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हजरत साहब की अनूठी दरियादिली

Wed, 10 Jul 2013 10:34 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Wed, 10 Jul 2013 10:34 PM IST
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kindness of hazrat

हजरत अबू बकर मदीना के खलीफा थे। वह पता लगाया करते थे कि कोई आदमी भूखे पेट तो नहीं सोता है। किसी व्यक्ति को अभाव का जीवन तो नहीं बिताना पड़ रहा है। पता लगते ही वह चुपचाप अभावग्रस्त की मदद करने के लिए पहुंच जाते। वह अपने वजीर से कहा करते थे कि जरूरतमंद की सहायता करना इंसान का फर्ज है। इससे बड़ा कोई धर्म नहीं।

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एक बार हजरत साहब को पता चला कि एक झोंपड़ी में निस्संतान मियां-बीवी रहते थे, लेकिन पति के मर जाने के बाद वृद्धा के सामने रोटी तक की समस्या पैदा हो गई है, क्योंकि उसके पास आमदनी का कोई साधन नहीं है। खलीफा सुबह उसकी झोंपड़ी में पहुंचे। झोंपड़ी में झाड़ू लगाकर उन्होंने सफाई की, वृद्धा के खाने के लिए खजूर और अन्य सामान रखा, फिर चुपचाप लौट आए। वृद्धा सोकर उठी। उसने झोंपड़ी में रखा सामान देखा, तो सोचा कि कोई दरियादिल आदमी उसकी बेबसी पर दया करके सामान रख गया होगा। हजरत रोज सुबह चुपचाप जरूरत का सामान लेकर जाते, झोंपड़ी की सफाई करते और वापस लौट आते।
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एक दिन महिला ने सोचा कि इस दरियादिल इंसान को देखना चाहिए। सुबह जैसे ही उसे किसी के आने की आहट सुनाई दी कि वह झोंपड़ी के दरवाजे पर पहुंची। उसने दीया जलाया और रोशनी में देखा कि उसकी सेवा करने वाले स्वयं खलीफा हैं। उन्हें देखकर उसकी आंखों में खुशी के आंसू आ गए।

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