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लोकसभा चुनाव 2019: 1952 के दौर से वर्तमान की तुलना, नेताओं में व्यक्तिगत निष्ठा पहले

Sun, 21 Apr 2019 10:41 AM IST
रामचंद्र गुहा रामचंद्र गुहा
रामचंद्र गुहा Published by: रामचंद्र गुहा Updated Sun, 21 Apr 2019 10:41 AM IST
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Lok Sabha Elections 2019: Comparison of Current elections from first election
फाइल फोटो

हाल ही में मैं नई दिल्ली स्थित केंद्रीय अभिलेखागार में था, जहां 1951-52 में हुए पहले आम चुनाव से जुड़ी एक गोपनीय रिपोर्ट मैंने देखी। यह रिपोर्ट कमलनयन बजाज की लिखी हुई थी, जिनके पिता जमनालाल बजाज एक महान देशभक्त, परोपकारी और महात्मा गांधी के निकट सहयोगी थे। खुद कमलनयन एक सफल उद्यमी थे, जिनके कांग्रेस से बेहद आत्मीय संबंध थे। कांग्रेस ने राजस्थान के सीकर से उन्हें लोकसभा का टिकट दिया था। 


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हाल ही में मैं नई दिल्ली स्थित केंद्रीय अभिलेखागार में था, जहां 1951-52 में हुए पहले आम चुनाव से जुड़ी एक गोपनीय रिपोर्ट मैंने देखी। यह रिपोर्ट कमलनयन बजाज की लिखी हुई थी, जिनके पिता जमनालाल बजाज एक महान देशभक्त, परोपकारी और महात्मा गांधी के निकट सहयोगी थे। खुद कमलनयन एक सफल उद्यमी थे, जिनके कांग्रेस से बेहद आत्मीय संबंध थे। कांग्रेस ने राजस्थान के सीकर से उन्हें लोकसभा का टिकट दिया था। 

वह राम राज्य परिषद के प्रत्याशी के हाथों पराजित हुए, और उसके बाद उन्होंने आठ पृष्ठों की एक रिपोर्ट लिखी थी, जो पार्टी के सदस्यों के लिए थी। उस रिपोर्ट का शीर्षक था, 'आम चुनाव के साथ मेरे प्रयोग और राजस्थान से जुड़ी इसकी कुछ अनियमितताएं।' करीब 67 साल पहले लिखी गई वह रिपोर्ट आज भी उतनी ही शिक्षाप्रद है।

कमलनयन बजाज ने रिपोर्ट की शुरुआत ही 'कांग्रेस संगठन में दो समूहों की आपसी प्रतिद्वंद्विता से की, जिनमें एक समूह का नेतृत्व हीरालाल जी और दूसरे समूह का नेतृत्व वर्मा जी और व्यास जी कर रहे थे।' उन्होंने थोड़ी झल्लाहट के साथ लिखा था कि 'कांग्रेस के अंदर के ये दोनों प्रतिद्वंद्वी समूहों के लिए कार्यकर्ताओं की व्यक्तिगत निष्ठा पहले है और संगठन के प्रति निष्ठा उसके बाद।

नतीजतन वास्तविक तौर पर कई कुशल कार्यकर्ता नेपथ्य में धकेल दिए गए और कुछ ऐसे कार्यकर्ताओं को महत्व मिला, जिनका चरित्र संदिग्ध था और जिनका संगठन के प्रति कोई उल्लेखनीय काम भी नहीं था। 

नेताओं की अधिकांश ऊर्जा आपसी कलह और झगड़े में ही खत्म हो जाती थी। ऐसे में, संगठन को इसका नतीजा भुगतना पड़ा और वह सरकार और जनता के बीच पहले जैसा प्रभावी संपर्क नहीं रख सका। यहां तक कि सरकार के कुछ अच्छे और उपयोगी काम भी कुछ हद तक अप्रभावी रह गए, क्योंकि कांग्रेस उन कानूनों के बेहतर प्रभाव के बारे में जनता को बताने में विफल रही।'

राजस्थान में कांग्रेस को अपने लोगों से ही चुनौती मिली, क्योंकि प्रतिद्वंद्वी समूह का नेतृत्व ऐसे लोग कर रहे थे, जो पार्टी हित के बजाय अपने हित के लिए काम कर रहे थे। और बाहर से उसे दक्षिणपंथी राम राज्य परिषद से चुनौती मिली, जो राजस्थान के समृद्ध सामंतों के करीब थी और उन्हीं से उसकी फंडिंग भी होती थी। 

कमलनयन बजाज ने रिपोर्ट में राम राज्य परिषद के उस भ्रामक और झूठे प्रचार के बारे में लिखा है, जिसमें परिषद के नेता खुलेआम कहते थे कि 'कांग्रेस को दिया गया एक वोट एक हजार गायों की हत्या करने के बराबर है, जबकि राम राज्य (परिषद) को दिया गया एक वोट एक हजार गायों की देखभाल करने के पुण्य के बराबर होगा।'

