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स्वच्छ भारत का सफर: पांच वर्ष पहले और अब

Sat, 05 Oct 2019 02:43 AM IST
नीरजा चौधरी नीरजा चौधरी
नीरजा चौधरी Published by: नीरजा चौधरी Updated Sat, 05 Oct 2019 02:43 AM IST
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Journey of Swachchh Bharat
शौचालय - फोटो : a

पांच वर्ष पहले जब नरेंद्र मोदी ने अपने पहले स्वतंत्रता दिवस संबोधन में लड़कियों के लिए शौचालय बनाने की बात कही, तो उन्होंने बहुतों को सुकून पहुंचाया था। शौचालय राजनीतिक दृष्टि से कोई रोमांचक विषय नहीं था, और न ही ऐसा कोई भावनात्मक मुद्दा, जो अधिकांश भारतीयों को वोट देने के लिए प्रभावित करे। किसी भी रूप में शौचालय का निर्माण नगर निगम और ग्राम पंचायतों का काम होना चाहिए, न कि प्रधानमंत्री का।


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लेकिन मोदी ने एक ऐसी समस्या को छुआ, जिसके समाधान को लंबे समय तक टाला गया था। शौचालयों के अभाव में महिलाएं सुबह होने से पहले या देर रात समूहों में खेतों में जाती हैं, इससे उनका स्वास्थ्य, कल्याण और सुरक्षा प्रभावित होती है। और अब महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर दो अक्तूबर को प्रधानमंत्री ने गुजरात के साबरमती तट पर भारत को खुले में शौच से मुक्त घोषित किया। हालांकि यह आयोजन उतना भव्य नहीं था, जितना कि कुछ महीने पहले इसकी परिकल्पना की गई थी। पर जो सबसे महत्वपूर्ण बात थी, वह यह कि मोदी ने बुनियादी ढांचे के निर्माण के साथ-साथ 'व्यवहार में बदलाव' की जरूरत पर जोर दिया। और अब हम जानते हैं कि कैसे शौचालयों का निर्माण हुआ है, बहुत से लोग उसमें अनाज रखते हैं, या जानवरों को बांधते हैं या परिवार के लिए अतिरिक्त जगह के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

बीती सदी के अस्सी के दशक के मध्य से ही भारत में स्वच्छता की नीति रही है और यह पहली बार नहीं है कि जल, स्वास्थ्य और स्वच्छता को हरी झंडी दिखाई गई है। निर्मल भारत अभियान यूपीए का एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम था। हालांकि दो कारक नरेंद्र मोदी को अपने पूर्ववर्तियों से अलग करते हैं। पहला, उन्होंने प्रधानमंत्री की राजनीतिक पूंजी को स्वच्छ भारत के पीछे लगाया। अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा दांव पर लगाई। इसके अलावा सरकार द्वारा शुरू किए गए सबसे बड़े व्यवहार परिवर्तन कार्यक्रम से कई लोगों ने भारी ऊर्जा प्राप्त की। और दूसरा, मोदी की व्यक्तिगत छवि, पैमाना और स्वभाव, जो पिछले हफ्ते ह्यूस्टन में 'हाउडी मोदी' कार्यक्रम में भी दिखा। थोड़ी हैरानी की बात है कि कई लोग उन्हें भारतीय राजनीति का राजकपूर मानते हैं।

संदेश की पैकेजिंग और भव्य प्रदर्शन उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना संदेश। जाहिर है, यह धारणा बदलने में मदद करता है। और फिर कहानी का अंतिम परिणाम, चाहे वह कश्मीर हो या स्वच्छ भारत, कई अन्य कारकों पर निर्भर करता है और अक्सर गड़बड़ियां विस्तृत विवरण में छिपी होती हैं। मसलन, हाउडी मोदी कार्यक्रम के बावजूद पेट्रोनेट-टेल्यूरियन सौदा हो या भारत-अमेरिकी व्यापार का मुद्दा, इनमें गतिरोध है।  अगर आप ट्रेन से यात्रा करते हैं, तो आप अब भी रेलवे ट्रैक के दोनों ओर लोगों को खुले में शौच करते देखते हैं, इसलिए यह मानना मुश्किल लग रहा है कि भारत पूरी तरह से खुले में शौच से मुक्त हो गया है। स्वच्छता, साफ-सफाई और पेयजल का अभाव डायरिया, अन्य बीमारियों, बाल मृत्यु और बच्चों में कुपोषण के लिए जिम्मेदार हैं। लोग अब भी खुले में शौच करने जाते हैं, चाहे उनके पास सब्सिडी वाला नया या पुराना शौचालय हो या नहीं।

फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले पांच वर्षों में भारी संख्या में शौचालयों का निर्माण हुआ है। सरकार का दावा है कि उसने 11 करोड़ शौचालय बनवाए हैं और दस में से नौ लोग उसका इस्तेमाल करते हैं। वर्ष 2021 की जनगणना शायद हमें सटीक आंकड़े बताएगी। वैश्विक समुदाय ने मोदी द्वारा किए गए कार्यों को स्वीकारा, जब उन्हें पिछले हफ्ते बिल ऐंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन का ग्लोबल गोलकीपर अवार्ड दिया गया। जब आप वर्ष 2013 में मौजूद बेसलाइन से इसकी तुलना करते हैं, तो विशेषज्ञ सौ फीसदी खुले में शौच से मुक्ति की बात कहते हैं, और इसमें उन क्षेत्रों को छोड़ दिया जा सकता है, जो नदी के किनारे, समुद्र तटवर्ती या जल जमाव वाले क्षेत्र हों। सरकार ने निस्संदेह नौकरशाही को समय पर डैशबोर्ड जैसे नवीन तकनीक का इस्तेमाल करते हुए निरंतर सूचनाओं को अपलोड करने और निगरानी करने के लिए प्रेरित किया। लेकिन सबसे बड़ी समस्या शौचालयों को साफ रखने की है, जो लोगों को इसका इस्तेमाल करने के लिए राजी करने हेतु महत्वपूर्ण है। कई क्षेत्रों में इस समस्या को दूर नहीं किया जाता। पानी की उपलब्धता न होना एक बड़ी बाधा है।

इसके अलावा, कई युवा कहते हैं कि अगर हम शौचालय का उपयोग करेंगे, तो नपुंसक बन जाएंगे। जुड़वां गड्ढे वाले शौचालयों में जब कुछ वर्ष बाद मल खाद में परिवर्तित हो जाता है, जिसे अब 'सोना खाद' कहा जाता है, तो इसे बाहर निकालने और खेतों में उपयोग करने को लेकर समस्या पैदा होती है। कुछ जातियों द्वारा हाथ से मैला ढोने की सदियों पुरानी कुप्रथा को देखते हुए यहीं पर समस्या आती है और कई लोग ऐसा कार्य नहीं करना चाहते। इसलिए 'स्वच्छ भारत' का मतलब सिर्फ शौचालय बनाना, हाथ धोना, शौच से पहले चप्पल पहनना, नालियों को ढंकना व साफ-सुथरा रखना और शौचालय को साफ रखना भर नहीं है, बल्कि हमें दलितों के खिलाफ पुराने पूर्वाग्रह और वास्तव में लैंगिक पक्षपात से भी उबरना है।

सरकार को इन नई समस्याओं को दूर करने के लिए सोशल ऑडिट की अनुमति देने में संकोच नहीं करना चाहिए। विशेष रूप से पानी के प्रावधान और संरक्षण के लिए दस वर्षीय योजना स्वच्छ भारत मिशन-2 शुरू करना चाहिए और इसमें जलशक्ति को भी शामिल करना चाहिए। स्वच्छ भारत मिशन-दो को पोषण अभियान से भी जोड़ा जाना चाहिए, जिसका उद्देश्य बाल कुपोषण से मुकाबला करना है। इसके लिए आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के पैदल सैनिकों के नेटवर्क की जरूरत पड़ेगी, जो स्वच्छ भारत के पास नहीं है।

सरकार विभिन्न क्षेत्रों में 'स्वच्छ भारत प्रेरकों' की संख्या भी बढ़ा सकती है। व्यवहार में बदलाव लाने की दिशा में नौकरशाही की एक सीमा हो सकती है। भारत के युवा, विशेष रूप से अपनी किशोरावस्था में इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभा सकते हैं। नौकरशाही तो आती-जाती रहती है। अंततः विधायक और सांसद ही अपने निर्वाचन क्षेत्रों के लिए जिम्मेदार होते हैं।

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