{"_id":"f3c2754e3a328771148fd8d95f46df3c","slug":"look-into-the-kitchen-of-poor-hindi","type":"story","status":"publish","title_hn":"कभी गरीबों की रसोई में भी झांको","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
कभी गरीबों की रसोई में भी झांको
कैलाश चंद्र मेहरा
Updated Sun, 30 Aug 2015 07:58 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
प्याज, तुम इतने बेवफा हो जाओगे, इसका इल्म हमें नहीं था। एक महीना हो गया, तुमने हमारी रसोई में आने का नाम नहीं लिया। आजकल हम मंडी में तुम्हारा दीदार कर दाम पूछ लेते हैं। तुमने अच्छी-अच्छी सब्जियों की हेकड़ी भुला दी है। पहले गोभी और टमाटर तुमसे आगे चल रहे थे। अब ये दोनों ही रेस में तुमसे बहुत पीछे रह गए हैं। तुम दाम का शतक बनाना चाहते हो और सरकार है कि तुम्हें सेंचुरी से पहले आउट करना चाहती है। देखते हैं, कौन जीतता है।
विज्ञापन
पिछले दिनों सेंसेक्स गिरा, निफ्टी लुढ़का, सोना-चांदी में गिरावट आई, रुपया भी लुढ़क गया। हम यह नहीं कहते कि तुम गिर जाओ। हम इतना चाहते हैं कि तुम बस नीचे आ जाओ। ऐसा लग रहा है, जैसे श्रीमती जी रूठकर मायके चली गई हैं। जैसे उनके मायके जाने पर रसोई सूनी लगती है, उसी तरह तुम्हारे बिना रसोई में जाने का मन नहीं करता। श्रीमती जी तो मायके जाने पर कभी मिस्ड कॉल कर लेती थीं, पर तुम्हारा तो स्विच ऑफ आ रहा है। कभी गरीब तबका प्याज के साथ रोटी खाकर अपना पेट भर लेता था। आज वह तुम्हें देखकर ही नमक से रोटी खाने पर मजबूर है। कभी तुम्हें छीलते हुए आंसू आते थे, लेकिन आज तुम्हें देखते ही आंसू आ जाते हैं। कुछ दिनों पहले तक तुम बीस रुपये किलो में मारे-मारे फिरते थे। लेकिन आज नब्बे पर पहुंचकर तुम अपने होश खो चुके हो। आज तुम्हारी पहुंच सिर्फ अमीरों तक है। इसीलिए तुम आसमान में उड़ रहे हो।
विज्ञापन
लेकिन एक बात जान लो। प्रकृति का यह शाश्वत नियम है कि जो गिरेगा, वह उठेगा जरूर। मसलन हम बीज को जमीन पर गिराते हैं, तो वह पल्लवित-पुष्पित होकर, अनाज या फल के रूप में ऊपर उठकर हमारी आपकी रसोई से उदर में पहुंचता है और नई ऊर्जा देता है। उसी तरह शाश्वत नियम यह भी है कि जो ऊपर है, वह नीचे गिरेगा। इसलिए एक दिन तुम्हारा नीचे गिरना भी तय है। ऐसे में कम से कम त्योहारों के इस मौसम में तो हम गरीबों की रसोई में झांक लिया करो। कहा-सुना माफ करना।
विज्ञापन