रिपोर्ट में आगे कमलनयन ने वोट हासिल करने के लिए अपनाए गए गैरकानूनी तरीकों का जिक्र किया है, 'खासकर ब्राह्मणों को खुले हाथ से पैसे बांटे गए, ताकि वे राम राज के लिए वोट दें। बच्चों के बीच मिठाइयां बांटी गईं, ताकि वे राम राज के नारे लगाएं। राम राज्य परिषद के कार्यकर्ताओं ने दलितों को पैसे बांटे, लेकिन कुछ जगहों पर दलितों ने पैसे लेने से इनकार करते हुए कहा कि वे कांग्रेस को वोट देंगे।'

रिपोर्ट में इसका भी जिक्र किया गया है कि हिंसा के जरिये किस तरह चुनावी प्रक्रिया को विषैला बनाया गया। उन्होंने लिखा, 'अनेक बूथों पर राम राज के कार्यकर्ता लाठी और नंगी तलवारें लिए मुस्तैद थे और मतदाताओं को खुलेआम कह रहे थे कि अगर वे परिषद को वोट देना चाहते हैं, तभी बूथ के अंदर जाएं। कार्यकर्ताओं ने गरीब और भोले-भाले मतदाताओं को धमकी दी कि वे उनका जीना मुश्किल कर देंगे। इसके बावजूद आम धारणा यही थी कि कांग्रेस जीत जाएगी। यही कारण था कि कांग्रेस को वहां भी वोट मिले, जहां जागीरदारों का वर्चस्व था।'

कमलनयन बजाज के मुताबिक, पुलिस का रवैया राजस्थान के जागीरदारों के प्रति पक्षपाती था। जैसा कि उन्होंने लिखा है, 'चुनाव के दौरान मेरा यह अनुभव रहा कि पुलिस के एक हिस्से ने, जिनमें अधिकारी भी शामिल थे, धमकी और डर का माहौल बनाने में जागीरदारों का परोक्ष रूप से सहयोग किया, उन्होंने चुनाव में धांधली का भी आरोप लगाया, 'संदेह करने के ठोस कारण हैं कि कांग्रेस और किसान सभा वाली मतपेटियों के साथ छेड़छाड़ की गई।'

कमलनयन बजाज ने देश में हुए पहले आम चुनाव के बारे में यह लिखा है। इस समय सत्रहवीं लोकसभा के लिए चुनाव हो रहे हैं। और समय के लंबे अंतराल, मतदाताओं की संख्या में हुई बढ़ोतरी, और इस दौरान हुए सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के बावजूद कमलनयन 1952 के चुनाव में जिन बुराइयों से रूबरू हुए थे, 2019 के चुनाव में भी हम उन्हीं सारी बुराइयों के गवाह हैं। 

देश के कई राज्यों में कांग्रेस गुटबंदी की शिकार हैं, और नेता पार्टी को आगे बढ़ाने के बजाय अपनी व्यक्तिगत छवि चमकाने में लगे हैं। ऐसे ही, दक्षिणपंथी पार्टियां कांग्रेस और उसके नेताओं के खिलाफ झूठ फैलाने में लगी हुई हैं और उनकी हिंदू-विरोधी छवि बना रही हैं। फर्क बस इतना है कि अब यह झूठ मौखिक रूप से अफवाह फैलाए जाने के बजाय व्हाट्सएप के जरिये फैलाया जा रहा है। 

चुनाव में पैसे की ताकत अब कई गुना बढ़ चुकी है। अलबत्ता एक क्षेत्र ऐसा है, जिसमें इस दौरान अवनति के बजाय उन्नति हुई है। ईवीएम के आने के बाद मतों और मतपेटियों के साथ छेड़छाड़ आसान नहीं है।

एक फ्रेंच कहावत है, चीजें जितनी बदलती हैं, उतनी ही वे पुरानी रह जाती हैं। कमलनयन की 1952 की रिपोर्ट की आखिरी टिप्पणी से भी यह सच साबित होता है, जिसे मैं यहां उद्धृत कर रहा हूं। यह टिप्पणी है, 'आम तौर पर लोग सत्ता के गलियारों में व्याप्त भ्रष्टाचार से क्षुब्ध थे।'

पुनश्च: वर्ष 1957 के आम चुनाव में कमलनयन बजाज सीकर के बजाय वर्धा से खड़े हुए और जीते। इस तरह भारतीय चुनाव में उन्होंने एक और प्रवृत्ति जोड़ी, जो अब आम है। वह है, उम्मीदवारों द्वारा सुरक्षित सीट की तलाश करना।   
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