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आग और सवाल: त्रासदी के बाद रस्मी संस्कृति से आगे बढ़कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई का वक्त

Tue, 23 Jun 2026 07:51 AM IST
Devesh Tripathi अमर उजाला
अमर उजाला Published by: Devesh Tripathi Updated Tue, 23 Jun 2026 07:51 AM IST
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सार
लखनऊ के अलीगंज में आग से हुई युवाओं की मौत महज एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था की कमी का एक और उदाहरण है। समय आ गया है कि हर त्रासदी के बाद शोक व्यक्त करने और जांच बिठाने की रस्मी संस्कृति से आगे बढ़कर दोषियों के खिलाफ ठोस एवं सख्त कार्रवाई की जाए।
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Lucknow Fire tragedy Questions rise time to move beyond ritualistic responses take strict action on guilty
लखनऊ कोचिंग अग्निकांड - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज क्षेत्र में सोमवार की दोपहर एक तीन मंजिला इमारत में आग लगने से हुए भयानक हादसे में कई युवाओं की मौत की जो दर्दनाक तस्वीर सामने आई है, वह वाकई झकझोरने वाली है। बताया जा रहा है कि आग लगने के बाद इमारत में धुआं भर गया और दूसरे फ्लोर पर स्थित एनिमेशन सेंटर के छात्रों में भगदड़ मच गई। उस स्थिति की कल्पना ही डराने वाली है, जब उनमें से कुछ छात्र जान बचाने के लिए ऊंचाई से कूद गए, तो कुछ बाथरूम में छिप गए। आग इतनी तेजी से फैली कि कई छात्र वहीं फंसे रह गए। गौरतलब है कि कुछ ही दिन पहले दिल्ली के मालवीय नगर के एक होटल में भी इसी तरह की दुर्घटना हुई थी, जिसमें बीस से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। ऐसे हादसे हमारे शहरों में तेजी से बढ़ रही सुरक्षा संबंधी लापरवाही की ओर ही इशारा करते हैं। अलीगंज में लगी आग की वजह तो जांच के बाद सामने आ ही जाएगी, लेकिन यह सवाल तो उठना स्वाभाविक है कि क्या इमारत में आग से बचाव के पर्याप्त इंतजाम थे? क्या वहां अग्निशमन यंत्र काम कर रहे थे? क्या आपातकालीन निकास द्वार और सुरक्षित निकासी व्यवस्था मौजूद थी? अगर नहीं थी, तो प्रशासन कहां सो रहा था? वास्तविकता यह है कि अधिकांश मामलों में ऐसी व्यवस्थाएं या तो होती नहीं हैं, या फिर केवल निरीक्षण के वक्त दिखावे के लिए रखी जाती हैं। चिंता की बात यह भी है कि हादसों के बाद जांच के आदेश और दोषियों पर कार्रवाई का आश्वासन देना एक रस्मी प्रशासनिक कवायद बनकर रह गई है। हर बड़े हादसे के बाद उच्चस्तरीय जांच बिठा दी जाती है, कुछ अधिकारियों को नोटिस जारी कर दिए जाते हैं, और कुछ दिनों की चर्चा के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसे हादसे लगातार होते ही रहेंगे। अब समय आ गया है कि हर त्रासदी के बाद शोक व्यक्त करने और जांच बिठाने की संस्कृति से आगे बढ़ें और लापरवाही की लपटों से बेगुनाहों को बचाने के लिए ठोस एवं सख्त कार्रवाई करें। ऐसे हादसों के कारणों की पारदर्शी जांच तो हो ही, हमें ऐसी व्यवस्था भी बनानी होगी, जहां सुरक्षा नियम कागजों पर नहीं, बल्कि जमीन पर भी दिखाई दें। किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी ऊंची इमारतों से नहीं, बल्कि अपने नागरिकों की सुरक्षा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता से होती है।
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