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कानून: अब तदर्थ न्यायाधीशों पर दारोमदार... सुप्रीम फैसले से प्रति व्यक्ति न्याय उपलब्धता सुनिश्चित होने की आशा
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विस्तार
न्यायाधीशों की नियुक्ति अक्सर चर्चा में रहती है। कई बार विवादों में या फिर प्रक्रियाओं की व्यावहारिकता को लेकर। 30 जनवरी को उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालयों को अनुमति दी है कि वे सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की तदर्थ नियुक्ति करें, ताकि लंबित मामलों का बोझ कम किया जा सके। तदर्थ न्यायाधीश एक प्रकार से अस्थायी न्यायाधीश होते हैं, लेकिन दोनों में मौलिक अंतर यह है कि तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति विशिष्ट उद्देश्य के लिए होती है, जबकि अस्थायी न्यायाधीश एक निश्चित समय-सीमा के लिए नियुक्त होते हैं।
उच्च न्यायालयों के लिए कई प्रकार के न्यायाधीशों को नियुक्त करने के प्रावधान संविधान में हैं। कारण यह है कि उच्च न्यायालय की विषय वस्तु अधिकारिता उच्चतम न्यायालय से अधिक विस्तृत है और मामलों का बोझ भी उन पर अधिक है। संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 224 में अतिरिक्त और कार्यवाहक न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान किया था। अतिरिक्त न्यायाधीश की नियुक्ति दो वर्षों के लिए तब की जाएगी, जब उच्च न्यायालय पर कार्य का बोझ बढ़ गया हो, जबकि यदि कोई न्यायाधीश अपनी अनुपस्थिति या किसी अन्य कारणवश अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर पा रहा हो, तो अस्थायी रूप से कार्यवाहक न्यायाधीश की नियुक्ति की जाएगी। ये दोनों ही नियुक्तियां राष्ट्रपति द्वारा की जाएंगी।
चूंकि नियुक्ति करने की शक्ति एक कार्यपालिका शक्ति है और राष्ट्रपति भारत का राष्ट्राध्यक्ष होने के नाते कार्यपालिका का प्रधान भी है, अतः उसे न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार दिया गया है। 15वें संविधान संशोधन अधिनियम 1963 से अनुच्छेद 224-ए जोड़ा गया और यह प्रावधान किया गया कि उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को भी जरूरत पड़ने पर नियुक्त किया जा सकेगा। ऐसे न्यायाधीशों को तदर्थ न्यायाधीश कहा जाता है। ध्यातव्य हो कि उच्चतम न्यायालय ने 2021 में लोक प्रहरी बनाम भारत संघ मामले में उच्च न्यायालयों में तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए दिए गए दिशा-निर्देश में कहा कि तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति, तब की जाएगी, जब रिक्तियां स्वीकृत संख्या के 20 फीसदी से अधिक हैं, या एक श्रेणी के मामले पांच साल से अधिक समय से लंबित हैं, या 10 फीसदी से अधिक लंबित मामले पांच वर्ष से अधिक पुराने हैं या निपटान दर नए केस दायर करने की दर से कम है।
हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने 2021 के अपने निर्णय में परिवर्तन करते हुए यह कहा कि प्रत्येक उच्च न्यायालय दो से पांच तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति कर सकता है, जो उसकी स्वीकृत क्षमता के 10 फीसदी से अधिक नहीं होंगे। ऐसे न्यायाधीश आपराधिक अपीलों की सुनवाई कर सकेंगे, जिससे लंबित मामलों की संख्या घटेगी। उच्चतम न्यायालय ने तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए निश्चित समय-सीमा निर्धारित करने को अस्वीकार कर दिया, लेकिन जोर दिया कि प्रक्रिया तुरंत शुरू होनी चाहिए। विचारणीय है कि उच्च न्यायालयों में 60 लाख से अधिक मामले लंबित हैं। 2021 के फैसले से 80 फीसदी कार्य क्षमता की स्थिति ने कई उच्च न्यायालयों में तदर्थ नियुक्तियों को रोक दिया था। उल्लेखनीय है कि कार्यान्वयन की निगरानी के लिए, न्यायालय ने ‘निरंतर परमादेश’ के माध्यम से लोक प्रहरी मामले में कार्यवाही को खुला रखा था। निरंतर परमादेश न्यायालय का वह आदेश है, जिसका उपयोग जांच की निगरानी करने, उचित जांच सुनिश्चित करने और कानून को लागू करने के लिए किया जा सकता है।
न्यायालय के ऐसे निर्णय के बाद कई प्रश्नों का उत्तर देना समीचीन होगा। पहला, क्या तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति से नियमित नियुक्तियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा? यहां विचारणीय है कि नियमित और तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति एक-दूसरे से स्वतंत्र है। अतः ऐसी कोई आशंका नहीं है। दूसरा, यह प्रश्न कि क्या इससे कार्यरत न्यायाधीशों की वरिष्ठता प्रभावित होगी, भी प्रासंगिक प्रतीत नहीं होती। कारण यह कि तदर्थ न्यायाधीश एक विशेष उद्देश्य (आपराधिक अपील की सुनवाई) और एक निश्चित समय-सीमा (लगभग दो से तीन वर्ष) के लिए ही नियुक्त किए जाएंगे। अतः वरिष्ठता के प्रभावित होने की भी कोई आशंका नहीं है।
न्यायालय के इस निर्णय से कई प्रकार के लाभ मिलने की संभावना है। पहला, यह कि उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या में कमी होगी। दूसरा, जेलों में विचाराधीन कैदियों की अधिक संख्या के कारण जेल प्रबंधन पर होने वाले व्यय में कमी। तीसरा, कई अत्यधिक क्षमतावान सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की क्षमता के दोबारा उपयोग में लाए जाने से न्याय तंत्र की कार्यकुशलता में वृद्धि की भी संभावना है। कुल मिलाकर, यह कहना उपयुक्त होगा कि उच्चतम न्यायालय का यह निर्णय न्याय प्रणाली को अधिक व्यवहार्य बनाने और प्रति व्यक्ति न्याय उपलब्धता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण योगदान देगा। -लेखक सेंटर फॉर अप्लायड रिसर्च इन गवर्नेंस, दिल्ली के अध्यक्ष हैं।