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इतिहास: 'फातिमा शेख' जैसे कई प्रकरण, विषैले नैरेटिव के मकसद की कलई खुली; झूठ की ईंट पर आख्यान खड़ा करने की कला

Thu, 16 Jan 2025 05:07 AM IST
Balbir Punj बलबीर पुंज
Updated Thu, 16 Jan 2025 05:07 AM IST
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सार
एक धारणा गढ़ने के लिए जो अस्तित्व में न हो, उसे कल्पित से वास्तविक बनाने के लिए झूठे किस्से गढ़े जाते हैं। फिर, उसे सच की तरह दिखने वाली चमकदार पॉलिश की जाती है, ताकि सामान्य आदमी उसे स्थापित सत्य मान ले।
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Lies in History incidents like Fatima Sheikh expose motive of toxic narrative in public discourse
फातिमा शेख - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अब सामने आया है कि जिस ‘फातिमा शेख’ को भारत की ‘पहली मुस्लिम अध्यापिका’ कहा जाता रहा है, उस शख्सियत का कोई अस्तित्व ही नहीं रहा है। सार्वजनिक संवाद में इस तरह के धोखे अपवाद नहीं हैं। ये विश्वव्यापी ‘टूलकिट’ का हिस्सा हैं, जो काल्पनिक तथ्यों के आधार पर एक सुनिश्चित नैरेटिव के मायाजाल की रचना करते हैं। पिछली दो शताब्दियों में अर्धसत्य, सफेद झूठ और विकृत तथ्यों पर नैरेटिव गढ़ने की एक विशेष विधा विकसित हुई है, जिसका भारत भी शिकार है।



गत दिनों दलित-चिंतक दिलीप मंडल पर सोशल मीडिया में दावा किया कि उन्होंने बिना किसी ऐतिहासिक या पाठ्य-साक्ष्य के ‘फातिमा शेख’ नामक काल्पनिक चरित्र को गढ़ा था। मंडल का कहना है कि समाज सुधारक ज्योतिराव गोविंदराव फुले (1827-90) और भारत की प्रथम महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले (1831-1901) की रचनाओं में कहीं भी ‘फातिमा शेख’ जैसा कोई नाम नहीं है, जो शिक्षिका रही हो। बकौल मंडल, संविधान निर्माता डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने भी फातिमा का उल्लेख नहीं किया था। अब मंडल ने ऐसा क्यों किया था, यह उन्होंने नहीं बताया। परंतु यह छल संभवत: उस ‘दलित-मुस्लिम एकता’ नामक नैरेटिव को तार्किक मजबूती देने का प्रयास था।


इस ताजा फर्जीवाड़े के उद्घाटित होने पर मुझे ऐसे कई मामले याद आते हैं, जिन्हें खास विचार के टूलकिट और निहित स्वार्थों की पूर्ति हेतु गढ़ा गया था। हैदराबाद विश्वविद्यालय के 26 वर्षीय पीएचडी छात्र रोहित वेमुला ने 17 जनवरी, 2016 को छात्रावास के अपने कमरे में आत्महत्या कर ली थी। तब इस मामले को ‘दलित हत्या’ का विषय बनाकर भाजपा, आरएसएस और एबीवीपी को कटघरे में खड़ा कर दिया गया था। यह स्थिति तब थी, जब रोहित अनुसूचित-जाति वर्ग (दलित) से नहीं था। अपनी मौत की सच्चाई को रोहित ने जिस सुसाइड नोट में लिखा था, उसे दबाने का भरसक प्रयास हुआ था। उस चिट्ठी में एक अनुच्छेद लिखकर काटा गया था, जिसमें रोहित ने अपने वामपंथी संगठन से मोहभंग होने की बात कही थी।

इसी तरह 23 सितंबर, 1998 को मध्य प्रदेश के झाबुआ में चार ननों से सामूहिक बलात्कार को ‘सांप्रदायिक’ बना दिया गया था, जबकि यह दो समूहों के बीच आपसी विवाद से जुड़ा मामला था। तब प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने बिना किसी साक्ष्य के इसका आरोप हिंदूवादी संगठनों पर मढ़ दिया। जांच के पश्चात इस अपराध में अदालत द्वारा दोषी वे स्थानीय आदिवासी पाए गए, जिन्हें इंजीलवादी-वामपंथी समूह हिंदू तक नहीं मानते।

