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लोहिया के वैचारिक अनुयायी

Tue, 29 Jan 2019 06:31 PM IST
Raman Singh रघु ठाकुर
रघु ठाकुर Published by: Raman Singh Updated Tue, 29 Jan 2019 06:31 PM IST
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Lohia's ideological followers
जॉर्ज फर्नांडिस

जॉर्ज 1984 का चुनाव हार चुके थे। हम जॉर्ज के साथ खम्मम जा रहे थे, जो आंध्र प्रदेश में है। हमें विशाखापट्टनम से ट्रेन लेनी थी। हमारे एक साथी ने स्लीपर क्लास की टिकट बुक कराई थी, जो वेटिंग में थी। रात में जब हम लोग ट्रेन पकड़ने पहुंचने, तो टिकट कंफर्म नहीं हो पाई। ट्रेन में कहीं बैठने के लिए जगह नहीं थी। हमने टीटीई से संपर्क किया और उसे बताया कि हमारे साथ जॉर्ज फर्नांडिस हैं, जो केंद्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं, तीन बार लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं और देश की सबसे बड़ी रेल हड़ताल (जो 1974 में हुई थी) का नेतृत्व कर चुके हैं, इनके लिए कम से कम एक बर्थ की व्यवस्था कर दें, तो काफी आनाकानी और असभ्य तरीके से व्यवहार के बाद उसने हमें एक बर्थ दी, जिस पर बैठकर हम लोगों ने यात्रा पूरी की। गौरतलब है कि जॉर्ज, जो देश के एक कद्दावर नेता थे, उन्हें भी टीटीई पहचान नहीं सका, उनके साथ अच्छा सलूक करना तो दूर की बात। संभवतः, इस घटना ने उन्हें दुख पहुंचाया हो और वह वैचारिक राजनीति के बजाय सत्ता की राजनीति की तरफ मुड़ गए हों।


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लेकिन जॉर्ज के राजनीतिक जीवन का दो तिहाई हिस्सा संघर्ष का रहा है और एक तिहाई हिस्सा ही सत्ता की राजनीति का रहा है। वह समाजवादी राजनीति का एक कद्दावर चेहरा थे और लोहिया के गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति के हिमायती थे, जो कि मूलतः गैर-सत्तावाद था। अपने प्रारंभिक राजनीतिक जीवन में उन्होंने विरोध और विद्रोह की राजनीति की। उन्होंने ट्रेड यूनियन से राजनीति की शुरुआत की। वह मजदूरों के मसीहा थे। 1960 तक आते-आते वह टैक्सी ड्राइवर यूनियन के सबसे बड़े नेता बन गए और लोग उन्हें अनथक विद्रोही भी कहने लगे। एक वक्त था, जब उनके इशारे पर मुंबई (तब बंबई) थम जाती थी। शुरू में वह पार्षद बने, फिर विधायक बने और जब1967 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के एक कद्दावर नेता एस के पाटिल को बंबई दक्षिण सीट से हराया, तो लोग उन्हें 'जॉर्ज द जायंट किलर' भी कहने लगे। मुंबई में रहते हुए रेल कर्मचारियों, टैक्सी ड्राइवरों, मजदूरों के हित में उन्होंने काफी आंदोलन किया और उनके मसीहा बनकर उभरे। लेकिन पूरे देश ने उन्हें तब जाना, जब 1974 में उनके नेतृत्व में सबसे बड़ी रेल हड़ताल हुई और सरकार पूरी तरह से हिल गई। उन्होंने मजदूरों के लिए बैंक की स्थापना की। कोंकण रेलवे की स्थापना का श्रेय भी उन्हें ही दिया जाता है।

मेरा उनके साथ 1967 से जुड़ाव रहा है। उनके साथ रेल हड़ताल में मैं भी गिरफ्तार हुआ था। आपातकाल के समय में वह काफी लंबे समय तक भूमिगत रहे और फिर बाद में डायनामाइट कांड के आरोप में गिरफ्तार हुए। हालांकि बाद में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो उस मामले को खत्म कर दिया गया। एक संघर्षशील नेता के रूप में उन्हें मैं हमेशा याद रखना चाहूंगा।

