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धूप आने दो: क्या महर्षि अगस्त्य और वशिष्ठ भाई थे? जानिए क्या कहते हैं धर्मशास्त्र

Sun, 18 Feb 2024 06:57 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 18 Feb 2024 06:57 AM IST
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सार
वशिष्ठ के शापवश मृत्यु को प्राप्त होने से पहले निमि ने भी उन्हें शाप दिया-‘महर्षि! मैं निर्दोष हूं, फिर भी आपने मुझे शाप दिया। मैं भी आपको शाप देता हूं कि मेरी मृत्यु के तुरंत बाद आपकी भी मृत्यु हो जाएगी!
 
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Maharishi Agastya and Vashishtha Were brothers Know full mythological story
महार्षि अगस्त्य और वशिष्ठ। सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Social Media

विस्तार

इक्ष्वाकु कुल में एक राजा हुए जिनका नाम था निमि। निमि सिद्ध तपस्वी भी थे। एक बार निमि ने एक यज्ञ कराने के लिए महर्षि वशिष्ठ से सहायता मांगी। संयोग से वशिष्ठ देवराज इंद्र का कोई यज्ञ करवाने जाने वाले थे, इसलिए उन्होंने निमि से कहा कि वह इंद्र के यज्ञ से लौटकर निमि का यज्ञ करवाएंगे। निमि को यज्ञ की जल्दी थी, इसलिए उन्होंने ऋषि गौतम के पुत्र शतानंद को बुलवाकर यज्ञ करवा लिया।


वशिष्ठ जब देवलोक से लौटे, तो उन्हें निमि के यज्ञ की बात याद थी। वह निमि से मिलने गए, लेकिन पता लगा कि निमि उस समय सो रहे थे। काफी देर प्रतीक्षा करने के बाद भी निमि शयन-कक्ष से बाहर नहीं निकले, तो वशिष्ठ को क्रोध आ गया और उन्होंने निमि को शाप देते हुए कहा, ‘निमि! तुमने अभिमानवश मेरा अपमान किया है। मैं तुम्हें शाप देता हूं कि तुम्हारी इसी क्षण मृत्यु हो जाए!’


राजा होते हुए भी निमि के पास तप की शक्ति थी। उन्हें भी वशिष्ठ पर क्रोध आ गया। वशिष्ठ के शापवश मृत्यु को प्राप्त होने से पहले निमि ने भी उन्हें शाप दिया : ‘महर्षि! मैं सो रहा था, इसलिए आपसे मिलने में विलंब हुआ। मैं निर्दोष हूं, फिर भी आपने मुझे शाप दिया। इसलिए मैं भी आपको शाप देता हूं कि मेरी मृत्यु के तुरंत बाद आपकी भी मृत्यु हो जाएगी!’ वशिष्ठ को शाप देने के बाद निमि की मृत्यु हो गई। और कुछ देर के बाद ही निमि के शाप के प्रभाव से वशिष्ठ ने भी अपने शरीर का त्याग किया। ब्रह्मलोक पहुंचकर वशिष्ठ ने ब्रह्मा को पूरी घटना सुनाई, तो ब्रह्मा ने वशिष्ठ से कहा : ‘ऋषिवर! निमि के शापवश आपकी असमय मृत्यु हुई, परंतु आपको महर्षि अगस्त्य के साथ मिलकर पृथ्वीलोक पर अनेक महत्वपूर्ण कार्य करने हैं। अत: आपका पुनर्जन्म होगा।’

परंतु वशिष्ठ को चिंता थी कि नारी के गर्भ से जन्म लेने पर पूर्वजन्म में अर्जित समस्त ज्ञान विस्मृत हो जाएगा और उनकी आध्यात्मिक शक्तियां भी लुप्त हो जाएंगी। तब ब्रह्मा ने वशिष्ठ को आश्वासन देते हुए कहा : ‘महर्षि! आप चिंता न करें। मैं वचन देता हूं कि आपका जन्म नारी के गर्भ से नहीं होगा। मैं आपके और महर्षि अगस्त्य के जन्म का विशेष प्रबंध कर रहा हूं।’

इस बीच, कश्यप और अदिति के बारह आदित्य-पुत्रों में से दो–मित्र और वरुण– ध्यान में लीन बैठे थे। तभी वहां से ब्रह्मा की प्रेरणा से उर्वशी नामक अप्सरा टहलती हुई निकली, जिसे देखकर मित्र-वरुण मुग्ध हो गए। उर्वशी का सौंदर्य इतना विलक्षण और अप्रतिम था कि मित्र स्वयं को रोक नहीं पाया और वह उर्वशी के पास प्रेम-प्रस्ताव लेकर पहुंच गया। परंतु उर्वशी को मित्र की अपेक्षा वरुण अधिक पसंद था, इसलिए उसने मित्र का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। परंतु इतनी देर में मित्र की उत्तेजना अपने चरम पर पहुंच चुकी थी और उसका ‘तेजस’ स्खलित होकर नीचे रखे एक कुंभ (घड़े) में जा गिरा। योजना भगवान ब्रह्मा की बनाई हुई थी, इसलिए उसमें चूक की कोई भी संभावना नहीं थी।

इधर अप्सरा उर्वशी, वरुण के पास चली गई। परंतु वरुण की निष्ठा मित्र के साथ थी। वरुण ने उर्वशी का प्रेम-प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। परंतु भीतर से वरुण पर भी काम हावी हो चुका था और वह भी अपने ऊपर संयम नहीं रख सका। इसके फलस्वरूप, वरुण का ‘तेजस’ भी स्खलित हो गया और उसी कुंभ में गिरा, जिसमें मित्र का तेजस गिरा था।

कुछ समय पश्चात, कुंभ में से एक तेजस्वी बालक ने जन्म लिया। कुंभ से पैदा होने के कारण उसका नाम पड़ा–‘कुंभ संभव’। यही बालक आगे चलकर महर्षि अगस्त्य के नाम से विख्यात हुआ! इसके कुछ ही समय बाद, उसी कुंभ से एक और ओजस्वी बालक ने जन्म लिया। कुंभ में मित्र और वरुण दोनों का तेजस था इसलिए दूसरे बालक का नाम पड़ा – ‘मैत्रावरुणि’। यह बालक बड़ा होकर वशिष्ठ बना!

चूंकि कुंभ संभव (अगस्त्य) और मैत्रावरुणि (वशिष्ठ), दोनों का जन्म एक ही कुंभ से हुआ, इसलिए दोनों भाई माने जाते हैं और उनमें भी अगस्त्य बड़े भाई हैं। वशिष्ठ और अगस्त्य, दोनों को गर्भ में नहीं रहना पड़ा, इसलिए दोनों का पूर्वजन्मों का ज्ञान भी अक्षुण्ण रहा। इसी कारण उन्हें शिक्षा के लिए किसी गुरु की आवश्यकता नहीं पड़ी।
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