गुजरात में गोधरा रेलवे स्टेशन के निकट 27 फरवरी, 2002 को जिहादियों ने ट्रेन के एक डिब्बे में 59 कारसेवकों को जिंदा जला दिया था। वर्ष 2004-05 में रेल मंत्री रहते हुए राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया लालू प्रसाद यादव ने एक जांच समिति का गठन करके यह स्थापित करने का प्रयास किया कि गोधरा कांड मजहबी घृणा से प्रेरित न होकर केवल हादसा मात्र था। समिति की इस रिपोर्ट को गुजरात उच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया, तो कालांतर में अदालत ने मामले में हाजी बिल्ला, रज्जाक कुरकुर सहित 31 लोगों को दोषी ठहराया।

इस पूरे प्रकरण पर मुझे वामपंथी ‘लेखिका’ अरुंधति रॉय का दो दशक पुराना वह आलेख स्मरण होता है, जिसे उन्होंने एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी पत्रिका को लिखते हुए झूठा दावा किया कि दंगे में तत्कालीन कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी की बेटी को निर्वस्त्र कर जिंदा जला दिया गया था। इस पर जाफरी के बेटे तनवीर ने खुलासा किया था कि तब उनकी बहन अमेरिका में थी। इस झूठ के लिए अरुंधति को माफी मांगनी पड़ी थी।

‘भगवा आतंकवाद’ सिद्धांत भी झूठ आधारित टूलकिट का ही एक सह-उत्पाद था। इस मिथक को कांग्रेस नीत संप्रगकाल (2004-14) में उछाला गया, जिसकी जड़ें 1993 के मुंबई शृंखलाबद्ध (12) बम धमाकों में मिलती हैं, जिनमें 257 मासूम मारे गए थे। तब महाराष्ट्र के तत्कालीन  मुख्यमंत्री शरद पवार ने आतंकियों की मजहबी पहचान और उद्देश्य से ध्यान भटकाने हेतु एक झूठ गढ़ दिया कि एक ‘13वां’ धमाका मस्जिद के पास भी हुआ था। अपने इस सफेद झूठ पर पवार कई बार गौरवान्वित हो चुके हैं। यह सब प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से घटनाओं में ‘हिंदू आतंकवाद’ जोड़ने का प्रयास था, जिसे संप्रगकाल में पी. चिदंबरम और सुशील कुमार शिंदे सहित शीर्ष कांग्रेस नेतृत्व ने आगे बढ़ाया। कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने तो सभी सीमाओं को पार कर दिया था।

वर्ष 2008 में मुंबई पर भयावह 26/11 आतंकवादी हमला हुआ, जिसमें 29 विदेशी नागरिकों सहित 166 निरपराध मारे गए थे। आतंकवादी कसाब और डेविड हेडली (दाऊद सैयद गिलानी) के जीवित पकड़े जाने के बाद स्पष्ट हो गया था कि इस आतंकी हमले को पाकिस्तान में जिहादी संगठन ‘लश्कर-ए-तैयबा’, पाकिस्तानी सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने मिलकर रचा था। परंतु दिसंबर, 2010 में दिग्विजय सिंह ने ‘26/11-आरएसएस की साजिश’ नामक मनगढ़ंत पुस्तक का लोकार्पण करके विमर्श ही उलटने की कोशिश की थी। यदि इसके कारणों को तलाशा जाए, तो यह केवल मुस्लिम वोटबैंक को रिझाने या पाकिस्तान को क्लीनचिट देने के प्रयास तक सीमित नहीं था वास्तव में, इसका मकसद इस्लामी आतंकवाद को ‘न्यायोचित’ ठहराने हेतु ‘हिंदू आतंकवाद’ का सिद्धांत गढ़ देना था।

बाटला हाउस सहित इस प्रकार के ढेरों उदाहरण हैं, जिन्हें उनके निहित एजेंडे के साथ लंबे समय तक चलाया जाता रहा है। तात्कालिक तौर पर बारंबार दोहराकर ये भ्रम  विचार बना दिए जाते हैं और अंत में सत्य की तरह उद्धृत किए जाने लगते हैं। वर्तमान दौर में विषाक्त टूलकिट, युद्ध में उपयोग होने वाले किसी घातक हथियार की तरह है। एआई तकनीक के युग में यह और भी खतरनाक हो चुका है, जो केवल समाज को भ्रमित ही नहीं करता है, अपितु निरपराधों के खिलाफ हिंसा या वैमनस्य को भी बढ़ावा देता है। ‘फातिमा शेख’ पर हालिया खुलासे ने न सिर्फ उसी विषैले नैरेटिव के उद्देश्य की कलई खोली है, बल्कि ऐसे नैरेटिव की मारक क्षमता को पुन: रेखांकित किया है।

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