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क्रांतिकारी विरासत का जाना

sudhir vidyarthi सुधीर विद्यार्थी
Updated Tue, 01 May 2018 06:14 PM IST
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loss of revolutionary heritage
सुधीर विद्यार्थी
विगत 27 अप्रैल को प्रसिद्ध क्रांतिकारी शचींद्रनाथ सान्याल के पुत्र रंजीत कुमार सान्याल का छियानबे वर्ष की आयु में कोलकाता में निधन हो गया। उनकी अनुपस्थिति एक बड़े अर्थ में उस क्रांतिकारी विरासत की विलुप्ति है, जिसे वह अपनी कोशिशों से निरंतर जीवंत बनाए रहे। शचींद्रनाथ सान्याल की मां क्षिरोधवासिनी देवी और तीनों भाई रवींद्रनाथ, जितेंद्रनाथ और भूपेंद्रनाथ क्रांतिकारी गतिविधियों में संलिप्त थे। शचींद्र दा तो रासबिहारी बोस की टोली के प्रमुख क्रांतिकारी थे। 

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1925 के प्रसिद्ध काकोरी के मुकदमे में उन्हें काला पानी की सजा मिली थी, पर अंडमान से छूटकर भी वह चुप नहीं बैठे। उन्होंने पहली बार अखिल भारतीय स्तर पर 'हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ’ जैसे क्रांतिकारी दल का गठन कर उसका ऐतिहासिक संविधान रचा, जिसे आगे चलकर चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह के नेतृत्व में भी तब्दील नहीं किया गया। शचींद्र दा ने बांग्ला में एक अद्भुत कृति बंदी जीवन की रचना की, जो हिंदी में अनूदित होकर खासी लोकप्रिय हुई। इसे 'क्रांतिकारियों की गीता’ का दर्जा प्राप्त हुआ।

शचींद्र दा ने पत्नी प्रतिभा सान्याल को भी अपने सांचे में ढाल लिया था। एक बार उन्हें अपने तीन साल के बेटे रंजीत और पत्नी को साथ लेकर बनारस से फरार होना पड़ा। उत्तर भारत से कोलकाता के निकट चंदन नगर तक की वह यात्रा बहुत रोमांचकारी थी। वह उन दिनों फ्रेंच उपनिवेश था, इस कारण वहां उनकी गिरफ्तारी नहीं हो सकती थी। पर जिस मित्र के घर वह सपरिवार ठहरने पहुंचे, उन्होंने शरण देने से इन्कार कर दिया। ऐसे में निकट के एक कस्बे में किराये का एक घर लेकर शचींद्र दा ने उसे अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र बनाया। रंजीत वहां रहते हुए गंभीर रूप से बीमार भी पड़े, पर यह सब भी पिता को क्रांति के मार्ग से विलग नहीं कर सका। 

काकोरी के मुकदमे में शचींद्र दा को फिर आजीवन कारावास की सजा मिली, जिसका रंजीत के बाल मन पर बहुत प्रभाव पड़ा। 1937 में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस मंत्रिमंडल बनने पर शचींद्र दा रिहा हुए, पर उनका युद्ध समाप्त नहीं हुआ था। जेलयात्रा का सिलसिला जारी रहते हुए उन्होंने नैनी, बरेली और देवली के कारागारों में अध्ययन और लेखन की निरंतरता को टूटने नहीं दिया। इन कैदखानों में लिखी उनकी जेल डायरियां इसका सबसे बड़ा साक्ष्य हैं, जिन्हें रंजीत सान्याल ऐतिहासिक धरोहर की मानिंद सुरक्षित रखे रहे।

अपने पिता की जिंदगी का अद्भुत यादनामा उनके मानस में भी अटूट रूप से विद्यमान था, जिन्हें सुनकर लोग सघन पीड़ा से सराबोर हो जाते रहे। उनके भीतर अपने पिता की स्मृतियों का प्रवाह अत्यंत तीव्र था, जो उस दिन भी परत-दर-परत खुलता चला गया, जब हम पहली बार कोलकाता के प्रिंस अनवर शाह रोड पर उनके घर में बैठे थे।

छह फरवरी, 1943 को जब शचींद्र दा का निधन हो गया, तब रंजीत को इसकी सूचना बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में तार से मिली। वह पहुंचे, पर तब तक अंतिम क्रिया उनके चाचा जी कर चुके थे। 

रंजीत सान्याल उत्तर प्रदेश बिजली बोर्ड के चेयरमैन पद से अवकाश प्राप्ति के बाद इलाहाबाद छोड़कर कोलकाता में जा बसे थे। पर अपने अंतिम दिनों तक वह सचेत और सक्रिय रहकर शचींद्र दा की बौद्धिक और क्रांतिकारी चेतना के सजग संवाहक बने रहे। देश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर उनकी टिप्पणी 'सब कुछ सड़ गया है’ मेरे भीतर आज भी तेजी से घुमड़ रही है।
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