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असंभव को अर्जित करती फिल्म
रवींद्र त्रिपाठी
Updated Sat, 09 Mar 2013 11:53 PM IST
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भारतीय मीडिया का ऑस्कर को लेकर ये उत्साह अलग से विश्लेषण की मांग करता है। आखिर एक विदेशी या अमेरिकी पुरस्कार समारोह को लेकर हम क्यों इस कदर जोश से भर जाते हैं? पर इस सवाल से परे एक दूसरा धरातल है जहां `लाइफ ऑफ पाई’ की चर्चा होनी चाहिए क्योंकि बतौर एक कलाकृति, उसमें कई बातें ऐसी हैं जो कला, दर्शन और सौंदर्यबोध के महत्वपूर्ण पहलुओं से जुड़ी हैं। और यही बातें उसको एक ऐसी अहमियत देती हैं, जिससे वह बड़ी फिल्म बनती है।
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पर फिलहाल यहां सिर्फ दो बातों पर मुख्यरूप से चर्चा होगी- एक तो निर्देशन पर और दूसरे विजुअल इफेक्ट पर। हालांकि फिल्म को सिनेमेटोग्राफी के लिए भी ऑस्कर पुरस्कार मिला है। लेकिन निर्देशन और विजुअल इफेक्ट इसके दो ऐसे खास पहलू हैं – जिसकी वजह से इसके शरीर और इसकी आत्मा में भरावट आ गई है।
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विजुअल इफेक्ट में भी मुख्य है रिचर्ड पारकर, जो उस शेर का नाम है, जिसके साथ फिल्म का मुख्य किरदार पाई, (पिसीन मोलिटर पटेल का छोटा रूप), समुद्र में अकेले 227 दिन बिताता है। रिचर्ड पारकर सचमुच का शेर नहीं है। वह ग्राफिक्स से बनाया गया शेर है। इस फिल्म में ग्राफिक्स के और कई कमाल हैं, लेकिन रिचर्ड पारकर नाम का शेर और पाई नाम का चरित्र (जिसकी समुद्र में नौका पर 227 दिन बितानेवाली भूमिका सूरज शर्मा ने निभाई है) वही इस फिल्म का नाभिक हैं।
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अगर किसी वास्तविक शेर को लेकर ये फिल्म बनाने की कोशिश होती तो बन नहीं पाती। ये एक सामान्य ज्ञान और समझ की बात है। ग्राफिक्स की वजह से ही ये फिल्म उस असंभव को अर्जित कर सकी है। ये तकनीक की अपनी वैधता भी है। अक्सर ये कहा जाता है तकनीक किसी कला के भीतरी सौंदर्य़ को नहीं बढ़ाती है, बस सिर्फ बाहरी को अलंकृत करती है। लेकिन `लाइफ ऑफ पाई’ में अगर विजुअल इफेक्ट का उपयोग नहीं होता, तो न ये फिल्म बन पाती न उसकी आत्मा बचती। विजअल इफेक्ट के और भी कई चमत्कार इसमें हैं।
दूसरा अहम तत्व है निर्देशक। अगर निर्देशकीय परिकल्पना न होती कि किस तरह का ग्राफिक्स या विजुअल इफेक्ट तैयार किया जाए तो रिचर्ड पारकर, जो दरअसल वर्चुअल शेर है, अस्तित्व में न आता। फिर शेर और पाई की नौका सवारी कैसे होती? और जो बात निर्देशक कहना चाहता है वह कैसे कह पाता? लेकिन निर्देशकीय परिकल्पना सिर्फ विजुअल इफेक्ट या वर्चुअल शेर तक सीमित नहीं है, बल्कि आध्यात्मिकता की तलाश में भी है, जिसकी जरूरत आज हम सब महसूस करते हैं।
पाई, जैसा कि निर्देशक ने दिखाया है- किसी एक धर्म में विश्वास नहीं करता। उसमे हिंदुत्व, ईसाइयत और इस्लाम के प्रति भी आदर और आस्था है। वह दरअसल बहुधर्मी है जो आज के वैचारिक और धार्मिक माहौल में एक अच्छी कल्पना भर है वास्तविकता नहीं। फिल्म बहुधर्मिता के प्रति विश्वास व्यक्त करती है। प्रौढ़ पाई (जिसकी भूमिका इरफान खान ने निभाई है) के बारे में प्रसिद्ध है कि उसकी जिंदगी की कहानी सुनने के बाद ईश्वर में आस्था उत्पन्न हो जाती है। ये ईश्वर किसी धर्म से जुड़ा ईश्वर नहीं है।
ये वो ईश्वर है, जो सबके भीतर आस्था के रूप में है या होना चाहिए। `लाइफ ऑफ पाई’ की कहानी आस्था की कहानी है। पाई समुद्र में एक शेर के साथ सिर्फ इसलिए 227 दिन नहीं बिताता कि उसमें किसी तरह की खास क्षमता है शेर या किसी जंगली पशु को वश में करने की। फिल्मकार के मुताबिक, या उसकी परिकल्पना में वह इतने दिन एक शेर के साथ एक नौका में इसलिए बिता पाता है कि वह भीतर से आस्थावान है। किसी धर्म के प्रति नहीं बल्कि ईश्वर के प्रति।