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झाड़ूगीरी जिंदाबाद!
राजेंद्र शर्मा
Updated Fri, 03 Oct 2014 07:06 PM IST
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बेशक बापू ही थे। मगर चाल में वह तेजी नहीं थी। ऊपर से हाथ में लाठी की जगह झाड़ू थी, जिसे अनमने से सड़क के किनारे इधर-उधर मार रहे थे। अचरज हुआ। बापू की इतनी पूछ तो बरसों से नहीं हुई थी। हिंदुस्तान से अमेरिका तक बापू की चर्चा थी। फिर भी उनके मिजाज दुरुस्त नहीं लग रहे थे। पूछे बिना नहीं रहा गया, बर्थ डे पर झाड़ू पकड़ा दी, कहीं इससे तो नाखुश नहीं हैं? जवाब देने की जगह वह चुपचाप झाड़ू लगाने लगे।
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कुछ देर बाद जैसे बुदबुदाते हुए कहने लगे, झाड़ू से दिक्कत उन्हें होगी, जिन्होंने पहली बार इसे हाथ में लिया है, वह भी फोटो खिंचाने के लिए। खुद अपनी गंदगी साफ करने वाले को झाड़ू से कैसा संकोच? चिंता तो बस एक बात की है। कहीं ऐसा न हो कि मुझे झाड़ू के काम पर लगाकर ही न भूल जाएं, मुझे भी और मेरी झाड़ू को भी।
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बुजुर्गों के साथ यही दिक्कत है। एक बार किसी बात पर सुई अटक गई, तो अटकी ही रह जाती है। गोडसे की तीन गोलियां उनके दिल में ऐसी अटकी थीं कि निकलने का नाम ही नहीं लेती थीं। समझाने की कोशिश भी की कि उन्हें याद करने के लिए 30 जनवरी का दिन तो है ही। मगर वह उल्टे शिकायत करने लगे कि उस दिन तो मुझसे नशा-मुक्ति वगैरह कराते हैं। गोडसे की गोलियों को याद करने का तो किसी के पास टाइम ही नहीं है।
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फिर समझाने की कोशिश की। पुरानी बातों को याद रखने का क्या फायदा! जमाना बदल गया है। बापू बिगड़ गए, बदल गया है, वह तो देख ही रहा हूं। सरकारी टीवी पर दशहरे पर नागपुर से भागवत लाइव! खैर, मेरे हाथ में झाड़ू पकड़ा दी है, तो गोडसे के मुकाबले के लिए झाड़ू ही सही। समाज से लेकर लोगों के दिमाग तक के सारे कूड़े-कचरे पर चलेगी मेरी झाड़ू। अपने ऊपर गोली चलाने वालों को अब भी चैन से नहीं बैठने दूंगा! एक दिन यही झाड़ू देश को बाकी गंदगी के साथ गोडसेवाली गंदगी से भी मुक्ति दिलाएगी।
वह फिर तेज-तेज झाड़ू चलाने लगे। मुंह से बरबस निकल गया, झाड़ूगीरी जिंदाबाद!