समाजवादी पृष्ठभूमि का ऐसा विद्रोही नेता आखिर अपने राजनीतिक जीवन के उत्तरार्ध में सत्ता की राजनीति क्यों करने लगा? मैंने एक बार उन्हें इसी बाबत पत्र लिखते हुए कहा था कि आपके जैसे नेता की भूमिका सिर्फ एक मंत्री की नहीं होनी चाहिए, बल्कि आपकी भूमिका बदलाव की राजनीति को आगे बढ़ाने की होनी चाहिए। इसके जवाब में उन्होंने मुझे लिखा, प्रिय रघु, अब वैचारिक राजनीति संभव नहीं है। अब सत्ता की राजनीति करने का ही वक्त है। तो कहने का मतलब यह है कि उन्होंने अपना मन बदल लिया था और यह बदलाव या भटकाव उनमें 1980 के बाद से ही दिखने शुरू हो गए थे। यह उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट था। यह वही जॉर्ज थे, जिन्होंने मोरारजी देसाई की सरकार के बचाव में दिन में लंबा भाषण दिया था और दोहरी सदस्यता के सवाल पर रात में मधु लिमये के साथ अपना इस्तीफा भी दे दिया था। इसका मुख्य कारण था कि संघ की राजनीति को वह मन से स्वीकार नहीं कर पा रहे थे।
 
यों तो गठबंधन राजनीति की शुरुआत लोहिया के समय से ही शुरू हो गई थी, लेकिन तब गठबंधन का मुख्य आधार सत्ता प्राप्ति नहीं था, बल्कि न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर गठबंधन होता था। यह सिलसिला तब तक चला, जब तक लोहिया जीवित थे, लेकिन बाद में गठबंधन की राजनीति में काफी भटकाव आ गया और कार्यक्रमों को लेकर नहीं, बल्कि सत्ता प्राप्ति के लिए राजनीतिक गठबंधन होने लगे। इस तरह के सत्ता गठबंधन में भी जॉर्ज फर्नांडिस की भूमिका काफी सक्रिय रही और इस तरह की गठबंधन राजनीति को उन्होंने आगे बढ़ाया। बाद में उन्होंने समता पार्टी भी बनाई। दल के दलदल में जब एक बार आप फिसलते हैं, तो फिर फिसलते ही चले जाते हैं, यही हुआ जॉर्ज के साथ। बाद में चुनाव जीतने के लिए वह कभी लालू यादव, तो कभी नीतीश कुमार पर निर्भर हो गए।
 
अपने राजनीतिक जीवन में जॉर्ज संचार मंत्री, उद्योग मंत्री और फिर रक्षा मंत्री बने। उन्होंने सत्ता और विपक्ष, दोनों की राजनीति की और दोनों में सक्रिय भूमिका निभाई। वह अटल बिहारी वाजपेयी के बहुत प्रिय नेता थे और वाजपेयी सरकार के प्रमुख सहयोगी थे। अटल सरकार में रक्षा मंत्री रहते हुए, जब ताबूत घोटाले में इनके ऊपर आरोप लगा, तो इन्होंने स्वयं जांच का आदेश दिया और अपना इस्तीफा सौंप दिया, जिसमें अदालत से वह बेदाग होकर निकले। लेकिन वाजपेयी नहीं चाहते थे कि जॉर्ज फर्नांडिस इस्तीफा दें।
 
भारतीय राजनीति में उन्हें सरकारों को हिलाने वाले एक बड़े मजदूर नेता के रूप में याद किया जाएगा, जिन्होंने बड़े-बड़े आंदोलनों में अपनी रचनात्मक भूमिका निभाई। संसद के पटल पर उन्होंने जनहित एवं राजनीति के मुद्दों को जोर-शोर से उठाया। वह लोहिया के वैचारिक अनुयायी तो थे ही, बदलाव की राजनीति के भी एक महत्वपूर्ण स्तंभ थे। भारतीय राजनीति का एक बड़ा हिस्सा उनके साथ जुड़ा रहेगा। वह चाहे विपक्ष में रहे या सत्ता में, हमेशा रचनात्मक हस्तक्षेप करते रहे।

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