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मालवीय जी की अनन्य निष्ठा
Updated Mon, 24 Dec 2012 12:14 PM IST
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धर्मग्रंथों की तरह हमारे स्वाधीनता आंदोलन में भी कई ऐसे प्रसंग हैं, जो हमें सत्य और धर्म में निष्ठा रखने की सीख देते हैं। ऐसी घटनाएं आज भी इसलिए प्रासंगिक हैं, क्योंकि धर्म से विमुख होकर मानव-कल्याण की कल्पना ही नहीं की जा सकती। इसी से जुड़ा एक प्रसंग पंडित मदनमोहन मालवीय जी का है, जो 1931 में गांधी जी के साथ गोलमेज कांफ्रेंस में भाग लेने लंदन गए थे।
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लंदन में अहले सुबह उन्होंने स्नान किया और फिर अपने सामान में से भगवान श्रीकृष्ण का चित्र, गीता की प्रति, गंगाजल, तुलसी आदि निकाले। माथे पर उन्होंने तिलक लगाया और श्रीकृष्ण का चित्र सामने प्रतिष्ठापित कर पूजा करने लगे। गांधी जी ने उन्हें पूजा करते देखा, तो बोले, पंडित जी, आप अपने श्रीकृष्ण, गीता और गंगाजल को यहां भी लाना नहीं भूले। मैं इस निष्ठा के सामने नतमस्तक होता हूं।
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मालवीय जी ने कहा, बापू, गीता-भागवत के इस सिद्धांत में मेरा दृढ़ विश्वास है कि शरीर क्षणभंगुर है और न जाने प्राण कब साथ छोड़ जाएं। यदि अंतिम समय अपनी पावन मातृभूमि का सान्निध्य न भी मिले, तो कम से कम गंगाजल-तुलसी तो मुंह में डलवाने का सौभाग्य सहज ही में मिल जाएगा। इसलिए मैं हर क्षण मृत्यु का स्मरण करते हुए काशी की पावन मिट्टी तथा तुलसी-गंगाजल साथ रखता हूं। गांधी जी मालवीय जी की अपनी मातृभूमि व धर्म के प्रति अनन्य निष्ठा को देखकर गदगद हो उठे।
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