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कुंभ पर्व, दान और महाराजा हर्ष

Mon, 14 Jan 2013 12:25 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Mon, 14 Jan 2013 12:25 PM IST
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Kumbh festival donations emperor harsha

धर्मग्रंथों और नीतिशास्त्रों में दान के महत्व को बताते हुए कहा गया है कि जरूरतमंद को दान देकर आसानी से पुण्य कमाया जा सकता है। ऐसा करने से इहलोक के साथ-साथ परलोक भी सुधर जाता है।

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इसी से जुड़ी एक कहानी महाराजा हर्ष की है। प्रयाग में महाकुंभ के दिन थे। गंगा-यमुना के संगम के सामने मैदान में महाराजा हर्ष अपने शिविर में विराजमान थे। अनेक राज्यों के राजा-महाराजा उस दिन धर्मसभा में उपस्थित थे। मुख्य अतिथि के सिंहासन पर चीन के धर्मदूत ह्वेनसांग विराजमान थे।
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ह्वेनसांग ने महाराजा हर्ष की प्रशस्ति प्रस्तुत करते हुए कहा, महाराज हर्ष ने पांच वर्ष से संचित धन कुंभ-पर्व पर दान कर दानशीलता का आदर्श उपस्थित किया है। इनके जैसा दानवीर पृथ्वी पर कोई नहीं है। अचानक एक याचक धर्म सभा में खड़ा हो गया। वह बोला, महाराज, भले ही आपने अपनी तमाम संपत्ति दान कर दी, परंतु मैं तो अभी तक वंचित ही हूं।
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विप्रवर, अभी तो मेरे पास स्वर्ण मुकुट बचा है। इसे स्वीकार कीजिए। यह कहते-कहते महाराजा हर्ष ने अपना मुकुट याचक ब्राह्मण के हाथों में रख दिया।

महाराजा हर्ष ने अपने मंत्री से कहा, प्रयाग के पावन संगम तट पर हमें सब कुछ दान कर खाली हाथ लौटना है। किसी वस्तु को ममता-वश साथ नहीं ले चलना है। उपस्थित सभी नरेश महाराजा हर्ष की इस अनूठी दानशीलता को देखकर नतमस्तक हो उठे।

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