{"_id":"67903d35107c8d104f040305","slug":"livestock-less-cattle-more-milk-alarming-breeders-have-to-think-scientific-policy-need-of-the-hour-2025-01-22","type":"story","status":"publish","title_hn":"पशुधन: मवेशी कम, दूध ज्यादा... पशुपालकों को भी सोचना होगा; भयमुक्त संचरण-बिक्री की वैज्ञानिक नीति समय की मांग","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
पशुधन: मवेशी कम, दूध ज्यादा... पशुपालकों को भी सोचना होगा; भयमुक्त संचरण-बिक्री की वैज्ञानिक नीति समय की मांग
Wed, 22 Jan 2025 06:05 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
सुभाष चंद्र कुशवाहा
सुभाष चंद्र कुशवाहा
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Wed, 22 Jan 2025 06:05 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
पशुपालकों के लिए वैज्ञानिक नीति समय की मांग
- फोटो :
अमर उजाला/एजेंसी
विस्तार
केंद्र सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग की ओर से जारी श्वेतपत्र के अनुसार, 1973 में प्रति व्यक्ति दूध का उत्पादन 110 ग्राम था, जो 2022 में बढ़कर 477 ग्राम पहुंच गया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दुग्ध उत्पादन 2023-24 में लगभग चार प्रतिशत से बढ़कर 23.9 करोड़ टन तक पहुंच गया है और 2007, 2012 और 2019 के पशु सर्वेक्षण बताते हैं कि देसी गायों की संख्या में 10 प्रतिशत की ही बढ़ोतरी हुई है, जबकि विदेशी या संकर नस्ल की गायों की संख्या में 76 प्रतिशत का इजाफा हुआ है।
केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्री राजीव रंजन द्वारा लोकसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक, दुधारू मवेशियों की संख्या बढ़ने से दूध उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है। केंद्रीय मंत्री द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, गायों की संख्या 19.09 करोड़ से बढ़कर 19.30 करोड़ हो गई है। देखा जाए तो भारत जैसे कृषि प्रधान देश में यह कोई विशेष वृद्धि नहीं कही जा सकती है। दूसरी ओर पशुपालन, दुग्ध और मत्स्य विभाग के आंकड़े बताते हैं कि 1987 में 19.97 करोड़ गाय-बैल थे, जो 2019 में घटकर 19.25 करोड़ रह गए। बैलों की संख्या में तेजी से कमी बता रही है कि गायों की संख्या में वृद्धि नहीं हुई है।
एक ओर ये आंकड़े हैं, तो दूसरी ओर भारत के ज्यादातर राज्यों में नकली दूध के बड़े पैमाने पर कारोबार होने का पर्दाफाश हुआ है और छापेमारी में लाखों लीटर नकली दूध बरामद हुआ है। दिल्ली से सटे बुलंदशहर में हाल ही में नकली दूध, घी और पनीर बनाने वाली फैक्टरी का भंडाफोड़ हुआ है, जहां चार हजार लीटर सिंथेटिक दूध और ढाई हजार किलो पनीर बरामद हुआ है। छत्तीसगढ़ के रायपुर-बिलासपुर संभाग में नकली दूध, घी के कारोबार के समाचार व्यापक पैमाने पर मिल रहे हैं। तिरुपति मंदिर के लड्डू में घी के बजाय, नकली घी के इस्तेमाल का मामला प्रकाश में आ चुका है। यानी दूध की मांग की तुलना में आपूर्ति न होने के कारण भी नकली दूध का कारोबार बढ़ा है।
नकली दूध की जांच हेतु नमूने भी लिए गए हैं। राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने विगत वर्ष संसद में बताया था कि देश के विभिन्न प्रदेशों में नकली दूध के कारोबार को नियंत्रित करने के लिए आंध्र प्रदेश में 6,319, बिहार में 2,806, छत्तीसगढ़ में 1,373, दिल्ली में 3,412, उत्तर प्रदेश में 27,750 और महाराष्ट्र में 5,087 नमूने लिए गए थे। ये तमाम आंकड़े और समाचार, हालात की गंभीरता को बताने के लिए काफी हैं कि अपने यहां दुग्ध उत्पादन के बारे में जो आंकड़े पेश किए जा रहे हैं, वे जरूरत के मुताबिक नहीं हैं।
देसी नस्ल के मवेशियों को बढ़ावा देने के लिए चलाई जा रही राष्ट्रीय गोकुल मिशन जैसी योजनाओं के बावजूद, देश में देसी गायों की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है। पशुधन गणना 2019 की अंतरिम रिपोर्ट के मुताबिक देश में देसी मवेशियों की संख्या गिरकर 13.98 करोड़ रह गई है।
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 2012 में हुई पिछली पशुधन गणना की तुलना में इस बार देसी मवेशियों संख्या में 7.5 फीसदी की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। 1992 में देसी मवेशियों की संख्या 18.93 करोड़ थी, जो 2012 में घटकर 15.11 करोड़ रह गई। हैरानी की बात यह है कि तमाम केंद्रीय और राज्य सरकारों की योजनाओं के बावजूद, देसी मवेशियों की संख्या में लगातार गिरावट जारी है। पशुधन गणना 2019 की अंतरिम रिपोर्ट के आंकड़ों से पता चलता है कि देसी मवेशियों के संख्या इस दौरान 26 फीसदी घटी है। कृषि का कार्य मशीनों से लिए जाने के कारण बैल अनुपयोगी हो चुके हैं। ऐसे में किसानों के लिए बैल बोझ बन जाने के कारण, सड़कों पर आवारा घूमने को विवश हैं और दुर्घटनाओं में मारे जा रहे हैं। एक यह भी कारण है जिससे, नर पशुओं की संख्या में तेजी से कमी आ रही है।
1992 में नर मवेशियों की संख्या 10.16 करोड़ थी, जो 2019 की गणना के मुताबिक घटकर 4.66 करोड़ ही रह गई है। दूसरी ओर चरागाहों के खत्म हो जाने और नई पीढ़ी द्वारा खेती-किसानी, पशुपालन से किनारा कर लेने की प्रवृत्ति ने भी गाय और दुग्ध उत्पादन को प्रभावित किया है। गोधन संवर्धन संकट में है। किसानों के लिए गाय पालन मुनाफे का रोजगार बनाए बिना इसको बढ़ाया नहीं जा सकता है। इसलिए जरूरत है कि गायों के पालने, उनके संचरण और बिक्री को भयमुक्त और लाभप्रद बनाने की एक वैज्ञानिक नीति लागू हो, जिससे पशुधन में वृद्धि़ हो सके। इसके साथ ही पशुपालकों को भी इस दिशा में सोचना होगा।