फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Language Issue in Indian Politics and Democracy Congress against Hindi Southern India parties

सियासत में भाषा: अस्मिता का सवाल उठाने से नहीं चूकते दक्षिण के क्षेत्रीय दल, विरोध को हवा दे रही कांग्रेस

Fri, 19 Apr 2024 07:36 AM IST
Umesh Chaturvedi उमेश चतुर्वेदी
Updated Fri, 19 Apr 2024 07:36 AM IST
विज्ञापन
सार
जिस कांग्रेस ने कभी हिंदी को प्रमुख भाषा बनाने का अभियान चलाया था, अब वही भाषायी लोकतंत्र के नाम पर इसके विरोध को हवा दे रही है।
loader
Language Issue in Indian Politics and Democracy Congress against Hindi Southern India parties
राहुल गांधी। - फोटो : एएनआई

विस्तार

चुनावी अभियान के बीच आरोप-प्रत्यारोप कोई नई बात नहीं है। जब प्रचार तमिलनाडु जैसे राज्य में हो, तो भाषा अपने आप मुद्दा बन जाती है। चुनावी अभियान ही नहीं, सामान्य दिनों में भी दक्षिण के क्षेत्रीय दल अपनी भाषायी अस्मिता का सवाल उठाने से नहीं चूकते। तमिलनाडु इस मामले में अगुआ रहा है। अक्सर ऐसे अभियानों में केंद्र सरकार और भाजपा जैसी पार्टियां ही निशाने पर रहती हैं। लेकिन भाषायी अस्मिता को चुनावी मुद्दा बनाने में उस कांग्रेस का नाम भी जुड़ गया है, जिसने स्वाधीनता आंदोलन के दौरान हिंदी को देश की प्रमुख भाषा बनाने का अभियान चलाया था। कोयंबटूर की चुनावी सभा में राहुल गांधी ने तमिल लोगों को समझाते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी देश में एक ही भाषा चाहते हैं। यानी प्रधानमंत्री मोदी और उनकी पार्टी तमिल के खिलाफ हैं। इस पर विवाद खड़ा होना स्वाभाविक है। भाजपा ने राहुल गांधी के इस बयान की शिकायत चुनाव आयोग से की है।



वैसे राहुल गांधी कांग्रेस के पहले नेता नहीं हैं, जिन्होंने भाषा को लेकर ऐसा बयान दिया है। केरल के तिरूवनंतपुरम सीट से चुनाव लड़ रहे शशि थरूर भी चुनाव प्रचार में भाजपा पर ऐसे आरोप लगा चुके हैं। हालांकि उनके बयान को उतनी तवज्जो नहीं मिली, क्योंकि केरल में हिंदी को लेकर तमिलनाडु जैसा माहौल नहीं रहा है। तमिलनाडु में तो हिंदी विरोध में पिछली सदी के साठ के दशक के आखिरी दिनों में आंदोलन तक हो चुका है, लेकिन केरल में ऐसा नहीं है। चाहे राहुल हों या शशि थरूर, दोनों के बयानों का एकमात्र मकसद यही है कि वे अपने वोटरों को इस आधार पर अपने समर्थन में खड़ा करें और उनका मत हासिल करें। लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसे विभाजनकारी बयानों की चुनाव में जरूरत है?


भारत की राजभाषा या राष्ट्रभाषा हिंदी हो, इसके खिलाफ पहला सवाल तमिलनाडु से ही उठा। तमिल विरोध के चलते संविधान के प्रावधान में हिंदी को जो हैसियत 26 जनवरी, 1965 को मिलनी चाहिए थी, नहीं मिल पाई। तमिलनाडु में हुए हिंदी विरोधी आंदोलन की वजह से हिंदी देश की आधिकारिक रूप से संपर्क भाषा भी नहीं बन पाई। लेकिन तब से लेकर अब तक कावेरी और कृष्णा नदियों में काफी पानी बह चुका है। राजनीतिक बुनियाद पर भले ही दक्षिणी राज्यों में सीमित हिंदी विरोधी मानसिकता बची हुई हो, लेकिन इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि अब दक्षिणी राज्यों की सोच भी बदल रही है। अगर ऐसा नहीं होता, तो टूटी-फूटी ही सही, दक्षिणी राज्यों में भी हिंदी लिखने-बोलने की कोशिश नहीं होती। हिंदी सिनेमा के गाने दक्षिणी राज्यों में पसंद नहीं किए जाते।

हिंदी की राह में सबसे बड़ी बाधा राजनीति रही है। अपने फायदे-नुकसान को ध्यान में रखते हुए वही स्थानीय लोकभावनाओं को कभी पक्ष, तो कभी विपक्ष में भड़काती है। महात्मा गांधी का सपना था कि आजाद भारत की अपनी भाषा हो, वह केंद्रीय भाषा बने। गुजरातीभाषी होते हुए भी उन्हें हिंदी में ही यह ताकत और संभावना नजर आई। लेकिन स्वाधीन भारत के राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते हिंदी आधिकारिक रूप से केंद्रीय भाषा नहीं बन पाई।

राजनीति ने हिंदी विरोध के लिए अब नया बहाना ढूंढ़ लिया है। बहुभाषिकता और भाषायी लोकतंत्र को बनाए रखने के नाम पर उसका विरोध किया जाता है। दिलचस्प है कि केंद्रीय भाषा के तौर पर विदेशी भाषा तो स्वीकार्य हो सकती है, लेकिन अपनी हिंदी नहीं।

तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी द्रमुक हिंदी की घोषित विरोधी है। जब भी उसे मौका मिलता है, हिंदी विरोध में अपनी आवाज मुखर करने से वह नहीं हिचकती। जब नई शिक्षा नीति लागू हो रही थी, तब भी उसने आरोप लगाया था कि हिंदी को थोपने की कोशिश की जा रही है। द्रमुक इंडिया गठबंधन का प्रमुख हिस्सा है। लेकिन गौर किया जाना चाहिए कि तमिलनाडु में जब प्रधानमंत्री मोदी या अमित शाह या फिर योगी आदित्यनाथ प्रचार में उतरते हैं, तो हिंदी में बोलते हैं। उनके भाषणों का तमिल में अनुवाद होता है। अगर तमिल जनता हिंदी विरोधी होती, तो वह धैर्य से इन नेताओं का भाषण नहीं सुनती। लेकिन कभी ऐसा नहीं लगा कि तमिल लोगों ने इन नेताओं के हिंदी भाषणों में अरुचि दिखाई हो। साफ है कि हिंदी को लेकर दक्षिण का लोकमानस बदल रहा है, अगर नहीं बदल रही है, तो वह है राजनीति।

हालांकि कांग्रेस तर्क दे सकती है कि एक भाषा थोपने की उसके नेताओं की बात के पीछे हिंदी विरोध नहीं है। लेकिन केंद्रीय भाषा के रूप में एक भाषा का मतलब स्वतंत्र भारत में हिंदी ही है। ऐसे बयानों से राजनीतिक फायदा जो भी हो, भाषायी मानस का नुकसान होता है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed