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अन्याय है देर से मिला न्याय
पत्रलेखा चटर्जी
Updated Wed, 10 Sep 2014 11:54 PM IST
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इस बात से हर कोई सहमत है कि कानून के शासन और न्याय तक सबकी समान पहुंच बनाए रखने के लिए बहुत जरूरी है कि अदालतों में चल रहे मामलों का समय से निपटारा हो। यह व्यक्ति का मौलिक अधिकार भी है। हालांकि इससे भी सब भलीभांति वाकिफ हैं कि भारत की वर्तमान न्यायिक व्यवस्था ऐसा कर पाने में असमर्थ साबित हो रही है, और इसकी वजह है, अदालतों में भारी तादाद में लंबित पड़े मामले।
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गौरतलब है कि मई, 2014 तक सर्वोच्च न्यायालय में लंबित पड़े मुकदमों (सिविल और आपराधिक) की संख्या 63,843 थी, जबकि 2011 में ऐसे मामलों की तादाद 58,519 थी। इस मामले में देश के उच्च न्यायालयों की हालत भी अच्छी नहीं कही जा सकती। उच्च न्यायालयों में लंबित मुकदमों की संख्या 2011 के 43 लाख से बढ़कर दिसंबर, 2013 में 44 लाख तक पहुंच गई। इनमें से दस लाख मुकदमे तो इलाहाबाद उच्च न्यायालय में ही लंबित हैं। वहीं जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में 2013 में ऐसे मामलों की संख्या दो करोड़ थी। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के न्यायालयों में लंबित मामलों की तादाद सबसे ज्यादा है। इन हालात में उत्तर प्रदेश सरकार की राज्य के हर जिले में फास्ट ट्रैक कोर्ट (त्वरित अदालतें) के गठन की हालिया घोषणा को किस तरह से देखा जाना चाहिए? सवाल यह भी है कि क्या इस घोषणा से कुछ उम्मीदें लगाई जा सकती हैं?
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गौरतलब है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन का विचार कोई अनूठा नहीं है। 2001 से देश में इनका अस्तित्व है। न्यायपालिका पर हर तरह के मुकदमों को निपटाने के बोझ को हल्का करना ही इनके गठन का उद्देश्य था। तब से देश भर में 1,700 से ज्यादा फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित किए जा चुके हैं। हालांकि इनमें से कइयों का अस्तित्व 2011 में समाप्त हो गया, जब केंद्र सरकार ने इनको पैसा आवंटित करना बंद कर दिया। केंद्र सरकार का कहना था कि ऐसी अदालतों को चलाना काफी महंगा सौदा होता है। फिलहाल चल रही फास्ट ट्रैक अदालतें फंड के लिए राज्य सरकारों का मुंह ताकने को मजबूर हैं। 2012 में दिल्ली में 23 वर्षीय युवती के साथ हुए बर्बर गैंगरेप (निर्भया कांड) और फिर हुई उसकी मौत से लोगों में उपजे रोष के बाद दिल्ली सरकार ने छह फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन किया।
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था। मगर सवाल फिर भी कायम है कि क्या फास्ट ट्रैक अदालतें वाकई असरदार हैं। इस मामले में उत्तर प्रदेश का अनुभव अच्छा नहीं रहा है। महिलाओं के खिलाफ हिंसक अपराधों से जुड़े मुकदमों की पैरवी कर रहे तमाम वकील कहते हैं कि मुकदमों को जल्दी निपटाने का दबाव इतना बढ़ जाता है कि न तो ठीक ढंग से सुबूतों का परीक्षण हो पाता है, और न ही हर मुकदमे पर अपेक्षित ध्यान दिया जा पाता है। लखनऊ स्थित एक संगठन एसोसिएशन फॉर एडवोकेसी ऐंड लीगल इनीशिएटिव (एएएलआई) से जुड़ी एक वकील रेनू मिश्रा बताती हैं कि कई बार इन अदालतों को मुकदमों को जल्दी निपटाने के मद्देनजर अव्यवहारिक लक्ष्य दे दिए जाते है, जिसकी वजह से मामले की जटिलताओं पर ध्यान देने का वक्त ही नहीं होता। दूसरे तमाम वकीलों का भी मानना है कि फास्ट ट्रैक अदालतों में चल रहे मुकदमों में ऐसे मामलों की तादाद ज्यादा है, जो अपील के बाद उच्च न्यायालय को सौंपे जाते हैं।
दरअसल चाहे उत्तर प्रदेश हो, या देश में कोई और जगह, मूल समस्या जजों की कमी की है। उदाहरण के तौर पर, उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों में जितने जज होने चाहिए, उनकी संख्या उससे क्रमशः 32 और 21 प्रतिशत कम हैं। विधि आयोग की हालिया रिपोर्ट की मानें, तो एक ओर जजों की कमी और दूसरी ओर लंबित मुकदमों की लगातार बढ़ती संख्या की वजह से न्यायिक तंत्र न तो नए मुकदमों को तेजी से निपटा पा रहा है और न ही लंबित पड़े मुकदमे को। इससे समस्या दिन पर दिन और गहराने लगती है, जिसकी वजह से समयबद्ध ढंग से न्याय तक पहुंच की सांविधानिक गारंटी और कानून के शासन की अवधारणा भी कमजोर होती है। खासकर निचली अदालतों में कम वेतन और खस्ताहाल बुनियादी ढांचे से न्याय क्षेत्र की बेहतरीन मेधाएं हतोत्साहित होने लगती हैं।
विधि आयोग की रिपोर्ट कहती है, 'न्याय में होने वाली देरी को कम करने के लिए जजों की संख्या बढ़ाने के अलावा दूसरे उपाय भी करने होंगे। इसके लिए न्यायिक प्रबंधन से जुड़े बेहतर तौर-तरीकों को लागू करने पर जोर देना होगा।' रिपोर्ट के मुताबिक ,जब तक जजों और वादियों को यह निश्चित पता नहीं होगा कि उनका मुकदमा कितने समय में निपटेगा, तब तक किसी भी तरह की जिम्मेदारी तय करना खासा मुश्किल साबित होगा। इसके अलावा रिपोर्ट में अलग-अलग तरह के मुकदमों को निपटाने के लिए तार्किक आधार पर ऐच्छिक समय-सीमा तय करने की जरूरत की भी बात की गई है। और इस समय सीमा के आधार पर ही जजों की कार्यक्षमता निर्धारित हो सकेगी। इसके अलावा इससे न्यायपालिका के लिए नीतिगत निर्देश तैयार करना भी आसान हो सकेगा।
(विकास संबंधी मुद्दों पर लिखने वाली वरिष्ठ स्तंभकार)