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जानना जरूरी है: कणिक ने कथा द्वारा समझाई कूटनीति, शत्रु को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए

Sun, 17 Nov 2024 05:56 AM IST
आशुतोष गर्ग न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: आशुतोष गर्ग Updated Sun, 17 Nov 2024 05:56 AM IST
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सार
छोटा-सा कांटा भी बहुत दिनों तक रह जाए, तो मवाद बना देता है। इसलिए शत्रु को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए। साम, दाम, दंड, भेद आदि किसी भी उपाय से अपने शत्रु को नष्ट कर देना ही राजनीति का मूल मंत्र है।
 
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Kanik explained diplomacy through a story, the enemy should never be considered weak
संस्कृत के पन्ने - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पांडवों का यश देखकर धृतराष्ट्र की चिंता बढ़ने लगी, तो उन्होंने अपने मंत्री और राजनीति विशारद कणिक को बुलवाया और कहा, ‘कणिक! पांडवों का यश बढ़ता जा रहा है। मुझे बताओ कि मुझे पांडवों के साथ संधि करनी चाहिए अथवा विग्रह?’ कणिक बोला, ‘महाराज! छोटे-से कांटे की नोक भी बहुत दिनों तक रह जाए, तो मवाद बना देती है। इसलिए शत्रु को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए। साम, दाम, दंड, भेद आदि किसी भी उपाय से अपने शत्रु को नष्ट कर देना ही राजनीति का मूल-मंत्र है।’


धृतराष्ट्र ने कहा, ‘कणिक, यह बताओ कि साम, दाम, दंड, भेद द्वारा शत्रु का नाश कैसे किया जाता है?’ तब कणिक ने धृतराष्ट्र को एक कथा सुनाई-किसी वन में एक बुद्धिमान गीदड़ रहता था। उसके चार मित्र बाघ, चूहा, भेड़िया और नेवला भी वहीं रहते थे। एक दिन उन्हें एक हट्टा-कट्टा हिरण दिखा, तो उन्होंने उसे मारने की योजना बनाई। गीदड़ बोला, ‘यह हिरण जब सोएगा तो चूहा उसका पैर कुतर ले, फिर बाघ उसे मार डाले और तब हम सब मिलकर इसे खाएं।’ योजना के अनुसार, उन्होंने हिरण को मार दिया। फिर गीदड़ ने अपने दोस्तों से कहा, ‘तुम स्नान करके आओ, तब तक मैं हिरण की देखभाल करता हूं।’ सब स्नान करने चले गए।


बाघ लौटा, तो उसने गीदड़ को चिंतित देखकर पूछा, ‘मित्र! तुम किस दुविधा में हो?’ गीदड़ बोला, ‘बाघ! चूहे ने मुझसे कहा कि हिरण को तो मैंने मारा और बाघ मेरी कमाई खाना चाहता है। चूहे का यह घमंड सुनकर इस हिरण को खाने की मेरी इच्छा नहीं है।’ बाघ बोला, ‘यदि ऐसा है, तो मैं अपने दम पर पशुओं को मारकर खाऊंगा।’ यह कहकर बाघ चला गया। तभी चूहा वहां आया। गीदड़ ने चूहे से कहा, ‘नेवला कह रहा था कि बाघ के काटने से हिरण का मांस विषैला हो गया है। इसलिए मैं इसे नहीं खाऊंगा। इसलिए मैं चूहे को मारकर खाऊंगा।’

चूहा डरकर बिल में घुस गया। फिर भेड़िया पहुंचा, तो गीदड़ बोला, ‘भेड़िया भाई! बाघ बहुत गुस्से में है। वह बाघिन के साथ यहां आने वाला है। तुम्हें जो ठीक लगे, करो।’ यह सुनकर भेड़िया भी भाग निकला। फिर नेवला वहां आया, तो गीदड़ ने नेवले से कहा, ‘मैंने बाघ, भेड़िये और चूहे को तो मारकर भगा दिया। यदि तुझे घमंड है, तो तू भी मुझसे लड़ ले।’ नेवला बोला, ‘जब वे सब तुमसे हार गए, तो मैं कैसे जीतूंगा।’ यह कहकर नेवला भी चला गया। सबको भगाकर गीदड़, अकेला ही हिरण का मांस खा गया।

यह कथा सुनाकर कणिक ने धृतराष्ट्र से कहा, राजन! चतुर राजा को भी चाहिए कि गीदड़ की तरह डरपोक को भयभीत कर दे, शूरवीर के आगे हाथ जोड़ ले। लोभी को प्रलोभन देकर और कमजोर को पराक्रम से वश में कर ले। कणिक ने कहा, शत्रु चाहे कोई भी हो, उसे मार डालना चाहिए। प्रण लेकर और धन का लोभ देकर विष या धोखे से भी शत्रु को समाप्त कर देना चाहिए। मारने की इच्छा रखते हुए भी मीठा बोलो, लेकिन मारकर अफसोस व्यक्त करो। जिन पर शंका नहीं होती, उन्हीं पर अधिक शंका करनी चाहिए, जो विश्वासपात्र नहीं हैं, उन पर कोई विश्वास नहीं करता, लेकिन जो विश्वासपात्र हैं, उन पर भी पूर्ण विश्वास नहीं करना चाहिए। सर्वत्र पाखंडी, तपस्वी आदि के वेष में गुप्तचर रखने चाहिए।

बगीचे, टहलने के स्थान, मंदिर, सड़क, तीर्थ, चौराहे, कुएं, पहाड़, जंगल और सभी भीड़भाड़ वाले स्थानों पर गुप्तचरों की अदला-बदली करते रहना चाहिए। वाणी का विनय और हृदय की कठोरता, भयंकर काम करते हुए भी मुस्कराकर बोलना-यह नीति-निपुणता का सूचक है। जो अपने शत्रु से संधि करके निश्चिंत हो जाता है, उसका होश तब ठिकाने लगता है, जब सर्वनाश हो जाता है। अपनी बातें केवल शत्रु से ही नहीं, मित्र से भी छिपानी चाहिए। अत: राजन! आपको पांडु पुत्रों से अपनी रक्षा करनी चाहिए। वे दुर्योधन आदि से बलवान हैं। आप कोई ऐसा उपाय कीजिए कि उनसे भय न रहे और बाद में पश्चाताप भी न करना पड़े। यह कहकर कणिक अपने घर चला गया।
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