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दावोस में करणी सेना

Sun, 28 Jan 2018 07:05 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 28 Jan 2018 07:05 PM IST
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Karani sena in Davos
तवलीन सिंह

इसके बारे में क्या बताऊं कि मुझे कितना बुरा लगा दावोस में उन चित्रों को देखकर, जिसमें करणी सेना के तथाकथित योद्धाओं ने गुड़गांव में एक स्कूल बस पर हमला बोला। सच पूछिए, तो बच्चों की चीखें सुन नहीं पाई। मैं अगर भारत में होती, तो भी इस शर्मनाक घटना की निंदा करने के लिए शब्द नहीं होते, लेकिन यहां दावोस में इसलिए और भी बुरा लगा, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यहां से लौटे दो दिन ही हुए थे। यहां उनका ऐसा सम्मान हुआ, जैसे कि बहुत बड़े, बहुत महत्वपूर्ण देश के प्रधानमंत्री का सम्मान होना चाहिए। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के वार्षिक सम्मेलन में नरेंद्र मोदी को सबसे पहले बोलने का मौका दिया गया था, बावजूद इसके कि यहां दुनिया के तकरीबन सभी बड़े प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति आए हुए थे।


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हम भारतीयों को यह बात भी बहुत अच्छी लगी कि मोदी ने हिंदी में बोलकर देश की लाज रखी। यहां ऐसा सभी बड़े राजनेता करते हैं, लेकिन हमारे राजनेताओं को उनके अफसरों ने गलत नसीहत दे रखी है कि दुनिया के सभी बड़े राजनेता आजकल अंग्रेजी में बोलते हैं, सो कई जगह मोदी ने भी अंग्रेजी में बोलना शुरू कर दिया है। दावोस में मोदी न सिर्फ हिंदी में बोले, बल्कि अपने भाषण में बार-बार उन्होंने याद दिलाया कि भारतीय परंपरा सदियों से शांति की रही है। वसुधैव कुटुंबकम एक ऐसा विचार है, जो इन दरारों से बंटे दौर में और भी अहमियत रखता है। उनका भाषण जब समाप्त हुआ, तो कई विदेशी लोगों ने कहा कि उनको बहुत अच्छा लगा। सिर्फ इसलिए नहीं कि उन्होंने ऊंचे स्तर की बातें कीं, बल्कि इसलिए भी कि दुनिया चाहती है कि भारत शीघ्र एक सफल, विकसित और संपन्न देश बन जाए, क्योंकि भारत में लोकतंत्र है। चीन आर्थिक स्तर पर भारत से कहीं आगे निकल चुका है, सो पिछले वर्ष जब शी जिनपिंग दावोस आए, तो उनका भी काफी सम्मान हुआ था। लेकिन समानित करने वाले नहीं भूले कि आज भी चीन में लोकतंत्र नहीं है। सो भारत के प्रधानमंत्री का दावोस में ज्यादा सम्मान होना स्वाभाविक था।

इसी वातवरण में जब स्कूल बस पर हमले की खबर मिली, तो ऐसा लगा कि करणी सेना और उनके उन मुख्यमंत्रियों ने प्रधानमंत्री का निजी तौर पर अपमान किया, जिनकी जिम्मेदारी है कानून व्यवस्था बहाल रखने की। भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री क्या सोच रहे थे, जब उन्होंने करणी सेना को हिंसा फैलाने की इजाजत दी थी? शुरू में ही उन्हें सावधान क्यों नहीं कर दिया गया कि अपनी बात रखने की पूरी आजादी है, मगर हिंसा फैलाने की नहीं। कानून-व्यवस्था तब बिगड़ती है, जब राजनेता हिंसा में अपना राजनीतिक लाभ देखते हैं। सो या तो भाजपा के मुख्यमंत्री चाहते हैं कि करणी सेना की हिंसक हरकतें बढ़ती रहें या वे इतने निष्क्रिय हैं कि अपनी बुनियादी जिम्मेदारी (आम नागरिकों की सुरक्षा) नहीं निभा पाते। बात चाहे जो भी हो, वे सबसे ज्यादा नुकसान प्रधानमंत्री मोदी को पहुंचा रहे हैं। पहले भी ऐसा होता रहा है, लेकिन इस बार उनके मुख्यमंत्रियों ने उनका नुकसान तब किया, जब वह एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारत को आधुनिक एवं निवेश के आकर्षक गंतव्य के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे थे। वह कह रहे थे कि हम बाहें खोलकर निवेशकों का स्वागत करते हैं, लेकिन हम अपनी पुरानी संस्कृति और सिद्धांतों को आज के दौर में भी काम में ला सकते हैं।

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