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ठंडे बस्ते में जाती एक रिपोर्ट
शिवदान सिंह
Updated Sat, 09 Feb 2013 12:46 AM IST
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जस्टिस वर्मा आयोग की रिपोर्ट ने देश को उसके अंदर फैली अव्यवस्था की जीती-जागती तस्वीर दिखाई है। आयोग की रिपोर्ट में प्रजातंत्र के जरूरी हिस्से पुलिस, जनप्रतिनिधि कानून, न्यायिक व्यवस्था, सैन्य विशेषाधिकार कानून-सबमें सुधार की वकालत की गई है। पहली बार किसी आयोग ने इतने व्यापक सुधारों की बात की।
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इस रिपोर्ट के लिए देश का युवा वर्ग व मध्यवर्ग भी बधाई का पात्र है, क्योंकि दिल्ली गैंगरेप केस और उससे पहले अन्ना हजारे व बाबा रामदेव के जनांदोलनों में भी इस वर्ग ने सरकारों को बता दिया कि बहुत हो चुका अमर्यादित व्यवहार, भ्रष्टाचार और कुशासन। अब कृपा कर हमारी आवाज सुनिए। शासन को जहां संवेदनशील होना चाहिए, वहीं पुलिस को केवल शासकों के लठैत के रूप में कार्य नहीं करना चाहिए। इसके लिए ऐसे जनप्रतिनिधि चुने जाएं, जो देश के बहुमत का प्रतिनिधित्व करते हों।
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गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर राष्ट्रपति ने भी देश की ज्वलंत समस्याओं की तरफ ध्यान देने की अपील की। उन्होंने चुने हुए प्रतिनिधियों से कहा कि उन्हें जनता का विश्वास जीतते हुए सुशासन सुनिश्चित करना होगा। राष्ट्रपति की यह सलाह भी इशारा करती है कि इस समय हमारी विधायिका के गठन में सुधार की आवश्यकता है। विधायिका ही किसी प्रजातंत्र का हृदय होता है। लेकिन जब हृदय ही ठीक काम नहीं करेगा, तो शरीर के बाकी हिस्सों का क्या होगा।
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लोकतंत्र का दूसरा जरूरी अंग पुलिस व न्याय व्यवस्था है। इस समय देश में 1861 का पुलिस ऐक्ट काम कर रहा है, जो अंग्रेजी सरकार का लागू किया हुआ है, जिसकी मूल भावना शासक के हित साधने की है। इस कानून के तहत पुलिस किसी भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन को गैरकानूनी घोषित करते हुए बल प्रयोग कर सकती है।
आपातकाल के बाद पहली बार रिवेरो कमेटी का गठन पुलिस सुधारों के लिए हुआ था, जिसमें पुलिस को कर्तव्यों के अनुसार सक्षम, पेशेवर और अनुशासित करने की बात कही गई थी, लेकिन जनता पार्टी की सरकार गिरने के बाद यह रिपोर्ट ठंडे बस्ते में चली गई। वर्ष 2006 में पूर्व पुलिस अधिकारी प्रकाश सिंह ने जनहित याचिका के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय से इस रिपोर्ट को लागू करने की प्रार्थना की। न्यायालय ने 2007 तक इसे लागू करने का शपथ पत्र राज्य सरकारों से मांगा, पर ज्यादातर सरकारों ने न इसे लागू किया, न ही शपथ पत्र दाखिल किया। न्यायिक व्यवस्था और कानूनों में सुधार के लिए गठित वी एस मलिमथ कमेटी की रिपोर्ट भी इसी तरह धूल चाट रही है।
प्रजातंत्र की तीसरी व जरूरी व्यवस्था है विधायिका का गठन। चुनाव सुधारों पर देश में बार-बार आवाज उठती रहती है। लेकिन हमारे राजनीतिक दल नहीं चाहते कि देश में चुनाव सुधार लागू किए जाएं। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के बारे में भी कोई प्रतिबद्धता नहीं दिखाई देती। अभी तक न लोकपाल बना, न सीबीआई केंद्र सरकार के कब्जे से मुक्त हुई और न विदेशी बैंकों में जमा धन देश में आया। धन आना तो दूर, अभी तक देश के सामने वे नाम तक नहीं उजागर हुए, जिन्होंने देश का धन इन बैंकों तक पहुंचाया है।
जस्टिस वर्मा कमेटी ने सुरक्षा बलों पर भी वाजिब टिप्पणी की है। इसके अनुसार, ड्यूटी पर तैनाती के समय यदि कोई जवान या अन्य पदाधिकारी महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में लिप्त पाया जाता है, तो इसकी जिम्मेदारी उसके कमान अधिकारी पर होगी। हमारे सेना कानून ने एक कमान अधिकारी को सार्वभौम शक्तियां दे रखी हैं। इतनी शक्ति तथा अधिकार के होते हुए भी यदि वह अधिकारी अपने मातहतों को इस प्रकार के अपराधों से नहीं रोक सकता, तब कहीं न कहीं कमान अधिकारी की ही गलती माननी चाहिए।
त्रासदी यह है कि हमारी सरकार इस कमेटी की रिपोर्ट को गंभीरता से लागू करने के मूड में नहीं है। आनन-फानन में अध्यादेश लाने के बाद सरकार ने यह सफाई जरूर दी है कि कमेटी की रिपोर्टों पर विचार किया जाएगा, लेकिन साथ ही उसके महत्वपूर्ण सुझावों को लागू न करने की मजबूरी बताकर उसने अपनी मंशा ही जताई है कि वह परिदृश्य बदलना नहीं चाहती, क्योंकि इसके लिए उसे खुद भी बदलना होगा।