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बाहर से भी लक्ष्मी आए
जयंतीलाल भंडारी
Updated Tue, 06 Nov 2018 07:21 PM IST
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जयंतीलाल भंडारी
इस समय देश के घटते विदेशी मुद्रा भंडार का स्तर बनाए रखने के लिए एक ओर विदेशी मुद्रा की आवक बढ़ाना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर विदेशी मुद्रा के तेजी से बढ़ते हुए व्यय पर नियंत्रण भी जरूरी है। पांच नवंबर, को देश का विदेशी मुद्रा भंडार घटकर करीब 390 अरब डॉलर के स्तर पर आ गया है। जबकि इसी वर्ष 13 अप्रैल को 426 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था।
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पिछले दिनों बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच ने कहा है कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार जिस तेजी से घट रहा है, उससे रुपये को बचाने की भारतीय रिजर्व बैंक की क्षमता कम होती जा रही है। यदि यह भंडार 15-20 अरब डॉलर और कम हो गया, तो भारत के पास सिर्फ आठ महीने के आयात लायक विदेशी मुद्रा ही बचेगी।
वाकई देश के विदेशी मुद्रा परिदृश्य में चिंता बढ़ती जा रही है। एक नवंबर को अमेरिका ने 90 वस्तुओं को कर मुक्त आयात की सूची से हटा दिया है। यानी इन वस्तुओं के आयात पर शुल्क लगेगा। इसमें और वृद्धि हो सकती है। भारत में इनमें से करीब 50 वस्तुओं का निर्यात अमेरिका को करता है।
चूंकि भारत से अमेरिका को पिछले वर्ष 2017-18 में 47.8 अरब डॉलर का निर्यात किया गया था और भारत की निर्यात सूची में अमेरिका पहले क्रम पर है, इसलिए इस कदम से केंद्र सरकार के चालू वित्त वर्ष के 340 अरब डॉलर के निर्यात के लक्ष्य पर प्रश्नचिह्न लग गए हैं।
वैश्विक निर्यात मांग कम होने से पिछले वर्ष देश से कुल 303 अरब डॉलर मूल्य की वस्तुओं का निर्यात किया गया था। जबकि उससे एक वर्ष पूर्व 2016-17 में निर्यात का मूल्य 274 अरब डॉलर रहा। निर्यात के ये आंकड़े संतोषजनक नहीं हैं। अब देश के सामने वैश्विक व्यापार युद्ध से प्रभावित होने की नई चुनौतियां भी खड़ी हैं, इससे भी निर्यात के प्रभावित होने की आशंका है।
देश से निर्यात नहीं बढ़ने के कई और भी कारण हैं। विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) से संबंधित जो नए आंकड़े प्रस्तुत हुए हैं, उनके अनुसार सेज रोजगार सृजन, निवेश और निर्यात के ऊंचे लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफल नहीं हुआ है।
जहां विभिन्न कारणों से देश विदेशी मुद्रा की पर्याप्त आवक प्राप्त नहीं कर पा रहा है, वहीं वर्ष 2018 में जनवरी से अक्तूबर तक अमेरिका में ब्याज दर बढ़ने और डॉलर की लगातार मजबूती के मद्देनजर विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से 11 अरब डॉलर निकाल चुके हैं। महज अक्तूबर, 2018 में विदेशी निवेशकों ने भारतीय पूंजी बाजार से 38,900 करोड़ रुपये निकाले हैं।
इसमें दो मत नहीं कि देश के विदेशी मुद्रा भंडार का स्तर बनाए रखने के लिए सरकार रणनीतिक रूप से आगे बढ़ रही है और हाल ही में भारत-जापान वार्षिक बैठक के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे की मौजूदगी में मुद्रा अदला-बदली का समझौता हुआ है।
यह समझौता दोनों देशों को अपनी स्थानीय मुद्राओं में कारोबार करने की अनुमति देता है। इस प्रक्रिया में अमेरिकी डॉलर जैसी तीसरी मुद्रा की भूमिका नहीं होगी। केंद्र सरकार ने विदेशी पूंजी का प्रवाह बाहर की ओर रोकने के लिए एक और कदम उठाया है। उसने आयात घटाने की रणनीति के तहत स्मार्टवॉच, मोबाइल फोन के पार्ट्स और टेलीकॉम इंडस्ट्री में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों पर आयात शुल्क बढ़ाया है। विदेशी मुद्रा भंडार का स्तर बनाए रखने और रुपये को मजबूत बनाने के लिए जहां गैर जरूरी आयात को नियंत्रित किया जाना जरूरी है, वहीं निर्यात बढ़ाना भी जरूरी है।