{"_id":"1cb239ae-657d-11e2-93f9-d4ae52bc57c2","slug":"legacy-of-his-ideas","type":"story","status":"publish","title_hn":"उनके विचारों की विरासत","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
उनके विचारों की विरासत
शिवपाल सिंह यादव
Updated Wed, 23 Jan 2013 10:21 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कर्पूरी ठाकुर ने महात्मा गांधी, राममनोहर लोहिया और लोकनायक जयप्रकाश नारायण की राजनीति की संत परंपरा को आगे बढ़ाते हुए समाजवादी अवधारणाओं को मूर्त रूप दिया। उनकी सादगी बेमिसाल थी और तर्कशक्ति अद्भुत। 24 जनवरी, 1921 को बिहार के समस्तीपुर जिले के एक गांव पितौंझिया में गोकुल प्रसाद ठाकुर और रामदुलारी देवी के घर जन्मे कर्पूरी जी में जनसेवा की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी।
विज्ञापन
सार्वजनिक जीवन की शुरुआत उन्होंने महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह से की थी। मेधावी छात्र होने के बावजूद पढ़ाई छोड़कर वह स्वतंत्रता संग्राम के कठिन पथ के पथिक बन गए। वह समय ही ऐसा था कि छात्रों के जत्थे के जत्थे स्कूल छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ते थे। वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वह राममनोहर लोहिया के संपर्क में आए और जीवन पर्यंत उनके अनुयायी बने रहे।
विज्ञापन
देश को आजादी मिलने के बाद कर्पूरी ठाकुर ने समाजवाद और संघर्ष का रास्ता अपनाया। सोशलिस्ट पार्टी तथा किसान मजदूर पार्टी के बीच एकता कराने में उनकी बहुत बड़ी भूमिका थी। वह बिहार के नेता प्रतिपक्ष, उपमुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री के अलावा लोकसभा सदस्य और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तक रहे, किंतु उनकी सादगी और सहजता यथावत बनी रही। सत्ता और पद का दिखावा उन्हें कभी छू न सका।
विज्ञापन
मुख्यमंत्री रहते हुए भी वह मोटर साइकिल से ही कार्यक्रमों में भाग लेने पहुंच जाते थे। अपनी बेटी की शादी में उन्होंने सरकारी सेवाओं का लाभ लेने से मना कर दिया और मात्र 12 हजार रुपये में उसकी शादी की। उनकी ईमानदारी पर विरोधी भी कभी उंगली उठाने का साहस नहीं जुटा सके। जिस कुटी में पैदा हुए, उसी में उन्होंने आखिरी सांस ली। सच्चाई यही है कि निजी संपत्ति का मोह उन्हें कभी छू न सका।
आज के दौर में उनका जीवन दर्शन अनुकरणीय है। आपातकाल का उन्होंने भूमिगत रहते हुए विरोध किया। गरीबों तथा पिछड़ों के लिए उनके मन में अपार पीड़ा थी। उन्होंने लोहिया के विशेष अवसर के सिद्धांत को ठोस आकार देते हुए आरक्षण व्यवस्था लागू की और पिछड़ों को मुख्यधारा से जोड़ने में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। उनका मानना था कि समाजवाद ऐसे ही नहीं आ सकता, यह ठोस योजना और तैयारी के आधार पर ही संभव है। वह जैसा सोचते और बोलते, ठीक वैसा ही जीवन जीते थे।
राम मनोहर लोहिया ने एक बार उनकी प्रशंसा करते हुए कहा था, कर्पूरी का कोई सानी नहीं।...उसने समाजवादी दर्शन को सगुण रूप देकर जिस तरह कार्यान्वित किया, वह नजीर है। सर्वोदयी और समाजवादी नीतियों की उन्हें गहरी समझ है। कर्पूरी ठाकुर गांव और शहर तथा अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई को देखते हुए चिंतित रहते थे। वह छोटे और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना चाहते थे।
उनका मानना था कि पश्चिम की अवधारणाएं भारत के लिए उचित नहीं, क्योंकि यहां की सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि पश्चिमी जगत जैसी नहीं है। पश्चिम में उत्पादन भी अधिक है और उपभोक्ता भी। यूरोप और अमेरिका जितनी क्रयशक्ति भारत के पास नहीं है। ऐसे में वहां की नीतियां और सोच भारत के विकास को एकांगी बना देंगी। दुर्योग से उनकी नीतियों पर देश में समुचित ध्यान नहीं दिया गया। उन्होंने देसी भाषा और पूंजी पर आधारित अर्थव्यवस्था की खुली वकालत की, तो जातिगत जड़ता को समाज का नासूर बताया।
कर्पूरी जी जितने संघर्षशील थे, उतने ही मननशील भी। अशोक मेहता की पॉलिटिकल माइंड ऑफ इंडिया और आइडियल ऑफ द ईस्ट तथा राम मनोहर लोहिया की इतिहास चक्र उनकी पसंदीदा पुस्तकें थीं। उन्होंने जिन कार्यक्रमों को बिहार में लागू किया, यदि वे पूरे देश में क्रियान्वित होतीं, तो आज भारत सामाजिक विकास के पैमाने पर इतना पीछे नहीं होता। आडंबर और चकाचौंध में उलझी राजनीति के सामने जब आदर्शों का अभाव होता जा रहा है, तब अनासक्त कर्मयोगी कर्पूरी ठाकुर की स्मृति स्वाभाविक है। उनके विचारों की विरासत हमेशा हमारा मार्गदर्शन करती रहेगी।
(लेखक उत्तर प्रदेश सरकार में लोकनिर्माण और सिंचाई मंत्री हैं)