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वो तमाम चीजें जो हम भूल नहीं पाते!
कैलाश वाजपेयी
Updated Sat, 14 Sep 2013 08:22 PM IST
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यहूदी जाति स्वयं को ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना मानती है। यहूदियों की दो ही विशेषताएं हैं। एक, उनका पुस्तक प्रेम और दूसरी विशेषता है धन के प्रति उनका पागलपन की हद तक चढ़ा जुनून।
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पिछले वर्षों में हमारे मित्र जिनकी बेटी ने एक यहूदी से शादी की है, बताया कि हम गुजराती लोग जिस तरह से मिट्टी को सोना बनाने की विधि जानते हैं, मेरा यहूदी पति उससे भी एक कदम आगे है। जहां तक यहूदियों में पाई जाने वाली बौद्धिकता का प्रश्न है, यह एक माना हुआ तथ्य है कि पिछली दो शताब्दियों से ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में यहूदी ही छाए हुए हैं। चाहे वह आइंस्टाइन हों, चाहे फ्रायड या फिर बाबा कार्ल मार्क्स। मगर इसके अतिरिक्त भी कई नाम हैं, जिन्हें साधारण नहीं कहा जा सकता।
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चाहे वह दार्शनिक मार्टिन हाइडेगर हो या सुप्रसिद्ध भाषाविद् नॉमचॉमस्की। चाहे वह हेनरी किसिंगर हों या कार्ल पॉपर। स्वयं द ट्रायल और कॉसल जैसे थरथरी पैदा करने वाले उपन्यासों के रचियता काफ्का हों या फिर लेखन की दुनिया में अभी सन 1983 में मरा आर्थर कोएस्लर। जिसका झुकाव तत्व ज्ञान और रहस्य में अधिक था, जिसकी शायद पहली पुस्तक 'डार्कनेस एट नून' जब छपी थी तो बरसों उसे कोसा गया था।
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यही स्थिति उसकी साम्यवाद के विरोध में लिखी गई पुस्तक 'योगी एंड द कमीसार' जैसी विवादास्पद कृति के साथ भी जुड़ी है। आर्थर कोएस्लर का मानना है कि इजरायल को दुनिया की कोई ताकत मिटा नहीं सकती।
कोएस्लर अपनी सनकी विचार श्रृंखला के लिए प्रसिद्ध है। यह शायद कोएस्लर का मत था कि ईशावास्य का यह गणित कि पूर्ण में से पूर्ण जोड़ देने या घटा देने के बाद भी जो बचता है वह भी पूर्ण होता है, यह वदतोत्याघांत अर्थात कांट्रेडिक्शन इन टर्म्स का नमूना है। निहायत अनर्गल तर्क। कोएस्लर में एक दुचित्तापन था। वह जहां एक ओर प्रखर बौद्धिकता के लिए मशहूर था, वहीं दूसरी ओर अपनी यौनसाहसिकता के लिए भी।
मगर उसी के साथ यह भी एक विचित्र संयोग है कि यहूदी होते हुए भी वह मानता था कि जन्म कई होते हैं और ईश्वर ने मनुष्य को धक्के देकर पृथ्वी पर भेजा ही इसलिए है कि वह काम देवता का अनुयायी होकर मात्र नारी सौंदर्य पर न्योछावर होकर एक भंवरे की तरह हर कली को अनुग्रहित करे। परामनोविज्ञान उसकी सबसे बड़ी कमजोरी थी। एडिनबरा में इसके नाम पर रिसर्च सेंटर भी बना हुआ है।
हमारी मुलाकात कोएस्लर से एक ऐसी विदुषी के घर हुई, जो बड़े-बड़े लेखक-कवियों के निजी संपर्क में रहती थी। पेरिस में मैंडेलीन में उसका एक अपना अपार्टमेंट था। वह हमें वरसाई के एक कहवाघर में यों ही मिल गईं थी। उसे जब यह पता चला कि हम कवि किस्म के आदमी हैं और पेरिस के विक्टोरिया पलास होटल में फ्रांसीसी सरकार के मेहमान हैं तो मिशेल नाम की यह नवयुवती हमारा हाथ हाथों में लेकर बोली, 'मैं मिलवाऊंगी तुम्हें ज्यां पॉलसार्त्र से, यजीन आयनेस्को से और राब्वग्रिए से।' दूसरी सुबह उसका फोन आया। पूछा, खाली हो? हमने कहा बस लूव्र जाने का मन था। बोली, 'छोड़ो मैं आ रही हूं तुम्हें लेने मैंने अपने यहां कोएस्लर को बुलाया है, ना मत करना। यह भर बता दो, मांसाहारी हो या शाकाहारी।'
हम भारत के पोंगे पंडित हमने दबी जुबान से कहा, 'हैं तो शाकाहारी।' वह तत्काल बोली, 'मुझे बकव्हीट (एक तरह का परांठा) बनाना आता है। मैं खुद बनाऊंगी और मार्सेई की बढ़िया वाइन दूंगी। सब करुंगी, तुम मुझे अच्छे लगे।' यह कहकर उसने फोन बंद कर दिया। ठीक आधा घंटे बाद मिशेल आई और हमें ले गई। उसका आवास दूर नहीं था। कोएस्लर की आंखें हल्की नीली थी। आयु में वह हमसे बीस-बाइस वर्ष बड़ा तो रहा ही होगा। मगर उसकी वेशभूषा और देहयष्टि सदाबहार नायकों जैसी थी।
कोएस्लर ने कहा, "मैंने तुम्हारे देश के अद्वैत और बौद्ध दर्शन पढ़े हैं। दोनों एक-दूसरे के विपरीत होकर भी अच्छे लगे। मगर तुम्हारे यहां यह पलायन का रूख इतना ज्यादा क्यों हैं। वहां घर छोड़कर सभी जंगल में क्यों चले जाते हैं।" हमने कहा, ''एकांत की तलाश में ताकि सत्य की झलक मिल जाए। " कोएस्लर ने कहा, "यह तो ठीक है। मगर सबके सब ब्रह्मचर्य की महिमा का बखान क्यों करते हैं। यह तो कुछ ऐसा है कि कोई भोजन तो करे मगर वॉशरूम जाने से इंकार करे।" हमने तब तीर्थंकर महावीर के हवाले से जिन सूत्रों के बारे में बताया और कहा, "ब्रह्मचर्य दरअसल ऊर्जा के रूपांतरण की कला है।" कोएस्लर कुछ देर चुप रह कर फिर बोला, "पश्चिम का गहन मनोविज्ञान तो कहता है कि स्त्रियों में विपरीत के प्रति आकर्षण स्वाभाविक है।" इसके बाद कोएस्लर ने बताया कि सार्त्र उसका अच्छा दोस्त था।
कोएस्लर के साथ ढेर सारे विषयों में बातें करते हुए पता नहीं किस संदर्भ में हमने कह दिया कि हमारे यहां जैन धर्म की रचनाएं इतनी सूक्ष्म और वैज्ञानिक हैं कि किसी भी बौद्धिक को उनकी जानकारी अवश्य होनी चाहिए। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए हमने संथारा या कि इच्छामृत्यु का भी जिक्र किया। हमारी बात सुनकर कोएस्लर उछल पड़ा। उसने कहा कि वह उमास्वाति को जरूर पढ़ेगा, जो दर्शन संल्लेखना या संथारा की आज्ञा देता है वह निश्चय ही महान होगा। इसी कोएस्लर ने आगे के वर्षों में नींद की ढेर सारी गोलियां खाकर आत्महत्या कर ली।