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विकास और सुशासन की जगह करिश्मा

Sun, 04 May 2014 06:29 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 04 May 2014 06:29 PM IST
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Karishma inspite of development and governance

कहां से कहां आ गया है यह चुनाव। कहां सुशासन और विकास की बातें, जो चुनाव की शुरुआत से सुनने को मिली थीं और कहां आज प्रियंका के करिश्मे की बातों पर हम आ गए हैं। बुजुर्ग राजनीतिक विश्लेषक भी बातें करते हैं कुछ इस तरह-कांग्रेस ने प्रियंका को देश भर में भेजा होता प्रचार करने, तो नरेंद्र मोदी की तथाकथित लहर बनती ही नहीं।

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मैंने यहां तक सुना है मेरे पत्रकार बंधुओं से कि प्रियंका ने ऐसे डटकर जवाब दिया है मोदी को कि 'मोदी अब थोड़ा पीछे हट गए हैं।' मैं जब इनसे पूछती हूं कि इस धारणा का आधार क्या है, तो उनका जवाब होता है कि मोदी ने प्रियंका के आरोपों का कोई उत्तर नहीं दिया। ये आरोप क्या हैं? पहला यह कि आप मेरे भैया को कभी नमूना कहते हैं, कभी शहजादा, और ऐसी बातों से आपका बचपना झलकता है। प्रधानमंत्री बनने की आस रखते हैं, तो ऐसी बातें आपको शोभा नहीं देतीं।
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मेरी राय में मोदी ने जवाब न देकर ठीक किया है, क्योंकि प्रियंका सक्रिय राजनीति में नहीं हैं। पर मैं यह भी मानती हूं कि प्रियंका ने चुनाव के मुद्दे बदल दिए हैं। विकास और सुशासन से हटकर अब फिर वही पुराने मुद्दे की हम चर्चा कर रहे हैं-करिश्मा। भारत अगर आज भी गरीब देशों में गिना जाता है, तो इसका मुख्य कारण यह है कि दशकों तक हमारे अर्धशिक्षित मतदाता गांधी परिवार के करिश्मे को वोट देते आए हैं। यह पहला चुनाव है, जहां असली मुद्दों को देखकर वोट पड़ेगा, क्योंकि इस बार काफी तादाद में मतदाता नौजवान और शिक्षित हैं।
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दिल्ली से पहले मैं बनारस में थी, जिस दिन मोदी आए अपना नामांकन भरने। उस दिन लोगों का जोश बहुत था। मैंने कई नौजवानों से पूछा कि उनको मोदी पसंद क्यों हैं। बार-बार एक ही जवाब मिला-हम परिवर्तन और विकास चाहते हैं और हम जानते हैं कि मोदी ऐसा करेंगे। एक ताकतवर प्रधानमंत्री की चाह भी पाई मैंने, सो ऐसा लगा कि भाजपा आराम से 230 सीटें अपने बूते हासिल कर सकेगी।

फिर मैं दिल्ली आई, राजनीतिक पंडितों से मिली, जो प्रियंका के करिश्मे से इतना प्रभावित थे कि सबने कहा कि चुनाव की हवा बदल गई है। अब भाजपा की सीटें 180 से ज्यादा नहीं आएंगी और 16 मई के बाद ऐसी सरकार बनेगी, जो कांग्रेस के समर्थन पर निर्भर करेगी। यह बात सलमान खुर्शीद ने खुलेआम पी चिदंबरम साहिब को कही इस शहर की एक महफिल में। इंडियन एक्सप्रेस के संपादक शेखर गुप्ता की नई किताब के शाया होने के अवसर पर था यह जश्न, जिसमें वित्त मंत्री ने स्वीकार किया कि 2010-11 में यूपीए सरकार ने कुछ ऐसी गलतियां कीं, जिनसे अर्थव्यवस्था में मंदी छा गई और इसी का खामियाजा भुगतना पड़ा है कांग्रेस को। इस पर विदेश मंत्री साहिब, जो हम श्रोताओं के बीच बैठे थे, उठे और ऊंची आवाज में कहा, ऐसा न कहिए। मुझे यकीन है कि अगला बजट आप ही पेश करेंगे...हम कहीं नहीं जा रहे।


माना जाता है कि कांग्रेस में यह नया उत्साह सिर्फ इसलिए दिख रहा है, क्योंकि श्रीमती वाड्रा ने सामना किया है मोदी का। मेरे दोस्त यहां तक कहते हैं कि उस गुजराती चायवाले को जैसे का तैसे जवाब दिया इंदिरा की पोती ने। दिल्ली के अखबारों में बड़े-बड़े लेख छपे हैं इन बातों को लेकर पिछले दिनों, जिन्हें देखकर मुझे याद आई शरद यादव की वह बात, जो उन्होंने लोकसभा में कही थी-भारत को संपन्नता का सपना दिखाने की कोशिश की, लेकिन शायद यह सपना गांधी परिवार के करिश्मे से टकराकर चूर-चूर हो जाए। ऐसा अगर होता है, तो इस देश के गरीब मतदाता कभी गरीबी की बेड़ियां तोड़ नहीं पाएंगे और भारत गिना जाता रहेगा दुनिया के गरीब देशों में। दुआ कीजिए कि इस बार दिल्ली के राजनीतिक पंडित गलत साबित हों।

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