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बासठ के युद्ध का सबक : चीन की चालबाजियों को समझने की जरूरत, क्या सीमा विवाद का हो सकता है निपटारा?

Sat, 22 Oct 2022 08:44 AM IST
Maroof Raza मारूफ रजा
Updated Sat, 22 Oct 2022 08:44 AM IST
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सार
आज सवाल है कि हमने 1962 के विवाद से क्या सबक सीखे? यह कहना उचित होगा कि हां, हमने सबक सीखा। इस नजरिये का समर्थन करने के लिए कई उदाहरण हैं। मसलन, 1967 की शुरुआत में चीनियों ने नाथुला और चोला में अपनी बाहें फड़काई।
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Lessons of the war of sixty two: need to understand tricks of China, can border dispute with india be settled
भारत चीन गतिरोध - फोटो : iStock

विस्तार

साठ साल पहले 19 और 20 अक्तूबर, 1962 की रात नेफा (नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी-उत्तर-पूर्व सीमांत प्रदेश) में कमजोर हथियारों से लैस भारतीय जवानों को सघन चीनी हमले का सामना करना पड़ा था, जिसमें उस रात उनकी अग्रिम पंक्ति का सफाया हो गया था। इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह थी कि 4-कोर के अहंकारी जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल बिज्जी कौल, जिन्हें आमतौर पर पंडित नेहरू का आदमी माना जाता था, 'चीनियों को बाहर खदेड़ने' के लिए उन्हें सौंपी गई जिम्मेदारी के लिए एकदम अनुपयुक्त थे। 



कौल नेफा में हुई इस रणनीतिक गफलत के बारे में अपने राजनीतिक आकाओं को बताने के लिए दिल्ली चले गए और फिर वापस नहीं आए, क्योंकि चीनियों ने मैकमहन लाइन के पार भारतीय चौकियों पर हमला तेज कर दिया। दिल्ली में सदमे और भ्रम का माहौल था। पंडित नेहरू और उनके सहयोगियों ने तर्क दिया कि चीन ने भारत की पीठ में छुरा भोंका है। जबकि 1950 के दशक के आखिर में माओ और कम्युनिस्ट नेतृत्व की योजनाओं को लेकर पर्याप्त चेतावनियां मिल रही थीं। 


पहली बात, नेहरू द्वारा चीनी नेतृत्व को खुश करने के प्रयास के रूप में 1954 में पंचशील समझौता किया गया था, जिसके फलस्वरूप भारत ने स्वतंत्र तिब्बत के लिए की जा रही पहल से समर्थन खींच लिया, क्योंकि समझौते में तिब्बत को चीन के क्षेत्र के रूप में मान्यता दी गई थी, लेकिन तिब्बत की पारंपरिक दक्षिणी सीमाओं से परे चीन अक्साई चिन और तवांग की मैकमहन रेखा से आगे अपने दावे से पीछे नहीं हटा। 1959 में लोंगजू में हुई झड़प जैसी घटनाओं को नजरंदाज कर दिया गया। 

दूसरी बात, दिल्ली न तो तिब्बत के पठार में चीन द्वारा सोवियत रूस की मदद से किए जा रहे थल और वायु सेना के जमावड़े और माओ तथा ख्रुश्चेव के बीच हुए समझौते से चेती और न ही तिब्बत में चीनी सैन्य तथा आणविक सुविधाओं से संबंधित भारतीय वायुसेना की तस्वीरों से चेती। रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन ने इसे नजरंदाज करना पसंद किया। तीसरी बात, मार्च, 1959 में दलाई लामा के तिब्बत से भागकर (अमेरिकी मदद से) भारत आने और उनके तथा उनके अनुयायियों के भारत में मिली शरण (पहले उन सबके अमेरिका जाने की उम्मीद थी) से चीनी नेतृत्व नाराज हो गया, क्योंकि पीकिंग (बीजिंग) 1952 में तिब्बत पर चीनी कब्जे के बाद से तिब्बत से जुड़े मुद्दे को अपने आंतरिक मामले की तरह देख रहा था। 

और अंत में, तेजी से आक्रामक होते पंडित नेहरू ने, जिन पर घरेलू दबाव था, एलान कर दिया कि चीन के साथ सीमाओं का निपटारा हो चुका है, चाहे नक्शा हो या न हो, और उन्होंने भारतीय सेना से कहा कि वह भारतीय क्षेत्रों से चीनियों को खदेड़ दे। उन्होंने चीनी प्रधानमंत्री चाउ एन लाई की 1960 की भारत यात्रा और सीमा संबंधी विवाद के निपटारे के उनके प्रस्ताव, जिसमें अक्साई चिन चीन के पास हो और मैकमहन लाइन के दक्षिण का क्षेत्र भारत के पास हो, की परवाह भी नहीं की। 

