों से उन्हें देश छोड़ने पर मजबूर किया, वह इंग्लैंड भी उनकी बुद्धिमत्ता को स्वीकारता है। इतना ही नहीं, उसने नेल्सन मंडेला और सर विंस्टन चर्चिल की मूर्तियों के साथ उनकी प्रतिमा भी ब्रिटिश संसद के सामने लगाई है, जो गांधी जी और उनके विचारों की ताकत को ही दर्शाता है। इससे यह भी पता चलता है कि आतंकवाद और हिंसा से जूझ रही दुनिया में गांधी आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं।
(लेखक हरिजन सेवक संघ के अध्यक्ष हैं।)