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जानना जरूरी है: संस्कृति के पन्नों से कैसे मिला ‘पृथ्वी’ को अपना नाम

Sun, 14 Apr 2024 05:23 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 14 Apr 2024 05:23 AM IST
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सार
ऋषियों ने पृथु को बताया कि प्रकृति का यही नियम है कि राजा न हो तो भूमि में कुछ नहीं उगता। इसीलिए संसार की यह दशा हो रही है। यह सुनकर पृथु ने अस्त्र-शस्त्र उठाया और भूलोक खोदने को तत्पर हो गया।
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Knowing culture's pages reveals how the earth got its name
पृथ्वी (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला/एएनआई

विस्तार

ध्रुव के वंशज राजा अंग का पूरी धरती पर शासन था। वह बहुत धार्मिक और वेदों के ज्ञाता थे। परंतु उनका पुत्र वेन अत्यंत उद्दंड था। उसका धर्म, नैतिकता और वैदिक संस्कारों पर तनिक भी विश्वास नहीं था। वह बड़ा हुआ, तो अत्याचारी हो गया। ऋषि-मुनियों ने उसे बहुत समझाया, लेकिन वेन के व्यवहार में सुधार नहीं हुआ, बल्कि उसकी उद्दंडता बढ़ती गई। आखिरकार, ऋषियों ने निर्णय लिया कि वेन का जीवित रहना समाज के लिए घातक होगा, इसलिए उन्होंने अपने तपोबल से वेन को मार डाला।



वेन की मृत्यु से धरती अनाचार से मुक्त तो हो गई, किंतु उसका कोई शासक नहीं रहा। वेन निस्संतान था, इसलिए ऋषियों ने वेन के शव को मथकर संतान उत्पन्न करने का निश्चय किया। ऋषियों ने वेन की दाहिनी जांघ को मथा, तो एक अत्यंत कुरूप प्राणी प्रकट हुआ। उससे निषाद वंश की उत्पत्ति हुई। फिर ऋषियों ने वेन की दाहिनी भुजा को मथा, तो एक तेजस्वी बालक उत्पन्न हुआ। उसका नाम पृथु रखा गया। 


पृथु बड़ा हुआ, तो अत्यंत बलशाली और ओजवान बन गया। उसने अश्वमेध यज्ञ भी पूर्ण कर लिया। परंतु उसका राज्याभिषेक नहीं हो पाया था। एक दिन पृथु को पता लगा कि पृथ्वी ने भोजन देना बंद कर दिया, जिससे समस्त प्राणी-जगत पर संकट के बादल मंडराने लगे।

ऋषियों ने पृथु को बताया कि प्रकृति का यही नियम है कि राजा न हो, तो भूमि में कुछ नहीं उगता। इसीलिए संसार की यह दशा हो रही है। भूलोक ने सबकुछ भीतर छिपा रखा है। यह सुनकर पृथु ने अपना अस्त्र-शस्त्र उठाया और भूलोक को खोदकर उसके भीतर से भोजन निकालने को तत्पर हो गया। भूलोक ने पृथु का क्रोध देखा, तो भयभीत होकर गाय का रूप धारण करके भागना शुरू कर दिया। परंतु पृथु ने गाय रूपी भूलोक का पीछा नहीं छोड़ा। वह निरंतर गाय को मारने की धमकी देता रहा।

आखिर में गाय ने पृथु से कहा, ‘मैं तुम्हारी मां के समान हूं। मुझे मार दोगे, तो मानव जाति का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। इसलिए सबकी रक्षा करना तुम्हारा कर्तव्य है।’

पृथु ने कहा, ‘आपका कर्तव्य संसार का पोषण करना है। आपकी तरह सब कर्तव्य त्याग देंगे तो ब्रह्मांड का क्या होगा? यदि आप संसार की रक्षा नही करेंगी, तो मैं भी आपकी रक्षा नहीं करूंगा।’

इस पर गाय बोली, ‘प्रकृति का नियम है कि राजा न हो, तो मैं भोजन नहीं दे सकती। वेन की मृत्यु के बाद कोई राजा नहीं बना, इसलिए मैंने भोजन देना छोड़ दिया। यदि आप राजा बन जाएंगे, तो मैं फिर से भोजन देने लगूंगी।’ 

यह सुनकर पृथु ने कहा, ‘भोजन के लिए प्रजा का राजा पर निर्भर होना सही बात नहीं है। इसलिए इसका विकल्प खोजना होगा।’

पृथु ने इस समस्या पर गहन सोच-विचार किया और वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ऐसी परिस्थिति भविष्य में दोबारा भी उत्पन्न हो सकती है, इसलिए लोगों को आत्मनिर्भर बनाना होगा। अभी तक धरती स्वत: भोजन देती थी, परंतु पृथु को महसूस हुआ कि मनुष्य को धरती के गर्भ से स्वयं भोजन प्राप्त करना सीखना होगा। इसका लाभ यह था कि भूलोक द्वारा प्रदान किए जाने वाले अन्नादि के अतिरिक्त मनुष्य अपने पुरुषार्थ से भी पृथ्वी से भोजन पैदा कर सकेगा, ताकि भोजन का कभी अभाव न हो।

इस विचार से पृथु को बड़ा संतोष हुआ और उसने तुरंत इस दिशा में कार्य आरंभ कर दिया। कहते हैं, पृथु ने अपने धनुष की नोंक से समस्त धरती को समतल कर दिया और भूमि के समतल होने से सर्वत्र मैदान तैयार होने लगे। इसके बाद पृथु ने खेत-खलिहान बना दिए और यहां से कृषि का आरंभ हुआ। मनुष्य जाति, जो अब तक पशु-पालन और आखेट से काम चलाती थी, अब कृषक की भूमिका में आ गई थी। कृषि का आरंभ हुआ, तो सर्वत्र अन्न और धान की फसलें लहलहाने लगीं।

इस तरह, महाराज पृथु ने अपने श्रम और संकल्प से धरती का स्वरूप बदल दिया। पृथु के इसी योगदान के चलते उनके नाम पर धरती को नाम मिला-पृथ्वी।

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