कानून की कसौटी पर किशोर अपराध

सुधांशु रंजन Updated Fri, 25 Jan 2013 12:20 AM IST
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juvenile delinquency on law test

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राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना के बाद किशोर न्याय अधिनियम को बदलने की मांग तेज हुई है। हालांकि इस घटना के बाद गठित जस्टिस जे एस वर्मा कमेटी ने किशोर अपराधियों की उम्र 18 से घटाने की मांग खारिज की है और कहा है कि ऐसा करना बाल अधिकार संधि के विरुद्ध होगा।
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हाल की घटनाएं एवं आंकडे़ बतलाते हैं कि किशोरों द्वारा किए जाने वाले अपराधों में लगातार वृद्धि हो रही है। ये डकैती, हत्या तथा बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों को अंजाम दे रहे हैं और इनमें से अधिकतर की उम्र 16 से 18 वर्ष के बीच होती है। इस कारण ये आसानी से बच निकलते हैं। अभी हाल में हरदोई में बाल सुधार गृह में कैद लगभग 60 किशोरों ने वहां तैनात सिपाहियों की बंदूकें छीन लीं और हवा में गोलियां चलाईं।


इसके अलावा किशोर अपराधी फर्जी जन्म प्रमाणपत्र देकर बचने में सफल हो रहे हैं। दिल्ली पुलिस ने अभी एक अपराधी के मामले में निचली अदालत द्वारा दिए गए निर्णय के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील की है। उस पर फिरौती से लेकर हत्या तक के आरोप हैं, किंतु वह जाली जन्म प्रमाणपत्र देकर बच निकला। उसे किशोर न्याय कानून के तहत मामूली सजा हुई।

एक और सवाल उठा है कि जब जन्म की तारीख का प्रमाणपत्र दिया गया है, तो मेडिकल जांच की जरूरत क्यों महसूस की गई। इस कानून के तहत 2007 में जो मॉडल नियमावली बनाई गई, उसके नियम 12 के अंतर्गत जन्म का यदि कोई प्रमाणपत्र हो, तो उसे मेडिकल जांच के बनिस्बत प्राथमिकता दी जाएगी।

सर्वोच्च न्यायालय ने हरिराम मामले में इसे सही माना। नवंबर, 1985 में संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में किशोर न्याय के लिए मानक न्यूनतम नियम का अनुमोदन किया गया, जिसे बीजिंग रूल्ज भी कहते हैं। इसे भारत सरकार ने भी स्वीकार किया। इसलिए 1986 में किशोर न्याय कानून बनाया गया, जिसमें 16 वर्ष कम उम्र के लड़के एवं 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों को किशोर माना गया। यह भारतीय दंड विधान की धारा 361 पर आधारित था कि लड़कियों को लंबे समय तक सुरक्षा की जरूरत है।

इसमें यह भी प्रावधान किया गया कि किशोर की गिरफ्तारी की प्रक्रिया अलग होगी तथा उनका मुकदमा सामान्य अदालत की  जगह किशोर न्याय बोर्ड में चलेगा। 1989 में बच्चों के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र का अधिवेशन हुआ, जिसमें किशोर की परिभाषा में लड़का एवं लड़की, दोनों के लिए उम्र 18 वर्ष कर दी गई। इसे भी भारत सरकार ने 1992 में स्वीकार किया।

वर्ष 2000 में 1986 के अधिनियम की जगह एक नया किशोर न्याय कानून बनाया गया। इसका औचित्य किशोर की परिभाषा में लिंग भेद को खत्म कर एक उम्र करना बताया गया। फिर 2006 में इसमें संशोधन किया गया तथा 2007 में मॉडल नियम बनाए गए, जिससे एक किशोर न्याय कानून ठोस आकार ग्रहण कर पाया।

समाज का एक बड़ा वर्ग किशोर न्याय कानून में संशोधन की मांग कर रहा है, ताकि किशोर की परिभाषा में उम्र 18 से कम हो और ऐसे नृशंस अपराधियों को फांसी जैसी सख्त सजा मिले। असल में दिल्ली सामूहिक बलात्कार मामले में उस प्रतिभाशाली युवती के साथ सर्वाधिक बर्बरता करने वाला अपराधी किशोर बताया गया है और इसी वजह से उसे अधिकतम सजा महज तीन वर्ष की हो सकती है।

ऐसे भीषण अपराधी के कुछ महीने में छूट जाने की आशंका से पूरा समाज उद्वेलित है और कानून में बदलाव की मांग कर रहा है, ताकि आगे कोई किशोर अपराधी मासूमियत का हवाला देकर बच न निकले। इसके विपरीत बाल अधिकार कार्यकर्ता एवं कुछ अन्य लोग किशोर न्याय कानून में किसी बदलाव का विरोध कर रहे हैं कि एक घटना के आधार पर इतना बड़ा संशोधन नहीं किया जाना चाहिए। यह तर्क सही नहीं है कि यह अकेला उदाहरण है, जब किसी किशोर ने ऐसा जघन्य अपराध किया हो। हाल के वर्षों में किशोर अपराधियों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है। इसलिए कानून पर पुनर्विचार की सख्त जरूरत है।

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