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स्मरण: विष पीकर मधु देने वाला गीतकार, 100 साल बाद भी यादों में बसे हैं शैलेंद्र

Shyoraj Singh Bechain श्यौराज सिंह बेचैन
Updated Wed, 30 Aug 2023 06:57 AM IST
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सार
अपने गीतों को बिकाऊ न कहने वाले शैलेंद्र न सिर्फ महंगे गीतकार बने, सौ साल बाद भी वह कवि-श्रोताओं के दिल में जीवित हैं।
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Lyricist Shailendra memories still alive in the hearts of music lovers even after hundred years
Shailendra - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आज से ठीक सौ साल पहले तत्कालीन पंजाब के रावलपिंडी में एक दलित परिवार में पैदा हुए शैलेंद्र निराले गीतकार थे, जिनके खून में कविता थी। उनके खेतिहर मजदूर पूर्वज जाति उत्पीड़न के कारण बिहार के आरा जनपद के धुसपुर गांव से पलायन कर पंजाब में बस गए थे। शैलेंद्र का स्कूली नाम शंकरदास केसरीलाल था। उनकी पढ़ाई मथुरा में हुई, जहां उनके बड़े भाई रेलवे में सेवारत थे। आर्थिक विपन्नता के कारण उनकी संस्थागत शिक्षा बारहवीं कक्षा तक ही हो पाई थी। लेकिन स्कूल छूटने पर भी उनकी साहित्यिक दिलचस्पी गहरी होती चली गई। जीविका चलाने की मूलभूत आवश्यकता ने उन्हें रेलवे की एक सामान्य नौकरी करने को विवश किया।



फिल्मी गीतकारों को साहित्य धारा में प्राय: कम आंका जाता है, पॉपुलर राइटर कहकर उन्हें अध्ययन-चिंतन के दायरे से बाहर कर दिया जाता है। जबकि फिल्मों के लिए लिखना न तो शैलेंद्र की प्राथमिकता में था और न ही उसमें उनकी दिलचस्पी थी। वह सामाजिक सरोकारों से युक्त राष्ट्रीय चिंताओं के ओजस्वी कवि थे। उनका जीवन संघर्ष सुविधाभोगी कवियों से एकदम भिन्न था और व्यावसायिक लेखक बनने की उनकी बिल्कुल इच्छा नहीं थी।


शैलेंद्र पर वामपंथी आदर्श का अतिरेक हावी था और वह मजदूर किसान व आम इंसान से तादात्म्य स्थापित करने के लिए त्याग करने के शिखर पर जा पहुंचे थे। प्रगतिशील नजरिये के चलते वह इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ गए थे। आजादी के बाद देशभक्तों के दिलों में राष्ट्र के नवनिर्माण की उमंगें हिलोरें ले रही थीं और शैलेंद्र उन भावों को गीतों के जरिये दुनिया में फैला रहे थे। उन्होंने हिंदी-उर्दू, दोनों भाषाओं में समान अधिकार से लिखा तथा गीतों व कविताओं से हिंदी के सांस्कृतिक कोष को समृद्ध किया। उनकी गीतेतर कविताओं में भी प्रेम की प्रगाढ़ता है, जैसे-उस दिन ही प्रिय जनम-जनम की/साध हो चुकी पूरी!/जिस दिन तुमने सरल स्नेह भर/मेरी ओर निहारा। रेलवे कर्मचारी रहते हुए वह प्रगतिशील कविताएं लिखने लगे थे। एक-दो मंच पर जाते ही उनकी लोकप्रियता बढ़ गई थी।

एक कवि सम्मेलन में ही उन पर राजकपूर की पारखी दृष्टि पड़ी थी, जब उन्होंने जलता है पंजाब सुनाकर आभास करा दिया था कि वह आम-अवाम की इंसानी आजादी के लिए कितने फिक्रमंद हैं। राजकपूर ने जब उनसे फिल्मों के लिए गीत लिखने की पेशकश की, तो उन्होंने यह कहकर इन्कार कर दिया कि मेरे गीत बिकाऊ नहीं हैं। पर जब आर्थिक तंगी ने उन्हें तोड़ना आरंभ किया, तो बिकने ने ही उन्हें बचाया। एक समय ऐसा भी आया था, जब उनकी पत्नी-बच्चों के लिए भोजन के लाले पड़ गए थे। भोजन के अभाव में इकलौती बहन बीमार पड़ी और दवा के पैसे न होने से मौत के मुंह में चली गई। वैसे में, लाचार शैलेंद्र गीत बेचकर न सिर्फ जीविका चलाते रहे, बल्कि एक समय सबसे महंगे गीतकार बने। लेकिन जब उन पर फिल्म बनाने का जुनून चढ़ा, तो सारा पैसा डूब गया। उन्होंने फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी मारे गए गुलफाम पर तीसरी कसम फिल्म बनाई, जो चली नहीं। शैलेंद्र घाटे का सदमा नहीं झेल पाए और शराब-सिगरेट की गिरफ्त में चले गए और फिर वापस नहीं लौटे।

इंसानी भाईचारे को खास अहमियत देने वाले इस फनकार के साथ जाति-व्यवस्था ने क्रूर मजाक किया, जो बचपन से ही काले साये की तरह उनके वजूद पर मंडरा रही थी। रेलकर्मी के रूप में कार्य करते हुए वह लगातार लिख रहे थे, छप रहे थे और मंचों से सुने जा रहे थे। परंतु विभागीय सहकर्मी उनसे अस्पृश्यता का व्यवहार कर रहे थे। अपने अनुभवों में उन्होंने उन घटनाओं का गीतात्मक इजहार किया, जो उनकी कथित नीची जाति के कारण घटित हुई थीं। परंतु यह गीतकार विष पीकर मधु दे गया। तीसरी कसम फिल्म बनाने के दौरान भी लोगों ने उनके साथ धोखा किया, जिससे यह संवेदनशील कवि टूट गया।

शैलेंद्र को जिंदगी कम मिली। इसके पीछे उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थितियां जिम्मेदार थीं। लेकिन जब उनका देहांत हुआ, तब उनके गीतों की दीवानगी सिर चढ़कर बोल रही थी। उन्होंने लिखा था, 'तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर, अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर।' शैलेंद्र आज सौ-साल बाद भी जिंदा हैं, गा रहे हैं, सुने जा रहे हैं। रोशन ख्याल कवि-श्रोताओं के दिलों में शैलेंद्र जीवित हैं। 

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