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जन्नत में अंधेरा बिखेरने वाला ‘रोशनी एक्ट’

Fri, 27 Nov 2020 07:34 AM IST
निर्मल यादव निर्मल यादव
निर्मल यादव Published by: निर्मल यादव Updated Fri, 27 Nov 2020 07:34 AM IST
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Jammu Kashmir: 'Roshni act' that spreads darkness in heaven
उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, फारूक अब्दुल्ला

जम्मू और कश्मीर को बिजली से रोशन करने के लिए 2001 में पारित रोशनी ऐक्ट की आड़ में हुआ ‘महाघोटाला’ इन दिनों बहस का केंद्र है। बहस-मुबाहसे के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की तार्किक दलीलें आज मौजूं लगती हैं, जो उन्होंने पांच अगस्त, 2019 को राज्यसभा में जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने के प्रस्ताव पर दी थीं। गृह मंत्री की दलीलें इसका एहसास कराने के लिए काफी थीं कि बीते 70 सालों में जम्मू-कश्मीर, एक मुल्क के भीतर दो मुल्क बनाने का मुफीद उदाहरण बनकर सामने आया है। रोशनी ऐक्ट घोटाले ने इस हकीकत से भी रुबरू कराया है कि असीम संभावनाओं वाले जम्मू-कश्मीर में नौकरशाही और सियासत के नापाक गठजोड़ ने व्यवस्था को किस कदर खोखला बना दिया है।


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इस घोटाले के उजागर होने के बाद, यद्यपि झेलम और चिनाब में अब तक न जाने कितना पानी बह गया, लेकिन इसकी तह में बैठे अधिकारियों और राजनेताओं के चेहरों पर पानी पड़ना अभी बाकी है। अब एक नजर रोशनी ऐक्ट घोटाले से जुड़े तथ्यों पर। तत्कालीन फारूक अब्दुल्ला सरकार ने 'जम्मू-कश्मीर राज्य भूमि अधिनियम 2001' को विधानसभा से पारित कर 2002 में लागू किया था। इस कानून का मकसद जम्मू-कश्मीर में वित्तीय संकट से जूझ रहीं पनबिजली परियोजनाओं के लिए 25 हजार करोड़ रुपये जुटाना था। राज्य को बिजली की रोशनी से रोशन करने के मकसद के कारण इस कानून को ‘रोशनी ऐक्ट’ नाम दिया गया। इस कानून की आड़ में सूबे के सियासतदानों और अफसरों ने दो दशक तक वोट और नोट की जमकर फसल काटी।

रोशनी योजना के वास्तुकारों ने 20 साल पुराने एक सरकारी सर्वे के हवाले से दलील दी थी कि राज्य की 20.64 लाख कनाल सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे हैं। अब्दुल्ला सरकार ने इस योजना के तहत राज्य में 1999 तक के अनधिकृत कब्जों को, बाजार दर पर कब्जाधारक से जमीन की कीमत वसूल कर कब्जे को अधिकृत कर 25 हजार करोड़ रुपये सरकारी खजाने में डालने की योजना को अमलीजामा पहनाना शुरू कर दिया।  सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जों को वैध बनाने का यह खेल अब्दुल्ला सरकार के बाद मुफ्ती मोहम्मद सईद और फिर गुलाम नबी आजाद सरकार तक को इतना रास आया कि इनकी सरकारों ने भी रोशनी ऐक्ट में संशोधन कर कब्जों की मियाद को दो बार बढ़ाकर, 2004 और फिर 2007 कर दिया। 

कैग की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार लक्ष्य के मुताबिक 20.64 लाख कनाल जमीन के कब्जों में से सिर्फ 3.48 लाख कनाल जमीन के कब्जों को ही अधिकृत कर पाई। इसके एवज में सिर्फ 76.24 करोड़ रुपये ही सरकारी खजाने में पहुंच सके। कैग रिपोर्ट के आधार पर एडवोकेट अंकुर शर्मा ने 2014 में जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर रोशनी ऐक्ट को निष्प्रभावी घोषित करने की मांग की। अदालत ने इस योजना में वित्तीय अनियमितताओं के प्रमाण मिलने के बाद 2018 में रोशनी ऐक्ट को निलंबित करते हुए इसकी जांच जम्मू-कश्मीर की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) को सौंपी।

विडंबना देखिए कि रसूखदारों के दबाव में जांच के नाम पर खानापूर्ति करते हुए एसीबी ने 2019 में समूचे मामले को सबूतों के अभाव में अदालत से जांच बंद करने की गुजारिश कर दी। जबकि एसीबी की जांच के आधार पर ही हाईकोर्ट ने 2018 में रोशनी स्कीम में अनियमितताओं के प्रमाण मिलने पर इस योजना के तहत किसी भी प्रकार के वित्तीय लेन-देन पर रोक लगाई थी। हाईकोर्ट ने इस साल अक्तूबर में रोशनी ऐक्ट घोटाले की निष्पक्ष जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंप दिया। सीबीआई की तीन सप्ताह की जांच के आधार पर घोटाले में शामिल लोगों के नाम अब सामने आने लगे हैं। इनमें अब्दुल्ला और सईद परिवार के अलावा तमाम आला अधिकारियों के नाम उजागर हुए हैं। इससे इतर, यह मामला मौजूदा उपराज्यपाल मनोज सिन्हा की अगुवाई वाले राज्य प्रशासन की उस घोषणा को भी कसौटी पर कसने वाला साबित होगा, जिसमें रोशनी ऐक्ट का उल्लंघन करने वाले अवैध कब्जों से सरकारी जमीन को मुक्त कराने की बात कही गई है। आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि वह अपने प्रशासनिक कौशल से इस चुनौती को पार करने में कितने कामयाब होंगे।

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