और जब साउथ ब्लॉक ने कमजोर सैन्य सज्जा से लैस सैन्य जवानों की छोटी टुकड़ियों को हिमालय में विवादित सीमा के पार धकेला, तब कम्युनिस्ट चीन ने अपनी फॉरवर्ड पॉलिसी के तहत भारत पर हमला कर दिया और उस समय दुनिया क्यूबा के मिसाइल संकट में उलझी हुई थी। 1962 में चीनी हमले ने नेफा के मोर्चे पर भारतीय सेना को भारी नुकसान पहुंचाया। पूर्वी लद्दाख में हमारी सेना ने अपेक्षाकृत अच्छा प्रदर्शन किया और अपनी अधिकांश अग्रिम चौकियों को बचाने में सफल रही। 

हमारे सैनिकों ने बहादुरी के कई असाधारण कृत्य किए, जबकि हमारे कई जनरलों ने ही उन्हें मायूस किया, सिवाय लद्दाख में लेफ्टिनेंट जनरल दौलत सिंह और बिक्रम सिंह तथा 33 कोर के उमराव सिंह जैसे अपवादों के। सीओएएस जनरल थापर और पूर्वी कमान के जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल एलपी सेन को, जिन्होंने दिल्ली में सिविलियन के रूप में खुद को अलग कर लिया था और गड़बड़ियां होने दीं, और निश्चित रूप से लेफ्टिनेंट जनरल बिज्जी कौल को, कभी भी माफ नहीं किया जा सकता है। 

न ही नेहरू के उस फैसले को भूला जा सकता है, जिसमें उन्होंने अपने खुफिया प्रमुख बीएन मलिक की सलाह पर भारतीय वायुसेना का इस्तेमाल नहीं करने का फैसला लिया था। जनरल थापर के उत्तराधिकारी जनरल जेएन चौधरी ने युद्ध के बाद नेफा में हुई पराजय को लेकर एक अध्ययन का आदेश दिया, जिसे हैंडरसन-ब्रूक्स रिपोर्ट कहा जाता है। इस रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर जनरलों को जिम्मेदार ठहराया गया, सिविलियन को नहीं, क्योंकि यह उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं था। 

आज सवाल है कि हमने 1962 के विवाद से क्या सबक सीखे? यह कहना उचित होगा कि हां, हमने सबक सीखा। इस नजरिये का समर्थन करने के लिए कई उदाहरण हैं। मसलन, 1967 की शुरुआत में चीनियों ने नाथुला और चोला में अपनी बाहें फड़काई। वहां तैनात जीओसी मेजर जनरल सगत सिंह ने अपने उच्च अधिकारियों को आगाह किया कि वह अपनी बाड़बंदी वाली सीमा से परे किसी भी चीनी घुसपैठ को स्वीकार नहीं करेंगे। और जब चीनी आगे बढ़े तो उन्होंने अपने सैनिकों को चीनियों पर टूट पड़ने की छूट दी, जिसमें उनके 340 जवानों की मौत हुई और संदेश गया कि भारत और बर्दाश्त नहीं करेगा। 

इसके बाद चीनी बीस वर्षों तक चुप रहे और फिर 1987 में सुमदोरोंग चू में फिर घुसपैठ की। तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल सुंदरजी ने त्वरित प्रतिक्रिया में सैनिकों को एयरलिफ्ट किया और उन्हें घेर लिया, जिससे राजीव गांधी सदमे में आ गए। इसके बाद जल्द ही चीनियों ने वापसी की और 1988 में राजीव गांधी की बीजिंग की बहुप्रचारित यात्रा हुई, जिसके बाद द्विपक्षीय राजनयिक पहल की एक शृंखला शुरू हुई। 

और जैसा कि 2020 में चीनी घुसपैठ पर भारत की त्वरित प्रतिक्रिया से पता चला है कि दबाव बनाया गया तो नई दिल्ली पीछे नहीं हटेगी जैसा कि हमारे सैनिकों ने गलवां घाटी में किया था। और इस बार वायु शक्ति के उपयोग से भी इनकार नहीं किया गया। भारत-चीन विवाद का एक समाधान 1959-60 के समझौते में निहित है। चीन और भारत, दोनों जगह आज ताकतवर नेतृत्व है और वे सीमा विवाद का निपटारा कर सकते हैं और राजनीतिक रूप से सफल हो सकते हैं। क्या वे ऐसा करेंगे? (-चर्चित किताब कांटेस्टेड लैंड्सः इंडिया, चाइना ऐंड द बाउंड्री डिस्पुट के लेखक।)

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