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छोटे पड़ोसियों का भी रखें ध्यान

पुष्पेश पंत Updated Wed, 13 Feb 2013 12:13 AM IST
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इस वर्ष गणतंत्र दिवस पर भूटान के युवा नरेश सपत्नीक हमारे शाही मेहमान थे। मोहक व्यक्तित्व तथा जनतांत्रिक रुझान के कारण वह अनायास आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं। भूटान के साथ भारत के रिश्ते बेहद आत्मीय हैं और चीन के साथ दशकों से चले आ रहे सीमा विवाद के संदर्भ में अत्यंत संवेदनशील भी। हाल के वर्षों में भूटान एक और कारण से भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चर्चित रहा है। सकल राष्ट्रीय उत्पाद की अवधारणा को चुनौती देते हुए इस नन्हे हिमालयी राष्ट्र ने सकल राष्ट्रीय सुख-संतोष के विकल्प का प्रतिपादन किया है।
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बहरहाल, यह सब बातें विषयांतर हैं। इस बात को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि भूटान नरेश को बहुत बौखलाहट में आमंत्रित कर हमारे विदेश मंत्रालय ने खुद को उस अपमानजनक स्थिति से उबारने का प्रयास किया था, जो मालदीव के राष्ट्रपति के ऐन मौके पर इस रस्म अदायगी वाली मेहमाननवाजी को नकारने से पैदा हो गई थी। यह याद दिलाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि मालदीव के साथ हमारे रिश्तों में तनाव और खटास पिछले वर्ष से निरंतर बढ़ते नजर आते रहे हैं।


भारतीय राजदूत की जिन शब्दों में आलोचना वहां के राष्ट्रपति के विश्वासपात्र सहयोगी ने की, वह राजनयिक शिष्टाचार के प्रतिकूल हिंद महासागर को भड़काने वाले ही थे। भारत सरकार की लाचारी जो भी रही हो, उसे खून का घूंट पीकर चुप रहना पड़ा। जिस हवाई अड्डे के निर्माण के ठेके को एक भारतीय कंपनी को सौंपे जाने से यह विवाद शुरू हुआ था, वह बरकरार है। सिंगापुर में पंचाट के फैसले ने भारत का सिरदर्द बढ़ाया है।

वैसे सच यह है कि मालदीव में इस्लामी कट्टरपंथ का ज्वार निरंतर चढ़ता जा रहा है और मात्र यह कहकर, कि यह उसका आंतरिक मामला है, हम निश्चिंत नहीं बैठे रह सकते। इन सूक्ष्म द्वीप बिंदुओं की भू-राजनीतिक स्थिति ऐसी है कि हमारे शत्रु यहां अपने पैर जमाकर हमारे लिए बड़ा सामरिक जोखिम पैदा कर सकते हैं। हिंद महासागर में सक्रिय तस्कर ही नहीं, पेशेवर या जेहादी दहशतगर्दों के वहां एकत्र होने के समाचार चिंताजनक हैं। हमारी केंद्र सरकार गठबंधन धर्म के निर्वाह में श्रीलंका के साथ संबंधों को पहले ही तमिलनाडु के द्रविड़ राजनीतिक दलों के पास बंधक रख चुकी है।
 
उधर भूटान के बारे में विदेश मंत्रालय की लापरवाही का जिक्र जरूरी है। कुछ वर्ष पहले तक भूटान के राजनयिक संबंध भारत तक सीमित थे। फिर भारत के प्रोत्साहन से वह संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बना एवं अन्य मित्र राष्ट्रों के साथ उसने दूतों का आदान-प्रदान किया।

