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वामपंथियों का दोहरापन

Sun, 05 Mar 2017 07:37 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 05 Mar 2017 07:37 PM IST
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Left's double standards
तवलीन सिंह

भारत के राजनीतिक मैदान में ढोंगियों का अभाव नहीं है, पर सबसे बड़ी जमात वामपंथियों की है। जब चीन विदेशी निवेशकों को अपनी अर्थव्यवस्था में निवेश करने के लिए आमंत्रित करता है, तो  हमारे वामपंथी तालियां बजाते हैं। अगर भारत यही चीज करता है, तो यही लोग झूठा प्रचार करते हैं कि हमारे राजनेता देश को बेच रहे हैं।  जब पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की सरकार थी, तब उन्होंने बड़े उद्योगपतियों का स्वागत किया, पर जब तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने निजी निवेशकों का स्वागत किया, तो मार्क्सवादियों ने सबसे ज्यादा हल्ला मचाया। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद कुछ महीने वामपंथी अपने बिलों में छिपे रहे, पर रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद उनको दिखा कि उनकी वापसी का रास्ता देश के विश्वविद्यालयों से निकल सकता है। पिछले वर्ष कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी  को आधार बना जेएनयू में अशांति की गई। मेरी राय में छात्रों को गिरफ्तार करना बेवकूफी है, पर कन्हैया कुमार की मौजूदगी में देश-विरोधी नारे भी नहीं लगाए जाने चाहिए थे।

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कन्हैया कुमार पर देशद्रोह का आरोप बेशक साबित नहीं हो पाया, लेकिन क्या विश्वविद्यालयों में ऐसे नारे लगने चाहिए? क्या उमर खालिद को मेहमान बनाकर रामजस कॉलेज में स्वागत होना चाहिए था? क्या अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) का एतराज ठीक नहीं था? इन सवालों के उठने से पहले ही वामपंथी बाजी मार गए। पिछले सप्ताह जलूस निकाला गया, जिसकी अगुवाई उन्हीं पुराने वामपंथी नेताओं ने की, जिनके चेहरे मेरी उम्र के पत्रकार दशकों से देखते आए हैं। टीवी पर इन लोगों ने लोकतंत्र और शिक्षा संस्थाओं की स्वतंत्रता पर भाषण दिए और किसी ने उनसे यह नहीं पूछा कि उनकी तरफ से इन्हीं चीजों को लेकर चीन की राजनीतिक प्रणाली का विरोध क्यों नहीं होता? वामपंथी लोकतंत्र का इतना ही सम्मान करते हैं, तो चीन के छात्रों के लिए भी बोलने की स्वतंत्रता क्यों नहीं मांगते?
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वामपंथी विचारधारा विश्व भर में इतनी नाकाम रही है कि चीन और रूस जैसे देश अपनी अर्थनीतियां बदल चुके हैं। लेकिन अपने इस भारत महान में हम आज भी गर्व से खुद को समाजवादी कहते हैं। कहने की आजादी सबको होनी चाहिए, लेकिन क्या वामपंथियों से यह पूछने का समय नहीं आ गया है कि इतने वर्षों की समाजवादी नीतियों के बावजूद भारत में आम जनता बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसती क्यों हैं? पश्चिम बंगाल में तीस वर्षों से अधिक समय तक राज करने के बाद भी वहां बुनियादी चीजों का अभाव क्यों है? चीन और रूस के कम्युनिस्ट शासकों ने इतना तो करके दिखाया है कि गरीब से गरीब लोग वहां अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा पा सकते हैं। भारत के वामपंथी तो इतना भी नहीं कर पाए, लेकिन जब छात्रों को गुमराह करने का समय आता है, तो ये लोग सबसे आगे होते हैं।
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यहां यह भी कहना जरूरी है कि एबीवीपी को इनका मुकाबला समझदारी से करना चाहिए, बेवकूफी से नहीं। इसके सदस्यों को किसी पर देशद्रोह का आरोप लगाने का अधिकार नहीं है। देशभक्ति के नाम पर हिंसा गलत है। सोशल मीडिया पर हिंसा की धमकियां  देना भी गलत है। जिन मंत्रियों ने इनका साथ दिया है, उन्होंने गलती की है, क्योंकि ऐसा करके उन्होंने साबित किया है कि शिक्षा संस्थाओं में हस्तक्षेप वे ठीक मानते हैं। इसका परिणाम सबके सामने है : जिन्हें हीरो नहीं बनना चाहिए था, वे  हीरो बन गए हैं और जो देशभक्ति दिखाने निकले थे, वे खलनायक बन गए हैं।

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