आज भी अनेक वरिष्ठ भारतीय राजनयिक तथा सेनानायक यह बात आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते कि भूटान अब संप्रभु राष्ट्र के रूप में अपनी स्वाधीनता का अबाध उपभोग तथा प्रदर्शन करने की अभिलाषा मुखर कर रहा है। वह जमाना गया, जब वैदेशिक मामलों में पड़ोसी भारत की राय ही उसकी विदेश नीति को निर्धारित करती थी। नेपाल हो या चीन, भूटान राष्ट्रहित में फैसले लेना चाहता है। भारत के इन देशों के साथ उभयपक्षीय तनाव का वह अनावश्यक बोझ नहीं ढोना चाहता।

भूटान के विकास में भारत का योगदान बहुत बड़ा रहा है। चूका, पुनाका जैसी हजारों मेगावाट पनबिजली पैदा करनी वाली परियोजनाओं का सूत्रपात भारत ने किया है। सड़क-पुल निर्माण में उसका योगदान कम महत्वपूर्ण नहीं। भारी संख्या में भारतीय सेना की मौजूदगी भूटान की उत्तरी सरहद को चीनी अतिक्रमण से निरापद रखने में सार्थक तैनाती के रूप में देखी जा सकती है। इसके साथ ही यह जोड़ने की जरूरत है कि यह सब भारत ने परोपकार के लिए नहीं, निजहित साधन के लिए किया है।

पूर्वोत्तर राज्यों में अलगाववादी उपद्रव, गोरखालैंड के नाम पर जनभावना का हिंसक विस्फोट, बांग्लादेश से असम, त्रिपुरा में नाजायज शरणार्थियों की घुसपैठ पर अंकुश लगाने के लिए भूटान का सहयोग भारत के लिए एक संवेदनशील मुद्दा है। अब तक इस सामरिक सहकार में भूटान ने रत्ती भर कसर नहीं छोड़ी है। पर इस घड़ी लगने लगा है कि यह स्थिति निकट भविष्य में बदल सकती है।

इधर यह समाचार पढ़ने को मिले हैं कि भूटान चीन के साथ अपने सीमा विवाद को निपटाने की दहलीज तक पहुंच चुका है। निश्चय ही भारत इस समाधान का स्वागत करेगा, पर साथ ही हमें इस बारे में भी सतर्क रहना होगा कि क्या नया सीमा निरूपण चीन को दक्षिण की ओर प्रसार का अवसर देकर हमारी सुरक्षा के लिए किसी तरह की चुनौती को जन्म दे सकता है?

भूटान नरेश की यात्रा संपन्न होने के तत्काल बाद उस देश के प्रधानमंत्री का भारत दौरा इस बात का संकेत है कि इस महत्वपूर्ण रिश्ते की नजाकत समझते हुए इस पर केंद्रित विचार-विमर्श हो रहा है। भारत इस समय अभूतपूर्व वित्तीय संकट के दौर से गुजर रहा है, जिसको देखते हुए सरकार के हर विभाग के खर्च में 20 प्रतिशत कटौती का ऐलान किया जा चुका है।
भूटान की चिंता यह है कि इसका बुरा असर उसको मिलने वाली सहायता पर पड़ सकता है। यह जानकारी गोपनीय नहीं कि भारत की गुप्तचर सेवा ‘रॉ’ तथा रक्षा मंत्रालय इस विषय में अपनी यह राय प्रकट कर चुके हैं कि ऐसा करना हमारे राष्ट्रहित के लिए घातक साबित हो सकता है।

हमारी समझ में असली समस्या भूटान तक सीमित नहीं। अपने को उदीयमान शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करने को उतावली यह सरकार आस-पड़ोस में ही अपने हितों की रक्षा में असमर्थ दिखाई दे रही है। नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश और मालदीव को भी अपवाद नहीं कहा जा सकता।

पड़ोसी पाकिस्तान के साथ परस्पर विश्वास बंधाने वाले इकतरफा रियायती प्रयासों या चीन के साथ सुलह की लोलुपता के कारण भी इन पड़ोसियों की अवहेलना हुई है। इतना ही नहीं, अमेरिका की अफगानिस्तान से वापसी के बाद वहां भी अपनी स्थिति खराब ही होगी, सुधरेगी नहीं।

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